Articles | Principal Kranti Kumar, Mumbai

Kranti Kumar

परिचय - उत्तर प्रदेश के इटावा में 1951 में जन्में एवं इलाहाबाद, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय व रूड़की विश्वविद्यालय में इंजिनियरिंग की शिक्षा प्राप्त कर 1976 से आई.आई.टी.- पवई, मुम्बई में कम्प्यूटर इंजिनियरींग में “शोध कार्य” किया। 1980 में मुम्बई विश्वविद्यालय के कम्प्यूटर सांइस विभाग में “रीडर” के पद पर 9 वर्ष तक अध्यापन कार्य किया। तत्पाश्चात् 1989 में मुम्बई के बान्द्रा स्थित थाडोमल शाहनी इंजिनियरींग कालेज में “प्रिंसपल” के पद पर 20 वर्ष तक कार्यरत रहे। 2008 में 57 वर्ष की आयु में समय से पूर्व सेवानिवृत होकर आध्यात्मिक क्षेत्र में पठन-पाठन एवं लेखन का कार्य आरंभ किया। वर्तमान में प्रिंसपल क्रांतिकुमार वनवासियों की सेवा हेतु एक सामाजिक संस्था से जुड़े हुए है।


पूर्व जन्म, शरीर, मृत्यु और पुर्नजन्म

पूर्वजन्म – हमारे इस जन्म के दुखों का कारण पूर्वजन्म में किये गये पाप कर्म हैं। अतः हमें इस जीवन में सदैव पुण्य कर्म करने चाहिए, जिससे अगले जन्म कष्टमय न हो।
• पूर्वजन्म के संस्कार दो प्रकार के होते है –
    o स्थायी – इनका परिणाम भोगना ही पड़ता है
    o अस्थाई – इनको दान-पुण्य, यज्ञ, तप, भगवान नाम आदि उपायों द्वारा मिटाया जा सकता है।
• मृत्यु का भय पूर्वजन्म के संस्कार के रूप में इस जन्म में विधमान रहता है। इसी कारण जन्म लेने के उपारांत सभी जीव मृत्यु से डरने लगते है।
• पूर्वजन्म के संस्कार स्मरण रहने के कारण जन्म से ही किसी-किसी को पिछले जन्म की घटनाये याद रहती है।
• संयम (धारणा, ध्यान एवं समाधि) की परिपक्वता की अवस्था में पूर्व जन्म का ज्ञान होता है।
• संस्कारों के साक्षातकार से दूसरों के पूर्व जन्मों का ज्ञान होना संभव है।
• 2 बच्चे एक ही समय एक ही दिन जन्म लेते है। एक बच्चा अमीर मां-बाप के यहां बहुत बुद्धिमान व बहुत स्वस्थ होता है। दूसरा बच्चा गरीब मां-बाप के यहां कुबुद्धिमान व बहुत कमजोर होता है। यह सब आत्माओं के पूर्वजन्मों में पुण्य या पाप संचित कर्मों के कारण ही होता है।

शरीर – शरीर (रथ), आत्मा (सवारी), बुद्धि (रथ चालक), मन (लगाम), इंद्रियां (घोड़े), इच्छायें (जीवन के रास्ते), परमात्मा (मंजिल) अर्थात जिस प्रकार “रथ चालक” “घोड़े” को लगाम द्वारा ठीक प्रकार से सही “रास्ते” पर चलाकर “सवारी” को अपनी “मंजिल” तक पहुंचाता है, ठीक उसी प्रकार “बुद्धि” से “मन” को वश में रखकर “इंद्रियों” की देखभाल करके “शरीर” ठीक से चलाता है, जिससे आत्मा का उत्थान होता है व जीवन की सभी “इच्छायें” पूरी होती है और अंत में “आत्मा” सरल रूप में अपनी मंजील अर्थात “परमात्मा” तक पहुंच जाती है।
• शरीर, मन व बुद्धि में परिवर्तन होता रहता है। मैं न तो शरीर हूँ, न मन हूँ और न ही बुद्धि हूँ, क्योकि ये तीनों परिवर्तनशील है। मैं तो आत्मा हूँ जो शरीर में उपस्थित रहती है और अपरिवर्तनशील है। इसी प्रकार परमात्मा भी अपरिवर्तनशील है।
• जैसे मैं कार नहीं, ड्राइवर हूँ, वैसे ही मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ।
• शरीर के मर जाने पर या मारे जाने पर आत्मा मरती नहीं और ना ही मारी जाती है।
• भौतिक ब्रह्मांड प्रकृति के 3 गुणों से बना है – सत्व गुण, रजस गुण एवं तमस गुण।
    o सत्व गुण – प्रधान प्राणी देव शरीर प्राप्त करता है।
    o रजस गुण – प्रधान प्राणी मानव योनि प्राप्त करता है।
    o तमस गुण प्रधान प्राणी नीच योनि प्राप्त करता है।
• एक शरीर छोड़कर दूसरा शरीर ग्रहण करने के बीच जीव (आत्मा) को नगण्य समय लगता है।
• प्रकृति नियमानुसार दिवंगत आत्मा शत-प्रतिशत अपने संचित कर्मों के अनुरूप दूसरे उपयुक्त भौतिक शरीर में प्रवेश कर नया जन्म लेती है।
• जीव (आत्मा) अपने शरीर की सृष्टि अपनी ही इच्छाओँ से करता है

मृत्यु – मनुष्य अपनी अज्ञानता के कारण जन्म और मृत्यु के द्वारा एक शरीर से दूसरे शरीर में देहांतरण करता रहता है।
• जिसने जन्म ग्रहण किया है, उसकी मृत्यु निश्चित है।
• जब जीव की मृत्यु होती है तो 5 तत्वों (जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी और आकाश) से बना यह शरीर विधटित हो जाता है और पांचों स्थूल तत्व अपने-अपने मूल तत्व को लौट जाते है।
• मृत्यु परमात्मा को बीते हुए जीवन का हिसाब देने का पवित्र दिन है तथा आगामी जीवन का प्रवेश द्वार है।
• मृत्यु के स्मरण से मन पापों से बचता है और वैराग्य का पौधा उत्पन्न होता है।
• पापी पुरूष मृत्यु के समय अत्यंत भयानक दृश्य देखते है व चिल्लाते हैं। क्योकि उन्हें आभास हो जाता है कि उन्हें कोई तिरस्कृत शरीर मिलने जा रहा है। जबकि पुण्यात्मा पुरूष किसी भी चिन्ता के बगैर मरते हैं।
• मृत्यु के समय सूक्ष्म तत्व (मन, बुद्धि और अंहकार) आत्मा के सुक्ष्म कण को कर्मानुसार सुख-दुख भोगने के लिए दूसरे शरीर में ले जाते है।
• मृत्यु के पाश्चात जीव (आत्मा) पूरे बह्मांड़की 84 लाख योनियों मे से किसी एक योनि को प्राप्त होता है।
• जो कुछ भी हम जीवन में सोचते और करते है, उसका प्रभाव मन पर पड़ता है, और इन प्रभावों का असर सचमुच मृत्यु के समय हमारे अंतिम विचारों पर पड़ता है। इन विचारों की गुणवत्ता के अनुरूप भौतिक प्राकृति हमें उपयुक्त शरीर देती है।
• भक्ति से आत्मा को बल मिलता है और अहंकार की समाप्ति होती है और साथ ही मृत्यु का भय समाप्त होता है।
• आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु – ये पांचों जन्म से ही सुनिश्चित रहते है।
• मृत्यु के समय एक शरीर से दुसरे शरीर में जाते समय वाणी मन में, मन प्राण में, प्राण आत्मा में और आत्मा दूसरे शरीर में स्थित हो जाता है।
• मृत्यु होने पर जब मनुष्य का प्राण निकलता है, तब उस प्राण के भीतर चित्त स्थिर होता है। चित्त के भीतर जगत ऐसे व्याप्त है, जैसे बीज के भीतर वृक्ष। जीव अपनी देहात्मक बुद्धि को एक शरीर से दूसरे शरीर में ठीक उसी प्रकार ले जाते है, जिस प्रकार सुगंध को वायु एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है।
• किसी मनुष्यकी अकाल मृत्यु के कारण इसका शेष जीवन (समय) बचा रहता है और इसी शेष समय तक उस मनुष्य की आत्मा भटकती रहती है।
• मृत्यु के समय की मनःस्थिति अगले जन्म के लिए आधार होती है।
• सुक्षम शरीर एक ऐसा वाहन है जो आत्मा को मृत्यु के समय शरीर से बाहर ले जाता है। और फिर एक नया जीवन प्रारंभ करने के लिए ले जाता है।
• भगवान की महिमा का गान मानव को जन्म-मृत्यु के चक्र से बचाकर आत्मसाक्षत्कार करा सकता है।

पुनर्जन्म – आत्मा का एक शरीर से निकल कर दूसरे शरीर में प्रवेश करना ही पुनर्जन्म है।
• शरीर से जब प्राणवायु निकल जाती है, तब शरीर गर्म नहीं रहता है। शरीर का गर्मी शांत होते ही उसमें रहनेवाला जीव (आत्मा) मन में विलीन हुई इन्द्रियों को साथ लेकर दूसरे शरीर में चला जाता है। यही पुनर्जन्म कहलाता है।
• मृत्यु के तुरंत बाद ही पुनर्जन्म होता है। मनुष्य की हर मृत्यु के बाद पुनर्जन्म होता है। किन्तु --
    o मोक्ष हो जाने पर आत्मा परमात्मा में मिल जाती है और पुनर्जन्म नहीं होता है। या,
    o जब अकाल मृत्यु होती है तो तुरंत पुनर्जन्म नहीं होता है।
• जीवन पर्यंत किये गये पाप-पुण्य कर्मों के अनुसार दुःख-सुख पुनर्जन्म के द्वारा अगले जन्मों में भोगने पड़ते है।
• जीवात्मा अपने शरीर से किये गये कर्में द्वारा पुनर्जन्म में प्राप्त होने वाले शरीर का सृजन कर लेता है।
• जिस जिस भाव को स्मरण करते हुए मनुष्य अपना शरीर छोड़ता है, पुनर्जन्म में उसी स्थिति को निश्चित रूप में वह प्राप्त करेगा।
• मनुष्य का पुनर्जन्म पशु योनि या किसी भी अन्य योनि में सम्भव है। उसी तरह पशु का पुनर्जन्म मनुष्य योनि या किसी भी अन्य योनि में सम्भव है।
• पुनर्जन्म किसी भी योनि में किसी भी ग्रह पर या किसी भी बह्मांड़ पर संभव है।
• पुनर्जन्म के चक्र से छुटकारा पाने के लिए आत्म साक्षात्कार कर चुके भगवत भक्तों की संगति करनी चाहिए।
• भगवान के ध्यान में अपना मन केंद्रित कर मनुष्य आत्मसाक्षात्कार की ओर अग्रसर होता है।

वैदिक शिक्षाओं पर आधारित कविता

रचियताः स्वर्गीय मुंशी द्वारिका प्रसाद गुप्ता, इटावा (उत्तर प्रदेश) द्वारा वर्ष 1880 में लिखी कविता

स्वर - प्रत्येक पंक्ति का पहला अक्षर
ज्ञा मानो मात-पिता की, उनने तुमको पाला है।
Obey your parents, as they are the ones who have brought you up.

दर कर उनको सुख देना, इसमें भला तुम्हारा है।
It is in your interest to give them happiness by respecting them.

रषा बैर फूट पापिन से, करिए सदा किनारा है।
You should steer clear of hatred, jealousy and sin.

श्वर के तुम बनो उपासक, रक्षा करने हारा है।
You should always worship God, as he is your protector.

चित कहै और उचित ही बोलै, वो ही मानुस प्यारा है।
He is always dear who speaks and does right.

ऊंच नींच जो समझते ना है, उसका जीवन ख्वारा है
He who does not differentiate between good and evil, wastes life

का सबको करना चाहिए, एका सुख दाता है।
Unity should be the sole aim of life, as unity brings happiness.

व सकल जितने दुनिया में, जुआ खेल सिखाता है।
Gambling leads to all vices and makes you unhappy.

मकार का ध्यान धरो, मन क्यों आलस में सोता है।
Keep remembering the almighty and do not lose time idling.

सर बार-बार नहीं आवै, मूरख है जो खोता है।
Opportunity to progress knows only once and fool lose it.

अंतकाल की सुरत न भूलो, धरम साथ एक जाता है।
Do not forget the end of life, as only good deeds will go to with your after death.

अः अक्षर तुमको चेताकर, स्वर का अंत बताता है।
The latter “AH” brings you to end of vowels.

व्यंजन - (प्रत्येक पंक्ति का पहला अक्षर)
बहुं न हिंसा करनी चाहिए, हिंसा सब पापन की माय।
Violence is the mother of all sins, abjure it always.

ल को संग भूल नाहि कीजै, यह संग हैगा अति दुःखदाय।
Do not accompany sinners, as it will always bring you grief.

र्मी में जब चलकर आओ, पानी तुरंत पीजिए नांय।
In summer do not drink water immediately after coming from hot sun.

मंड और क्रोधहु से बचिए, ये ना है कछु कम दुःखदाय।
Keep away from pride and anger, as they ultimately bring pain.

तुर कहै ताहि विधि चलिए, उलटा चलना ना है ठीक।
Always act in life by what wise men say and doing, otherwise is not right.

ल काहू से कबहूं न कीजै, बुधजन की यह मानो सीख।
As advised by intelligent men, do not practice malice and deceit.

तन सदा करते ही रहियों, फेल होय चाहे पास।
Keep on working hard irrespective of failure or success.

गड़ो में तुम सचकर समझो, ना है कछू भलाई की आस।
There is no hope from fighting with others, avoid it always.

रै कठिनता से वह आदत, बालकपन में जो पड़ जाय।
Habits earned in childhood are difficult to go away.

ग चोरन कौ संग न दीजै, यह संग देगा जेल दिखाय।
Do not accompany conman and thieves, as their company will take you to jail.

रते रहो सदा भगवत से, सोंच समझ कर करिए काम।
Be fearful of god and always act after all considerations.

ढ़कने से नही छिपै पाप, है घट-घटवासी उसका नाम।
You cannot hide your deeds, as he is omnipresent.

न मन धन को खर्च कर, विद्या लीजै सीख।
Strain your heart, body and finance to keep on learning.

कौ न मन विद्याध्यन से, मांग खाओ चाहे भीख।
Do not get tired of it comes to begging.

या कबहु नाहिं छांडिये, दया धरम का मूल।
Kindness is the soul of all religions and forgets it not.

न दे धरमहिं राखिये, या मै करहु न भूल।
You should keep your faith, even if it costs your pocket.

हिं चलिए ऐसो चलन, कुलहिं दाग लग जाय।
Do not tread a path which may bring a bad name to your family.

र धन दारा देख के, मूरख मत ललचाय।
Do not get into lust even if you see wealth and beauty of others.

सहूं न खोट संग में, जदपि लाभ कछु होय।
Do not get into the company of bad people, even if you gain something.

चन सदा मीठे कहौ, जो जग चाहो मोह।
Always speak kind words if you want to the world.

ली बात यदि नीच पै, ताहू पै लै लैऊ।
Do not forget to pick up good even from down trodden.

न से तन से जीभ से,दुःख काहू मत देऊ।
Do not offend anybody by your deeds, words of actions.

दपि सकौ नहि दान कर, चूकौ मत सन्मान।
Always respect the human being even if you cannot donate.

हिये सीधे चलन से ऐठ मरोड़ में हानि।
Always be simple and never be proudly and pompous.

ड़कपन में मेहनत करके, जो विद्या को पावेगा।
One who earns education by sincere efforts since childhood.

ही बड़ा होने पर उससे, खुबहिं लाभ उठावेगा।
Will get all happiness as gets older

रम करेगा जो पढ़ने में, वह मुरख रह जावेगा।
One who feel shy in working hard to educate himself,

भा में जाकर जब बैठेगा, हंस में काग कहावेगा।
Will always be odd in the company of learned persons

हंसी किसी से ना करो, हंसी विरोध का मूल।
Never make fun of others, as it always brings animosity.

क्षण में सारी श्रंखला, कर डालै है धूल।
Such a fun always destroys all the relationship.

त्रण सम अपु को समझिये, नाहिं करिये अभिमान।
Consider yourself like a straw in a river and do not cover yourself with pride.

ज्ञान समुद्र के बीच में, सदा करो स्नान।
By this you will always be taking dips in the sea of knowledge.

संकलन - प्रिंसिपल क्रांति कुमार


आत्मा-परमात्मा

संकलन - प्रिंसिपल क्रांति कुमार


धर्म, कर्म, भक्ति और सत्संग

केवल वेद ही धर्म के प्रमाण हैं। वेदानुसार मनुष्य के लिये 4 पुरूषार्थ है –

धर्म का सार –

कर्म का सार –

भक्ति के सार –

सत्संग के सार -

संकलन - प्रिंसिपल क्रांति कुमार


संस्कार का महत्व

“संस्कार” शब्द का अर्थ है शुद्ध करना, संवारना, उन्नत करना। फूलों में जो स्थान सुगंध का है, फलों में जो अर्थ मिठास का है, भोजन में जो स्थान स्वाद का है, ठीक वही स्थान जीवन में संस्कार का है।

संस्कार के 4 अलग-अलग मत हैं –

संस्कार मुख्यतः 3 प्रकार के होते हैं –

ऋषियों के अनुसार संस्कार –

महर्षि दयानंद सरस्वती ने इन 16 संस्कारों की व्याख्या निम्न की है –

गर्भाधान संस्कार से कर्णवेध संस्कार तक के 9 संस्कार अमंत्रक किये जाते हैं। विवाह संस्कार से अंत्येष्ठि संस्कार तक के सभी संस्कार मंत्रक किये जाते हैं।

सोलह संस्कार के दायित्व -

जीव के जन्म के साथ आये संस्कार –

पूर्वजन्म के संस्कार बच्चे के सुक्ष्म शरीर (आत्मा) अपने साथ लाता है। जिसमें कुछ अच्छा और कुछ बुरा प्रभाव पड़ता है। इसी अशुद्धता एवं अपूर्णता को दूर करने के लिए अल्प आयु और शरीर संवर्धन के समय यज्ञ द्वारा जल व अग्नि को साक्षी मानकर “संस्कार की विधि” की जाती है। “जल” शरीर शुद्ध करता है और “अग्नि” के प्रभाव से आत्मा की दुर्भावनाओं की मैल छट जाती है। “माटी” से बने हुए मनुष्य शरीर पर यदि “संस्कार” की एक माया चढ़ जाये तो वही मनुष्य “माटी” से “मोती” बन जाता है।

जीव में दोषों को दूर करने के लिए किये जाने वाले संस्कार –

संस्कारों के प्रभाव के उदाहरण – स्वाति नक्षत्र की एक बूंद ओस सर्प के मुख में पड़ने से वह भयंकर विष बन जाता है। वही एक बूंद ओस केले के पत्ते पर पड़ने से वह कपूर बन जाता है। समुद्र के सीप के मुख के अंदर पड़ने से वहीं ओस का एक बूंद मोती बन जाता है।

संस्कार का सार -

संकलन - प्रिंसिपल क्रांति कुमार