Articles | Smt. Manju Lodha

मौन एकादशी – आत्म कल्याण का विशिष्ट तप

वर्ष भर में मार्गशीष मास की एकादशी का अद्भूत महत्व है। यह तिथि अत्यंत पुनित, पावन मानी गई है। इस दिन से मौन एकादशी व्रत की आराधना प्रारंभ की जाती है जो ग्यारह वर्ष तक की जाती है।

आज के पवित्र दिन याने मार्गशीष महिने की एकादशी को अठरावे तीर्थकर परमात्मा अरनाथ भगवान ने राजपाट त्यागकर दीक्षा ग्रहण की थी। वहीं उन्नीसवें तीर्थकर मल्लीनाथ भगवान का जन्म, दीक्षा तथा केवलज्ञान यह तीनों कल्याणक इसी एकादशी के दिन हुए और 21वें तीर्थकर नमिनाथ प्रभू का केवलज्ञान कल्याणक भी इसी दिन सम्पन्न हुआ। इस प्रकार तीन तीर्थकर के पांच कल्याणक मार्गशीष शुक्ल एकादशी के कल्याणकारी दिन को पूर्ण हुए। तीर्थकर परमात्मा अनंत पुण्यों के पुंज होते है। उनके पुण्यों के उनके कल्याणकों से चारो गतियों में विचरित प्राणी मात्र को शांति, सुख और हर्ष की अनुभूति होती है। इस दिन तप-जप और मौन द्वारा तीनों तीर्थकर की अराधना की जाती है। मौन मन का आंतरीक तप है, वही वचन का तप है। मौनयुक्त उपवास करने से मन-वचन और तप तीनों योगों द्वारा आराधना होने से इंद्रिय संयम, वाणी संयम और एकाग्रता ध्यान संयम तीनों का संयम याने मौन एकादशी।

इस व्रत के पीछे पौराणिक कथा का भी वृतांत मिलता है –
एक बार भगवान नेमिनाथ द्वारका नगरी में पधारे। वासुदेव श्रीकृष्ण सम्पूर्ण राज-परिवार के साथ भगवान दर्शन करने आये। दर्शन करके देशना सुनी। उसके पाश्चात भगवान से प्रार्थना की – हे प्रभो। मैं दिन-रात राज-कार्यों में व्यस्त रहता हुँ, इसलिए धर्मराधना करने का विशेष समय नहीं मिल पाता। इस कारण मुझे कोई ऐसा एक दिन बताइये जिस दिन समग्र राज-चिंताओं से मुक्त होकर निर्विकल्प भावपूर्वक धर्माराधना करने से मैं विशेष उत्तम फल की प्राप्ति कर सकूं। भगवान नेमिनाथ ने कहा - वासुदेव। मार्गशीष शुक्ल एकादशी का दिन बहुत ही श्रेष्ट और उत्तम दिन है इस दिन मौनपूर्वक व्रत आराधना और तीर्थकर परमात्मा का स्मरण-चिंतन करने से महान फल की प्राप्ति होती है।

श्रीकृष्ण वासुदेव ने पूछा – प्रभों। अतीतकाल में इस व्रत की अराधना किसने की है। उसका क्या महान फल प्राप्त हुआ। भगवान नेमिनाथ ने बतलाया – अतीत काल में सुर नाम का एक धनाढ्य श्रेष्टी था। मानव-जीवन के सुख भोगते हुए एक दिन उसके मन में विचार उठा – पूर्व जन्मों के पुण्य फल के रूप में मैं इस जन्म में सभी प्रकार के सुख भोग रहा हूँ। यह तो मैं पुरानी फसल खा रहा हूँ, यदि इस जन्म में सदकार्यों का बीज नहीं बोया, धर्माराधना नहीं की तो फिर यह जीवन निरर्थक हो जायेगा और अगले जन्म में भी सदगति नहीं मिल सकेगी। यह विचार कर सुर श्रेष्ठी ने अपने धर्म-गुरू के पास गया और निवेदन किया – गुरूदेव, मैं दिन-रात राज-कार्यों में व्यस्त रहता हुँ, इसलिए धर्मराधना करने का विशेष समय नहीं लगा सकता। कृपा करके मुझे कोई ऐसा मार्ग बतइये कि मैं कम समय में धर्मराधना करके विशेष फल की प्राप्ति कर सकूं। इसके उत्तर में आचार्यश्री ने बताया – हे श्रेष्ठी। मार्गशीर्ष मास की शुक्ल एकादशी के दिन आठ प्रहर का पौषध व्रत लेकिन मौनपूर्वक इस दिन जिनेश्वर देव की अराधना करने से महान फल प्राप्त होता है।

गुरूदेव की बताई विधी के अनुसार सुर श्रेष्ठी ने ग्यारह वर्ष तक प्रत्येक एकादशी को पोषध एवं पूर्ण मौनपूर्वक तप आराधना का। इस तप की आराधना से श्रेष्ठी सुर को अनेक शुभ फलों की प्राप्ति हुई। आयुष्य पूर्ण कर ग्यारहें देवलोक में उत्पन्न हुआ और देव आयुष्य पुर्ण कर भारत क्षेत्र के सोरिपूर नगर में सुव्रत नाम का सेठ बना। पूर्व-जन्म के शुभ संस्कारों के कारण वहां भी उसे देव-गुरू-धर्म की आराधना का अवसर मिला। श्रेष्ठी के पास ग्यारह करोड की धन-सम्पति थी, जिसेमें से वह दान-लोकोपकार के कार्य करके पूण्योपार्जन करता रहा। भगवान नेमिनाथ ने वासुदेव श्रीकृष्ण को मौन एकादशी का यह कथानक सुनाकर इस व्रत का महत्व बतलाया और कहा -प्रत्येक व्यक्ति को अपनी शक्ति के अनुसार मार्गशीष शुक्ल एकादशी के दिन मौनपूर्वक तप जप और तीर्थंकरों की अराधना करनी चाहिए।

एकादशी याने 11 – कहते है एक और एक जब मिल जाते है तो वह ग्यारह हो जाते है। याने उनकी शक्ति दस गुनी हो जाती है। ऐसे भी गणित का पहला अंक 1 है इसलिये इसका महत्व भी खास है। कोई इंसान बहुत बेहतर कार्य करता है या अव्वल आता है तो हम कहते है भाई यह तो नम्बर वन है। आध्यात्मिक दृष्टि से पहला 1 ज्ञान था तथा दूसरा 1 आचरण का प्रतीक है। अकेला ज्ञान 1 अंक का मोल रखता है, लेकिन उससे जब आचरण जुड जाता है तो वह 11 बन जाता है। उसकी शक्ति दस गुणा बढ़ जाती है। एकादशी में दो बार एक-एक अंक लिखा जाता है। याने जीवन में ज्ञान का उपयोग जब आचरण सहित किया जाता है, सोने में सुगंध का प्रतीक बन जाता है। अकेला ज्ञान आपको निर्माण की तरफ भी ले जाता सकता है और विध्वंस की तरफ भी। लेकिन यदि आप सही आचरण, विनय, सकारात्मकता है तो वह ज्ञान सिर्फ निर्माण की दिशा में ले जाता है। भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही स्तर पर आप आचरण सहित ज्ञान के सहारे शिखर पर पहूँच सकते है।

जैन धर्म के साथ-साथ वैदिक धर्म में भी एकादशी का महत्वपूर्ण स्थान है। वैदिक पुराण में कहा गया है कि एक व्यक्ति यदि अपने घर पर प्रतिदिन दो लाख ब्रह्मणों को भोजन कराता है, उसे जितना पुण्य मिलता है, उससे अधिक पुण्य मार्गशीष मास की एकादशी को निर्जला व्रत करने से प्राप्त होता है। मौन रहने से हम अपने अंतर में उतरते है, पुरी दुनिया से निषेध होकर अपनी अंतरात्मा में झांकर स्वयं से परिचय करने का सुनहारा अवसर प्रप्त करते है। अपने गुणों और अवगुणों का अवलोकन करने का सबसे सहज माध्यम मौन है। मौन से हम अपनी शक्ति का संचय करते है। मौन द्वारा हम अपने अंदर छिपी सुप्त शक्तियोंका जागरण करते है। वाणी का उपयोग कितना, कब और कहाँ करना, अन्यथा मौन रहकर इसका भेद जिसने जान लिया, वह अपने आप में महान बन गया।

आचारांगसुत्र में प्रभु ने बतलाया है कि मौन ही सच्चा मुनित्व है। मौन ही सम्यवक्त है। मौन धारण कर दिन भर संकेत के अपने आप में, प्रभू स्मरण में लीन हो जाना है। यही मौन एकादशी की सच्ची सार्थकता है। जहाँ तन-मन और वचन की त्रिवेणी का सच्चा मिलन होता है। तीनों का संगम शुभ योग में परिवर्तित होकर हमारी आत्मा का कल्याण करता है, तब ही इस व्रत की सफल आराधना सफल साधना फलीभूत होती है।

इसलिये बड़े-बड़े विद्वानों, संतों ने वाणी को चांदी और मौन को सोने की उपाधी दी है। वाणी को मनुष्य और मौन को देवता की उपाधी दी है। कई गुरू भगवंत कई दिनों तक मौन धारण करते है और जिस दिन उनके मौन खोलने का दिन होता है तो पहला शब्द मंगलारण सुनने के लिए हजारों भक्त जमा होते है, क्योकि इसका प्रभाव ही अलग होता है, उनका आभामंडल उस समय सुर्यपुंज या अलग चमकता है जो सारे वातावरण को चमकृत करता है, पवित्र बना देता है।

कहते है कि अगर आप बुद्धिमान है तब मौन आपको अधिक बुद्धिशाली बनाता है, वही अज्ञानी के लिये भी अपना अज्ञानता को छुपाने का सबसे बड़ा साधन मौन है। मौन रहकर हम अनेक संकट से बच सकते है, वाद-विवाद झगड़े कलह से बच सकते है। शांति का सर्वोत्तम उपाय मौन ही है। संत कबीरदासजी ने कितनी सही और सटीक बात कही है –

वाद-विवादे, विष वर्धना, बोले बहुत उपाध।
मौन कहै सबकी सहे, सुमिरे नाम अगाध।

मौन जीवन का श्रेष्ठ तप साधना है। तो आईये इस वर्ष मौन एकादशी को मौन व्रत कर हम भी हमारी आत्मा के दो परम मित्र मौन और एकांत से मिलकर अपनी आत्मा का कल्यण करे।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा

दीपावली अर्थात दीपों का त्यौहार

दीपावली अर्थात दीपों का त्यौहार, अंधकार पर रोशनी की विजय का त्यौहार, अनीति पर नीति की जय का त्यौहार और अधर्म पर धर्म की पताका का त्यौहार। त्यौहार हमारी संस्कृति की आत्मा है। भारतीय मनीषा प्रकाश जनित मनीषा है, हर नया दिन एक नई उमंग, एक नई आशा लेकर आता है। हमारी सुबह सूर्य को अर्ध्य देने से शुरू होती है और रात्री दीपक जलाकर प्रकाश प्राप्त करने में।

दीपावली का पर्व हम अमावस्या की अंधियारी रात्रि को मनाते है। आसमान में अंधेरा है, धरती दीपमालाओं से प्रज्जवलित है। पूनम की रात भी शरमा जाये ऐसा प्रकाश। याद आती है कविवर रविन्द्र टैगोर की एक कविता, जिसका सार कुछ इस तरह था कि एक नन्हा सा दीपक आसमान के ओर-छोर तक फैले अंधकार को चुनौती देते हुये कहता है – “भले मैं तुम्हारा सारा तम नहीं हर सकता, लेकिन मेरा होना यह सिद्ध करता है कि अंधकार को मिटाया जा सकता है, उसे दूर किया जा सकता है।

कितना बडा मर्म छिपा है इस संदेश में, यह झकझोरता है मनुष्य की चेतना को। उठो-आगे बढ़ो, एक ठोकर पर मत रुको। चलना ही जीवन है और सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि अपने दीपक स्वयं बनो “अप्प दीपो भव”। एक छोटा पर सरगर्भित वाक्य पढ़ा था। भगवान बुद्ध मृत्युशय्या पर पड़े है। उनका प्रिय शिष्य आनंद इसके कारण बहुत व्यथित है। उनके विरह मात्र की कल्पना से उनका तन-मन विचलित हो रहा है। वह अपने मनोभावों को छिपा नहीं पाता और दुःख से रो पडता है। भगवान कारण पुछते है तो आनंद कहता है - “आपके बिना मैं क्या करूँगा। आप तो इस संसार से विदा ले रहे है। जबकि मेरी शिक्षा अभी अधूरी है, मुझे तो अभी ज्ञान भी नहीं मिला।” बुद्ध के चेहरे पर एक तेजस्वी, ममतामयी मुस्कुराहट उभरती है और वह शिष्य को समझाते है – रोओ मत। क्योकि मैं तुम्हें ज्ञान नही दे सकता। तुम्हें स्वयं अपन प्रकाश बनना होगा। अपने भीतर जिज्ञासाएं उत्पन्न करनी होगी और उसका समाधान भी स्वयं खोजना होगा। तभी तुम वास्तविक ज्ञान के अधिकारी बन सकोगे। “अप्प दीपो भव” तीन शब्दों का मंत्र जिसमें सम्पूर्ण जीवन का दर्शन छिपा हुआ है। जीवन को कैसे जिये इसका कैसा सुंदर अह्वान।

दूसरों को रोशनी प्रदान करता है। क्यों न हम भी हमारे जीवन को संस्कारों रूपी दीपक स्वयं जलाकर ऐसी रोशनी से रोशन करे जिससे हमारे आस-पास रहनेवाले लोग किसी-न-किसी रूप में प्रज्जवलित हो सके। महावीर, गौतम, ईसा, मोहम्मद, नानक, चैतन्य महाप्रभू, श्री अरविंद, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, गाँधीजी, रविन्द्रनाथ टैगोर, विनोवा भावे आदि सभी के भीतर ऐसी ही एक अलौकीक ज्योति जली जिसका लाभ समुचित मानव जाति को मिला।

एक दीप जला आंगन मे, घर में उजियारा हो गया, एक दीप जल दहलीज पर, आओ पथिक तुम्हारा स्वागत है। एक दीप जला अटारी पर, अमृत बरसा उस घर में और जो एक दीप जल जाये हम सभी के दिलों में मानवता का, ताकि कहीं आतंकवादी शक्तियाँ पनप न सके, मनुष्य का मनुष्य से विश्वास उठ न सके और भाईचारा सदैव बना रहे। यही पावन और पुनित संदेश छिपा है दिवाली के इस पवित्र त्यौहार में।

बाणगंगा के घाट में जब कतार से जलते दीपक लहरों के संग बहते देखती हूँ तो नदी की एक-एक धारा चमकती नजर आती है औऱ उसका हर्षोल्लास चमकता है। वहां उपस्थित जन समूह की आंखों में, कहां है अंधकार, यहां तो सिर्फ है प्रकाश। जब-जब तम बढ़ेगा उजाला उससे दोगुना। आलोक के आकाश पर हर दम इंसानियत का इन्द्रधनुष जगमगाता रहेगा।

आईयें इस दीपावली में हम प्रण करें पटाखें नही जलायेगे, पर्यावरण की रक्षा करेंगे, किसी दीन की कुटिया में दीप जलायेंगे, अंधेरे को सच में प्रकाश में बदलेंगे।

याद रखिये, दीपावली का पर्व मर्यादा पुरूषोतम राम को चौदह वर्ष के वनवास के पाश्चात् अयोध्या वापस आने की खुशी ही नही या भगवान महावीर के मोक्ष प्राप्त करने की रात्रि ही नहीं बल्कि हम सभी के लिये भौतिक सुविधाओं से उपर उठकर अपने मन की गंगा में डुबकी लगाने, सच्चा मोती प्राप्त करने का पर्व है। चेतना की एक बूंद ही अमृत बन जाती है और नैया भवसागर पार लग जाती है।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा

विजयादशमी – दशहरा अपने अंदर के राम को जगाये

दशहरा याने विजयादशमी हर वर्ष अश्विन महीने के शुक्ल पक्ष में दसवीं तिथी के दिन मनाया जाता है। यह एक ओर प्रभू राम की रावण पर विजय का पर्व है, तो वहीं माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध का पर्व है। याने बुराईयों पर अच्छाईयों की विजय का उत्सव है। भगवान राम और माँ दुर्गा की पूजा का यह शुभ दिन है। क्षत्रिय इस दिन अपने शस्त्रों की पूजा करते है।

9 दिन नवरात्रि याने शक्ति की पूजा के पाश्चात् दसवें दिन दशहरा मनाया जाता है। संम्पूर्ण भारत वर्ष में गरबा-डांडिया की धूम मच जाती है। वहीं जगह-जगह रामलीला का आयोजन पर राम की संम्पूर्ण लीलाओं को रंगमंच पर प्रस्तुत किया जाता है और दशहरे के दिन रावण का पुतला जलाया जाता है। मुम्बई शहर के चौपाटी के खुले मंच पर यह आयोजन होता है और दशहरे के दुसरे दिन भव्य कवि सम्मेलन का आयोजन होता है और पुरे मुम्बई में जगह-जगह पर काव्य गोष्ठियां होती है। देश के वरिष्ठतम कवि इन मंचों से काव्य पठन हजारों की संख्या में उपस्थित श्रोताओं के समक्ष करते है। बंगाल में नौ दिनों तक दुर्गा पूजा भव्य पैमाने पर होती है। दसवें दिन मां की मुर्ति का विसर्जन किया जाता है।

बंगालवासियों का मानना है कि जब राम रावण को परास्त करने में अपनी असमर्थता अनुभव करने लगे तब उन्होंने तब उन्होंने माँ दुर्गा की पूजा की। हिन्दी के महाकवि “निराला जी” ने “राम की शक्तिपूजा” नाम से एक बहुत ही सशक्त काव्य लिखा है। जिसका सरांश यूं है कि प्रभू श्रीराम ने माँ दुर्गा के चरणों पर 101 नील कमल चढ़ाने के लिये हनुमान को भेजते है, 100 कमल तो मिल जाते है, लेकिन एक बाकी रह जाता है। तब श्रीराम हनुमान से कहते है, हे हनुमान संसार मुझे नील कमल के समान नेत्रों वाला कहते है। यदि एक नील कमल नहीं मिल रहा है तो मैं अपनी एक आँख मां के चरणों में चढा दूगां। इतना कहकर वह ज्योंहि आँख निकालने लगते है, माँ स्वयं प्रकट होकर उनका हाथ रोकती है तथा उन्हें युद्ध में विजय होने का आशीर्वाद देती है।

दशहरे के पर्व हमारी सामाजिक तथा सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। इस दिन घर-घर तथा गाडियों पर तोरण बांधे जाते है। जलेबी-फाफड़ा खाये जाते है। लोगों के बीच आपसी सौहार्द स्नेह बढ़ाता है। आज का शुभ दिन हमें यही संदेश देता है कि हम अपने अंदर छिपे रावण को खत्म करे, बुराईयों को दूर करे और मन में छिपे राम को जगाये, अच्छाइयों को अपनाये।

अन्याय हम जीवन पर किसी कवि की कहीं इन पंक्तियों को दोहराते ही रह जायेंगे –
           किस रावण की काटू बांहें ॽ
           किस लंका में आग लगाऊं ॽ
           घर-घर रावण, पग-पग लंका
           इतने राम कहां से लाऊं ॽ
हम स्वयं राम बने और रामराज्य की स्थापना करे, आज इसी संकल्प की दुनिया को आवश्यकता है। ताकि आतंकवाद और आरजकता रूपी रावण का नाश हो और यह संसार और अधिक सुंदर रहने लायक बना रहे।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा

नवरात्रि – नारी शक्ती की अदृश्य महिमा का पर्व

नवरात्रि दुर्गा माता की उपासना का पर्व है। नौ दिनों तक यह पर्व वास्तव में शक्ति की उपासना का उत्सव है। धर्माचायों के अनुसार वर्ष में चार बार नवरात्रि व्रत का विधान है। चैत्र, अषाढ़, अश्विन और माघ का शुक्ल पक्ष, वर्ष में ये चार नवरात्रियाँ आती है। लेकिन इनमें भी चैत्र और अश्विन की नवरात्रि के दिनों की महिमा कुछ ज्यादा मानी गई है। इस अवसर पर दुर्गा और उनके विभिन्न स्वरूपों की पूजा का विशेष महत्व है।

नवरात्र का व्रत और नौ दिनों तक माँ दुर्गा या कुलदेवी के पूजन से हमें मनवांछित फल प्राप्त होता है। शक्ति की उपासना से ही सभी कार्य पूरे होते है। महान दार्शनिक नीत्से ने कहा है कि संसार में प्राप्त करने लायक यदि कोई चीज है तो वह शक्ति है। शक्ति बिना शिव अपूर्ण है, अधुरे है। इस सत्य को हजारों वर्ष पहले भारतीय मनीषा ने पहचान कर शक्ति की आराधना का यह पर्व शुरू किया।

आदिकाल में अत्याचारी महिषासुर के अत्याचारों में सर्वत्र हहाकार मच गया तब उसका वध करने के लिये मां शक्ति ने दुर्गा रूप में अवतरण लिया। दुर्गा को महिषासुरमर्दिनी कहा गया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने शुंभ-निशुंभ तथा मधुकैटम नामक राक्षसों का संहार कर उनके अत्याचारों से सभी देवताओं को मुक्ति दिलायी। नवरात्रि के नौ दिनों में दुर्गा सप्तशती का पाठ अत्यंत शुभ-लाभकारी माना जाता है। सम्पूर्ण देश में नवरात्री के नौ दिनों में माँ दुर्गा की मुर्ति स्थापित की जाती है। पूजा, अनुष्ठान होते है और गरबा, रास, डांडिया भी खेला जाता है। बंगाल में तो यह उत्सव बहुत धुमधाम के साथ मनाया जाता है, दस दिनों तक वहाँ छुटी का माहौल रहता है। गुजरात, महाराष्ट्र में भी इन दिनों चारों तरफ उत्सव की बहार आ जाती है। कहते है चैत्र के नवरात्र से पंद्रह दिन तक यदि नीम के पत्ते या उसके रस का सेवन किया जाय तो वर्षभर शरीर निरोगी-स्वस्थ्य रहता है।

परमेश्वरी दुर्गा के जो नौ स्वरूप है, उन्हीं के अनुसार नवरात्री के नौ दिनों में हर रोज इन्हीं अलग-अलग रूपों की पूजा होती है।
           प्रथम शैलपुत्री च द्वितीय ब्रहन्मचारिणी।
           तृतीय चन्द्रघण्टेति कुष्माण्डेति – चर्तुर्थकम।।
           पंचम स्कन्दमातेति षष्ठ काव्यायनीति च।
           सप्तमं कालरात्री महागौरीति चाष्टम्म।।
           नतमं सिधिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिता।
           उत्कान्येतानि नामनि ब्रहन्मणैव महात्मनाः।।

• शैलपुत्री – नवरात्रि के पहले दिन माँ दुर्गा के शैलपुत्री स्वरूप की पूजा होती है। प्रथम स्वरुपा शैलपुत्री सबकी अधीश्वरी है। नवरात्र के प्रथम दिन इन्हीं की पुजा एवं उपासना होती है। योगी अपनी योग साधना का शुभारंभ करते है और मन को मुलाधार चक्र में स्थित करते है।

• ब्रह्मचारणी – दूसरा दिन ब्रह्मचारिणी का है। यह मां दुर्गा का स्वरूप है। मान्यता है कि माँ दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरुप की पूजा अर्चना से अनंत फल मिलता है। तप, संयम एवं सदाचार की वृद्धि होती है।

• चंद्रघंटा – माँ दुर्गा के चन्द्रघंटा स्वरुप की नवरात्री के तीसरे दिन पूजा होती है। माँ का यह स्वरूप कल्याणकारी होता है। इनकी कृपा से पाप एवं बाधाएं दूर हो जाता है तथा मंगल ही मंगल होता है।

• कुष्मांडा – कुष्मांडा स्वरूप दुर्गा मां का चौथा स्वरूप माना गया है। ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण ही इनका नाम कुष्मांडा पड़ा। इस स्वरूप की उपासना से भक्तों के रोग एवं शोक नष्ट हो जाते है।

• स्कंदमाता – पांचवे स्वरूप में दुर्गा माँ की स्कंदमाता के रूप में पूजा होती है। नवरात्री के पांचवे दिन स्कंदमाता के पूजन की परंपरा है। इनकी अर्चना से समस्त इच्छाएं पूर्ण हो जाती है।

• कात्यायनी – कात्यायनी दुर्गा माँ का छठा स्वरुप है। देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये मां महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट हुई और संत ने इन्हें अपनी कन्या मान लिया। छठे दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में होता है। इनकी पूजा से अर्थ, काम, मोक्ष आदि फलों की प्रप्ति होती है।

• कालरात्री – नवरात्री के सातवें दिन दुर्गा माँ के कालरात्री स्वरूप के पूजन की महिमा मानी गयी है। अपने भक्तों को कष्टों से बचाने के लिये कालरात्री माता दुष्टों का विनाश करती है और भक्तों को भय मुक्त रखती है।

• महागौरी - आ ठवें दिन महागौरी के रूप में दुर्गा माँ की पूजा जाता है। माँ महागौरी के वस्त्र-आभूषण श्वेत है। वाहन वृषभ है। चार भुजाएं है और परम कृपालु दिव्य स्वरूप है। ऐसा माना गया है कि इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है।

• सिद्धदात्री – नवरात्री के अंतिम दिन अर्थात नवें दिवस पर माँ दुर्गा के सिद्धिदात्री को पूजा जाता है। यह सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली है। भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही सिद्धियाँ प्राप्त की थी। इसलिए यह आम मान्याता है कि मां दुर्गा के इस स्वरूप की पूजा से सभी कामनाएं पूर्ण होती है।

नवरात्रि के अंतिम दिन कुवारी कन्याओं की पूजा का विधान है। कन्या के रूप में शक्ति का पूजन करके लोग नवरात्रि के इस दिन को शक्ति अर्जन दिवस के रूप में भी मनाने की मान्यता है। नवरात्री के पूर्ण होने के पाश्चात दसवें दिन विजयादशमी के पर्व को मनाया जाता है। असत्य पर सत्य कि विजय के रूप में यह पर्व शक्ति कि सार्थकता के उत्सव के रूप मंे मनाया जाता है। नये जमाने में नवरात्रि भले ही विविधता और विभिन्न आयोजनों के साथ मनाई जाने लगी हो, लेकिन वस्तुतः नवरात्री शक्ति की पूजा का पर्व है। भारतीय परंपराओं में नारी को शक्ति का स्वरूप कहा गया है।

आज मैं हर नारी से यही आह्वान करना चाहती हूँ कि अपने भीतर छिपी दुर्गा को पहचाने, अन्याय का डटकर मुकाबला करें और नारी के अस्तित्व की, मान की, मर्यादा की रक्षा स्वयं करे।

भारतवर्ष में कुल 51 शक्तिपीठ है जिन सभी की उत्पति कथा एक ही है। यह सभी मंदिर शिव और शक्ति से जुड़े हुए है। धार्मिक ग्रंतों के अनुसार इन सभी स्थलों पर देवी के अंग गिर गये थे। शिव के ससुर राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया जिसमें उन्होंने शिव और सती को आमंत्रित नही किया क्योंकि वह शिव को अपने बराबर का नहीं समझते थे। यह बात सती को काफी बुरी लगी। वह बिन बुलाए यज्ञ में पहुंच गयी। जहां शिव का काफी अपमान किया गया। इसे सती सहन न कर सकी और वह हवन कुण्ड में कुद गई। जब भगवान शंकर को यह बात पता चली तो वह आये और सती के शरीर को हवन कुण्ड से निकाल कर तांडव करने लगे। जिस कारण सारे ब्रह्मांड में हहाकार मच गया। पूरे ब्रह्माण्ड को इस संकट से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने सती के शरीर को अपने सुदर्शन चक्र से 52 भागों में बांट दिया। जो ग जहाँ पर गिरा वह शक्ति पीठ बन गया।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा

श्रीकृष्ण की जीवन लीला – हर कदम एक नया संदेश

रास रासेश्वर पूर्ण पुरूष योगीराज, योगसंदेशवाहक, महाभारत युद्ध के नीति-निर्देशक, दार्शनिक चिंतक लीला पुरूषोतम श्रीकृष्ण का दिव्य चरित्र अद्भूत एवं अलौकिक है। श्रीकृष्ण का अर्थ ही है - जो हमें आकर्षित करता हो, जिसके अंदर कर्षण याने आकर्षण हो। जिनका सामीप्य और सानिध्य हमें परम शांति और आनंद के शिखर की तरफ ले जाता है।

श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व बहुआयामी है। उनका जीवन एक लोकनायक का चरित्र है। वह गोपाल है, गिरधारी है, मुकुंद है, मुरारी है, बंशीधर है, बनवारी है, सरल हृद्य ब्रजवासियों के लिये तो वह रास रसैया, धैनु चरैया, माखनचोर कन्हैया है, गोपियों की मटकी फोडने वाला नटखट कान्हा है, ब्रजबालाओं के चित्तचोर है, राधा के सांवरें, सुदामा के सखा, द्रौपदी के रक्षक है। वह द्वारकाधीश है, पर उन्होंने स्वयं को कभी भी राजा कृष्ण नहीं कहलवाया। उनके इसी लोकनायक छवि ने उन्हें, सर्वभौमिक लोकप्रियता प्रदान की तथा जाती-पांती, संप्रदाय की संकीर्ण दीवारों को तोडकर जन-जन के हृदय को अनुप्रमाणित किया। हिन्दु-मुस्लिम सभी कवियों ने उन पर रचनाएं लिखी। रसखान, रहीम, सुरदास, मीरा, ताजबीबी, नजीर अकबरबादी आदि उनमें प्रमुख है। तैतीस करोड देवी-देवताओं में सबसे ज्यादा साहित्य श्रीकृष्ण पर लिखा गया तथा विश्व की अनगिनत भाषाओं में श्रीमद्भागवत गीता तथा श्रीकृष्ण की लीलाओं का यशोगान हुआ है। श्रीकृष्ण के जीवन की प्रत्येक लीला भक्तों के लिये प्रेरणादायी, ज्ञानदायी है।

नौलाख गायें बाबा नंद के घर थी। कान्हा को माखन चुराकर खाने की कोई जरूरत नहीं थी। पर माखन चोर के रूप में उन्हें प्रेम फैलाया, ऊँच-नीच का भेदभाव मिटाया। सभी वर्गों को समानता प्रदान की। गायों को चराकर गोरक्षण पर जोर दिया। इस कार्य को ऊँच्चाई प्रदान की। यमुना में उतरकर कालिया नाग का मर्दन करना, एक छोटे से बालक के लिये सरल काम नहीं था। पर कालिया पर विजय प्राप्त कर उन्होंने सिद्द किया कि मष्तिष्क और विचारों पर नियंत्रण रख कर विवेक के साथ अगर आप कठिन साध्य भी करगें तो उस पर जीत प्राप्त करेंगे।

माता से उन्होंने सवाल किया “राधा क्यों गोरी, मैं क्यु काला” यहाँ श्रीकृष्ण ने हमें समझाना चाहा सिर्फ भौतिकता की चकाचौंध में मत उलझों अपनी आत्मा को संवारों। एक ऊंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर उन्होंने हमें लक्ष्य दिया कि बौद्धिक नियंत्रणता का एक ही बिंदु पर ध्यान लगाने का ताकि हम संपूर्ण रूप से आध्यात्मिकता से जुड़ सके। अपने लक्ष्य को सिद्ध कर सके। मामा कंस, जयद्रथ, शिशुपाल का वध करके हमें ज्ञान दिया – अहंकार को नष्ट करो। अहंकार ही पतन का कारण बनता है।

सुदामा से मित्रता बतलाती है कि मित्रता में कोई छोटा-बड़ा नही होता, सखा सखा ही होता है। द्रौपदी की रक्षा बतलाती है जब आप सब छोडकर विश्वास के साथ अंतर से परमात्मा की शरण में जाते हो वह आपका रक्षक बनकर आता है। द्रौपदी ने श्रीकृष्ण की उंगली में छोटी सी कतरण बांधी थी और उन्होंने साड़ियों का अंबार लगा दिया। याने प्रभु के लिये आप एक भाग करते है तो वह बदले में सौ गुना करते है। पांडवो का साथ देना सत्य का साथ देना था। प्रायः श्रीकृष्ण को हम नीले परिसर में पीले वस्त्रों से सुसज्जित होठों पर बासुरी लगाये देखते है। नीला रंग संदेश देता है, दुनिया में सबकुछ संभव है। पीला रंग संभवनाओं की प्राप्ति का परिचायक है। वहीं बांसुरी कहती है, अंहकार रहित रहों, मीठा बोलों, बिन बुलाये मत बोलों। श्रीकृष्ण जब बांसुरी के साथ होते राधाजी, उनके संग और गोप-गोपियां इर्द-गिर्द दिखलाई देते है। यह मष्तिष्क, शरीर और आत्मा के बंधन का प्रतिनिधत्व करते है। भागवद्गीता द्वारा वह एक दार्शनिक, उपदेशक के रूप में सामने आये ओर उन्होंने हमें ज्ञान दिया कि आत्मा अकेली आती है, अकेली जाती है, आत्मा अमर है उसे कोई नहीं मार सकता। बुराई को समाप्त करने के लिये सगे-संबधियों को भी त्यागना पडता है।

प्रभाष क्षेत्र में पीपल के वृक्ष के नीचे अपनी ही मृत्युसांझ की प्रतिक्षा में रत उनका वह रूप एक संयासी, एक योगीराज का उच्चतम रूप है। देखा जाय तो उनके जीवन का हर पल हर क्षण, प्रत्येक अवस्था हमें एक संदेश देती है। उनके व्यक्तित्व के कुछ गुणों को अपनाकर साधारण मनुष्य भी असाधारण बन सकता है। अपनी आत्मा का उद्धारक बन सकता है।

तो आईये जन्माष्टमी के इस शुभ अवसर पर आज हम सभी मिलकर प्रण करें कि – हम अपने विकारों का विसर्जन कर, अपनी आत्मा रूपी मंदिर को शुद्धि की सजावट से सजायेंगे-सवांरेगें तथा अपनी चेतना को उस परमपिता की चेतना के साथ एकाकार करेंगे। तभी इसी पर्व की सार्थकता हमारे जीवन में सिद्ध होगी। सभी पाठकों को जन्माष्टमी की बहुत-बहुत बधाई।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा

रक्षा बंधन भाई बहिन के स्नेह और रक्षा का प्रतीक

आज श्रावण मास की पुर्णिमा है याने रक्षा बंधन का पवित्र-पावन त्योहार रक्षा का अर्थ है प्रेम, दया, सहयोग और रक्षण। रक्षा में छिपा है भाईचारे का अव्हान। केवल ज्ञान के पाश्चात् सभी तीर्थकरों की वाणी भी समस्त जगत के जीवों की रक्षा के लियें ही प्रवाहित होती है। वहीं श्रीकृष्ण कहते है - “मैं सज्जनों की रक्षा के लिये और दुष्टों का संहार करने के लिये ही जन्म धारण करता हूँ।” रक्षा शब्द में जीवन की शक्ति है, प्राण है, आत्मा का निज गुण है, मानव के अंतर मानस से प्रवाहित होने वाला एक ऐसा निर्मल निर्झर है जो पाप, ताप और संताप से मुक्त करता है। रक्षा के भीतर मानवीय सुख-दुःख की सहानुभूति, संवेदना उत्सर्ग और कल्याण की भावना छिपी है।

रक्षा बंधन का प्रारंभ कब हुआ यह तो पता नहीं। पर कहा जाता है, देवासुर संग्राम में बार-बार देवों को पराजय का सामना करना पड़ रहा था। देवेन्द्र इंद्र उससे बड़े ही चिंतित थे। तब गुरू वृहस्पति की आज्ञा से इंद्राणी ने इंद्र की दाहिनी भुजा में वेदज्ञ ऋषियों से अभिमंत्रित रक्षा सूत्र बांधा और उन्हें युद्ध के लिये प्रेरित किया और इस बार देवताओं की विजय हुई। यह कथा रक्षा बंधन के प्राचीन स्वरूप को प्रकट करती है साथ ही नारी की प्रतिष्ठा को भी उजागर करती है। कालांतर में यह दिन रक्षा बंधन के पर्व में बदल गया। जहाँ बहन भाई की कलाई में राखी बांधकर उसके सुदर भविष्य और हर कार्य में विजयी भवः की प्रार्थना करती है। अपनी शक्ति को भाई की शक्ति में सम्मलित कर देती है और भाई बहन की सुरक्षा तथा मर्यादा का दायित्व अपने कंधे पर ले लेता है।

रक्षा करने के लिये विष्णु याने विराट बनना होगा। इसी रक्षा की महान भावना से प्रेरित होकर श्रीराम ने धनुष उठाया, कर्मयोगी श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र को। वहीं भगवान महावीर ने जीव रक्षा और जीवदया के पावन उपदेश की व्याख्या की। यह भले हिन्दु त्यौहार हो, पर राखी बांधने पर मुस्लिम भाई भी बहन की रक्षा करने में पीछे नही हटते। मेवाड की रानी कर्मावती ने अपने राज्य और वहाँ के लोगों की शत्रु से रक्षा के लिये मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजी थी और हुमायूँ ने रखी के महत्व को समझकर उसे पुरा मान दिया और अपनी सेना के साथ शत्रुओं से मुकाबला करने मेवाड जा पहुंचा। स्नेह राखी की महत्ता को हुमायूँ ने कुछ यूं कहा कि - “छोटे-छोटे दो धागे जानी दुश्मन को भी मोहब्बत की जंजीर में जकड देते है। यह मेरी खुश किस्मती है कि मेवाड की बहादुर महारानी ने मुझे भाई बनाया।” कहते है कि सिकंदर को महाराजा पुरू ने बंदी बना लिया था, उसे मौत की घाट उतार देना चाहते थे, पर सिकंदर की प्रेयसी ने पुरू के हाथों में राखी बांधकर सिकंदर के लिये जीवन की सौगात मांगी। अतः वीर राजा पुरू ने उन्हें आजाद कर दिया था।

राजपुतों में तो राखी का बहुत ही महत्व रहा है। उनके लिये राखी बलिदान का पर्व रहा है। जहाँ बहनें, माताएँ अपने पुत्रों, भाईयों को रक्षासूत्र बाँधकर देश की रक्षा के लिये युद्ध में भेजती थी। ब्रिटिश शासन काल में वीरों ने हथकड़ी को रखी के रूप में बांधने के भी प्रसंग है। कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने “राखी की चुनौती” कविता में कुछ इस तरह अपनी भावनाओं को प्रकट किया –
“आते हो भाईॽ पुनः पूछती हूँ
कि माता के बंधन की है लाज तुमको
तो बंधी बनो, देखो बंधन है कैसा
चुनौती यह राखी की है आज तुमको”

श्रावण मास की पुर्णिमा को भाई-बहन को अपने घर राखी बांधने के लिये निमंत्रित करता है। बहन बड़ी खुशी से राखी-मिठाई-उपहार लेकर भाई के घर जाती है, भाई को तिलक कर, राखी बांध उसकी आरती उतारती है, मंगल कामना करती है। भाई भी बहन को उपहार देकर उसकी रक्षा का वायदा करता है। कई लोग विशेषकर महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात आदि के तटीय क्षेत्र में रहनेवाले नाविक लोग इस दिन समुद्र किनारे जाकर सागर देवता को नारियल चढ़ाते है, वरुण देवता को अर्ध्य देते है। केरल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और उडीसा जैसे राज्यों में ब्रह्मण समुदाय द्वारा यह दिन “अववि अक्तिम” के रूप में मनाया जाता है। कर्नाटक में यजुर्वेद के आद्येताओं के द्वारा इस दिन को उपकर्म के रुप में मनाया जाता है। उपकर्म को वैदिक शिक्षा के शुभारंभ का दिन माना जाता है। शिक्षा आरंभ के पहले यजुर्वेद के अध्येताओं द्वारा एक-दुसरे के साथ अपना-अपना जनेऊ बदलने की परंपरा भी इस राज्य में मिलती है। बिहार, छतिसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड में इस पर्व को कजरी पुर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। कुछ भागों में इस दिन भगवान शिव की पूजा का उत्सव बड़े जोर-सोर से मनाया जाता है। इसे पवित्रोपासना भी कहते है। अमरनाथ यात्रा का महत्व भी इसी दिन से जुड़ा है। गुरू पुर्णिमा के दिन श्रीनगर से चलकर करीब दो सौ किलोमीटर का लंबा सफर तय कर पुजारियों द्वारा पवित्र छड़ी मुबारक को श्रावणी पुर्णिमा को अमरनाथ गुफा में पहुंचाया जाता है।

यह पवित्र दिन नारी मात्र को माँ-बहन मानकर उसकी अस्मिता की रक्षा करने का संदेश देता है। घर-परिवार-समाज में उसे उचित स्थान मिले। उसकी इच्छाओं का सम्मान हो। विज्ञापन हो या फिल्में या कार्यक्षेत्र हर जगह उसे समान दर्जा, मान तथा सम्मान मिले। उसकी शालिनता, पवित्रता तथा उत्कृष्टता की रक्षा हो। तभी सही मायने में रक्षा बंधन पर्व साकार होगा।

ब्रह्मा भी इस दिन अपने यजमानों को रक्षा कवच बांधकर यह श्लोक बोलते है –
“येन बध्दों बली राजा, दानतेन्द्री महाबलः।
तेन त्वामनुबध्रमि रक्षे चल, मा चल ॥”

कुछ लोग ऋषि पंचमी को रक्षा बंधन के पर्व के रूप में मनाते है। यह बड़े दुःख की बात है कि स्नेह के प्रतीक इस त्यौहार को कुछ लोगों ने सिर्फ लेन-देन का औपचारिक पर्व बना दिया है। रक्षा बंधन का धागा मात्र धागा नही, यह स्नेह सुत्र है, रक्षा कवच है, जिसके हाथों में इसे बांधा जाता है, उनका दायित्व बांधने वाले के प्रति बढ़ा जाता है, केवल उपहार देकर लेकर वह इससे मुक्त नहीं हो सकते। बहनें हरदम अपने भाई की मंगल कामना करती रहे, उसका जीवन सुखमय हो, ईश्वर से यही प्रार्थना करती रहे।

वास्तव में यह पर्व प्रत्येक इंसान का एक दूजे के प्रति प्रेम और विश्वास प्रकट करने का पर्व है। हम भी विष्णु बनकर समाज में व्याप्त कुरीतियों को नष्ट करने का प्रयत्न करें। प्राणी मात्र की रक्षा के लिये ढृढ़ संकल्प करें। तभी इस पावन पर्व की सार्थकता सही मायने में होगी। रक्षा बंधन पर्व की आप सभी पाठकों को शुभकामनाएं।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा

चैत्र सुद को प्रभू महावीर का जन्म कल्याणक

“युग संस्थापक, युग संचालक, युग प्रवर्तक हे युगाधार, युगमुर्ति, युगदृष्टा तुम्हें युग-युग तक युग नमस्कार।”
“विश्वास के बल पर यह दुनिया चल रही है, स्नेह होने से दीप की बाती जल रही है, सवेरा की प्रतिक्षा में बैठे है हम सभी, प्रभु महावीर की कृपा से काली रातें ढ़ल रही है।”
तीर्थंकर, सर्वज्ञ, शिखर पुरूष एक विलक्षण संपूर्ण जीवन दृष्टि, प्रकाश स्तंभ प्रभू महावीर ने बहुत ही सुंदर बात कही है “जो तुम अपने लिये चाहते हो, वही दुसरों के लिये भी चाहो। और जो तुम अपने लिये नहीं चाहते, वह दुसरों के लिये भी मत चाहो। यही जिन शासन है। सभी जीवों के सुख की कामना करो।” महावीर कल्याण मित्र है। वे कहते है मैं जो कुछ कहता हूँ उसे समझ लो, मेरे सहारे लेने की जरूरत नहीं, मेरी शरण आने से तो नया बंधन निर्मित होगा क्योकि दो बने रहेंगे। दो को तो मिटाना है, एक हो जाना है।

प्रभू महावीर आज के युग की महती अपेक्षा है। वर्तमान समस्याओं का समाधान है। इक्कीसवीं सदी की ओर बढ़ते हुये इस समय में जीवन को यदि कोई सुरक्षित रख सकेगा तो वह प्रभू महावीर के सिद्धांत है, उनका दर्शन है, उनके उपदेश है। प्रभू महावीर इस दुनिया के सबसे पहले वैज्ञानिक है। उनका हर उपदेश विज्ञान की भाषा है। हर सुत्र आत्मशुद्धि का सोपान तो है ही साथ ही शारीरिक स्वस्थता, पारिवारिक आनंद, निरोगी काया, शुद्ध विचार, व्यवस्थित जीवन, शांत चित्त इत्यादि अनेक लाभ समाये हुये है। उन्होंने मानव मन का गहराई से स्पर्श किया है। उन्होंने जीवन के हर पहलु से हमारा परिचय करवाया है। अगर दुनिया उनके सिद्धांतों को, अहिंसा, सत्य अपरिग्रह, अनेकांतवाद, अमय, ब्रह्माचार्य आदि को जीवन में अपना ले तो आतंकवाद, अराजकता का नामों निशान मिट जायेगा और संसार और अधिक सुंदर और रहने योग्य हो जायेगा।

महावीर का मार्ग ध्यान का मार्ग है, महावीर की भाषा ध्यान की है। जीवन में जो करो, होशपूर्वक करो कि जीवन ही सारा होश का प्रकाश स्तंभ बन जाये। महावीर ने आत्मा की तीन अवस्थाएं बतलायी है।
1. बहिर आत्मा – जब चेतना बाहर की तरफ बहती रहती है।
2. दुसरी अवस्था है आत्मा की अंतरात्मा – जब चेतना भीतर की तरफ बहती है। कषायों में, विचारों में बहती है बाहर की तरफ – आत्मा की निम्नतम अवस्था। ध्यान में बहती है भीतर की तरफ, मौन में बहती है अंदर की तरफ तब आप अंतरात्मा है। आत्मा की उच्च अवस्था।
3. और आत्मा की तीसरी और उच्च अवस्था – जब चेतना न बाहर बहती है, न भीतर। बहना बंद हो जाता है। वह सिर्फ होती है पर, कोई गति, कोई कंपन नही रह जाता। समाधी, इस अवस्था में आत्मा का नाम परमात्मा है। अनंत आत्माएं है और हर आत्मा में परमात्मा बनने की क्षमता है।

आइये, प्रभू के इस जन्म कल्याणक के शुभ अवसर पर हम सभी यही प्रण ले कि प्रभू के सिद्धांतों को जीवन में उतारेगें और अपनी आत्मा को परमात्मा बनने की तरफ अग्रसर करेंगे। तभी सही मायने में जन्म कल्याणक मनाने की सार्थकता हम जीवन में ला सकेंगे। “प्रभू महावीर की जय”

- श्रीमती मंजू लोढ़ा

प्रत्युषा बनर्जी को एक खुला पत्र

प्यारी प्रत्युषा, कायर प्रत्युषा, जिंदगी से जुझती, जीवन से हारती प्रत्युषा, क्या नाम से पुकारूँ तुम्हें। रील लायफ और रियल लायफ में कितना विरोधाभास एक राहुल की खातिर अपने माता-पिता की ममता, स्नेह को भूला दिया। इकलौती बेटी थी तुम, मरने से पहले उनका जरा सा भी ख्याल नहीं आया। कितनी उम्मीदें जुड़ी थी तुमसे। छोटे से शहर से निकल कर मुम्बई जैसे महानगर में लाखों की भीड़ में तुमने अपनी जगह बनाई। घर-घर में पहचानी गई। माएं सोचने लगी बेटी हो तो ‘आनंदी’ जैसी। ससुराल वाले कहने लगे ‘बहू’ हो तो आनंदी जैसी। क्यों भुल गई उस ‘बालिका वधु’ को जिसने पति को डॉक्टर बनाने में पल-पल सहयोग किया और इससे धोखा खाकर भी चट्टान की तरह अडिग रही। न टूटी न बिखरी बल्कि अपने व्यक्तित्व को नये सिरे से गढ़ा। अपना अस्तित्व बनाया। पूरे गाँव की लाडली बेटी बनी और नया शिव पाया। लेकिन जिंदगी की जंग में तुम सब कुछ हार गई। उस बेवफा प्रेमी का प्यार इतना महंगा था कि उसके लिये जिंदगी की गणित में फेल हो गई। उसका क्या बिगड़ा। वह फिर अपनी नई दुनिया बसा लेगा। दुनिया से तुम गई, चोट माँ-बाप के दिल को दे गई। सखी सहेलियों और चाहने वालों को दर्द दे गई।

नहीं-नहीं तुम्हें इतना कमजोर नहीं होना चाहिये था। ऐसा प्यार करने से क्या फायदा जहाँ तुम्हारी कद्र नहीं हो। अरे सुनो हर मोड़ में रहनेवाली प्रत्युषाओं जीवन अनमोल है। इसे इतना सस्ता मत बनाओं। जिसे तुम्हारी जरूरत नहीं, तुम भी उसे छोड़कर आगे बढ़ा जाओं। माना भगवान ने महिलाओं को बहुत कोमल बनाया है। जब किसी से जुड़ती है तो पूर्ण समर्पण के साथ और बेवफाई मिलने पर भावनात्मक कमजोर क्षणों में अपने जीवन को समाप्त कर देती है। ऐसे में उन्हें घरवालों और दोस्तों के सहारे की जरूरत होती है। जब कोई जिंदगी के ऐसे दौर से गुजर रहा हो, तो उसे अकेला मत छोडों। चाहे वह नाराज हो, फटकारे, धक्के देकर घर से निकाल दे, फिर भी प्यार से उन्हें समझाएँ और उनका संबल बने। प्रत्युषा के माता-पिता की यही गलती उसे अकेला छोड दिया वह इतना तनाव बर्दास्त न कर सकी और जीवन की यह लीला समाप्त कर दी।

आंखों में अनगिनत सपने लिये हजारों प्रत्युषाऐं रोज अपना घर छोड बड़े शहरों में आती है। उनसे मैं यही कहना चाहती हूँ कि जिंदगी में कभी तुम भी इस दौर से गुजरों तो अपने आपको कमजोर मत बनाना। अपने परिवार वालों से बातचीत करना, उनके साथ अपना दर्द बांटना ताकि तुम्हें हिम्मत मिले और तुम इस दुख से बाहर निकलकर अपना जीवन फिर से जीने लगो। याद रखो अगर किसी भी रिश्तों की बुनियाद धोखा है तो जितनी जल्दी हो सके उससे अलग हो जाओं वरना तुम डिप्रेशन में चली जाओगी और उसका कुछ नहीं बिगडेगा। राहुल को सजा हो सकती है या बच जायेगा, इससे क्या? तुम तो जीवन से हाथ धो बैठी।

प्रत्युषा तुम तो हजारों सपने लेकर इस नगरी में आयीं थीं लेकिन तुमने तो सपनों को ही मार दिया। इस खत को पढ़ने वाली तुम कोई भी हो जीवन से कभी हिम्मत मत हारना। जीवन कठिन जरूर है पर नामुमकिन नहीं। यह संघर्ष तो हर युग से चला आ रहा है। इस संघर्ष का हल है, जीजीविषा मौत नहीं। तुम्हें इस तरह छोटी उम्र में नही मरना चाहिये था प्रत्युषा। इससे अच्छा होता अपने शहर, माता-पिता के पास लौट जाती और उनके सहारे कुछ नया जीवन गढ़ लेती।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा

नवरात्रि – नारी शक्ती की अदृश्य महिमा का पर्व

नवरात्रि दुर्गा माता की उपासना का पर्व है। नौ दिनों तक यह पर्व वास्तव में शक्ति की उपासना का उत्सव है। दुर्गा उपासना के लिये यूँ तो हर दिन शुभ एवं उपयुक्त होता है। लेकिन नवरात्रि में दुर्गा अर्थात शक्ति की पूजा का विशिष्ट महत्व है। नवरात्र की महिमा के महात्म्य के बारे में ब्रह्मा ने गुरू वृहस्पति को जो बतलाया था, उसके मुताबिक कुल मिलाकर नवरात्रि शक्ति उपासना का ही पर्व है। धर्माचायों के अनुसार, वर्ष में चार बार नवरात्रि व्रत का विधान है। चैत्र, अषाढ़, अश्विन और माघ का शुक्ल पक्ष, वर्ष में ये चार नवरात्रियाँ आती है। लेकिन इनमें भी चैत्र और अश्विन की नवरात्रि के दिनों की महिमा कुछ ज्यादा मानी गई है। इस अवसर पर दुर्गा और उनके विभिन्न स्वरूपों की पूजा का विशेष महत्व है।

सृष्टि की आदि शक्ति है मां दुर्गा। मां दुर्गा ने दुष्ट महिषासुर का वध किया था। कहते है कि देवताओं पर मां भगवती की कृपा की वजह से ही उनकी शक्ति और सामर्थ स्थिर रहते है। समस्त देव माँ दुर्गा की शक्ति से प्रेरित होकर कार्य करते है। यहाँ तक कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी बिना माँ दुर्गा की इच्छा या शक्ति से सर्जन, पोषण एवं संहार नही कर पाते। परमेश्वरी दुर्गा के जो नौ स्वरूप है, उन्ही के अनुसार नवरात्रि के नौ दिनों में हर रोज इन्ही अलग-अलग रूपों की पूजा होती है। नवरात्रि के अंतिम दिन कुवारी कन्याओं की पूजा का विधान है। कन्या के रूप में शक्ति का पूजन करके लोग नवरात्रि के इस दिन को शक्ति अर्जन दिवस के रूप में भी मनाने की मान्यता है।

वास्तव में नवरात्रि का पर्व नारी शक्ति की अदृश्य महिमा का पर्व है। नारी जो सृष्टि है, पृथ्वी है और प्रकृति है। नारी जो सरस्वती है, लक्ष्मी है, अन्नपूर्णा है, दुर्गा है। जिस तरह से नवरात्रि में माँ की पूजा, उपासना होती है, समाज को चाहिये वह नारी की अस्मिता का सम्मान करें, उसको आदर-मान दे। पुरूषों के समकक्ष उसके गृहणिस्वरूप को गौरव मिले। लक्ष्मी के बिना नारायण, सीता के बिना राम, पार्वती के बिना शिव तथा राधाजी के बिना श्रीकृष्ण अधूरे है, अपूर्ण है। शक्ति के बिना शिव अधूरे है, अनादि काल से यह परंपरा चली आ रही है इसलिये शक्ति की उपासना, पूजा अति आवश्यक है। अपहृत सीता को ढूंढते हुये व्याकुल राम ने लक्ष्मण से कहा ‘लक्ष्मण तुम नहीं जानते मैंने किसे खो दिया है।’ लक्ष्मण कहते है, ‘जानता हूँ भैया, हम आपकी पत्नी और माता को ढूंढ रहे है।’ राम रो उठे, ‘नही लक्ष्मण वो केवल मेरी पत्नी नहीं, मेरी मित्र, मेरी सखा, मेरी माता, मेरी सहयोगी, मेरे पुरूषार्थ की शक्ति थी, वह मेरा सर्वस्व थी।’ यह है नारी की गरिमामयी भूमिका, नारी का महत्व, जिस दिन हर महिला इस स्वरूप को जी सकेगी, वह होगा सच्चा जागरण। परमात्मा ने नारी को सृजन की ताकत दी है इस रूप में वह पूजनीय है, वंदनीय है। लेकिन विडंबना यह है कि उसे देवी बनाकर हम मंदिर में पूजनीय तो बना देते है लेकिन इंसान बनकर जीने नहीं देते। पुरूष प्रधान यह समाज उसके त्याग, सेवा, परोपकार, स्नेह, ममता आदि गुणों का सम्मान तो करता है, लेकिन उसे उसकी इच्छाओं के, सपनों के सहारे जीने नहीं देना चाहता। उसकी कमजोरियों को स्वीकार नही करना चाहता। भले ही हम 21वीं सदी में प्रवेश कर चुके हो या हम साल में चार-चार नवरात्रि मना ले, नारी के व्यक्तित्व को दोयम दर्जे पर ही देखना चाहते है। चंद गिनी-चुनी महिलाओं को छोड दे तो भी 80 प्रतिशत महिलाएँ आज भी अपने हक की लडाई लड़ रहीं है। घर-बाहर की दोहरी जिम्मेदारियाँ संभाल रही है। पहाडों पर रहने वाली महिलाएं तो और कठिन जीवन जीती है। संघर्ष जारी है, कुछ सफलता मिली भी है, लेकिन मंजिल अब भी दूर है।

“आसान नहीं है अधिकारों का मांगना
आसान नहीं है मन का चाहा करना
आसान नही है आसमान अपना तलाशना
पग-पग पर बिछे है संघर्षों के कांटे
लहु-लुहान हुई कई बार, और न जाने कितनी बार
लेकिन अब जान चुकी हूं अपने भीतर छिरी शक्ति
और कोशिश कर रही हूं, अपने अस्तित्व को पाने की
न जाने कितने युगों से चल रहा है यह संघर्ष
पर हौसला बिखरने नही दिया
कागज की स्याही बन, इतिहास के पन्नों में
दफन हुई तो अमर भी हुई
यह संघर्ष चलता रहेगा, चलता रहे
पर न हारूंगी, न रूकुंगी
सफर शुरू किया है तो मंजिल प्राप्त कर ही लुंगी।”

सच कहुं तो नवरात्रि का पर्व यही संदेश लेकर आता है कि समाज में नाकी को उसका सही हक, अधिकार और सम्मान मिले। और तभी मां दुर्गा के प्रति हमारी पूजा सार्थक होगी। भारतीय पंरपराओं में नारी को शक्ति का स्वरूप कहा गया है। आज मैं हर नारी से यही आह्वान करना चाहती हूँ कि अपने भितर छिपी दुर्गा को पहचाने, अन्याय का डटकर मुकाबला करें और नारी के अस्तित्व की, मान की, मर्यादा की रक्षा स्वयं करे।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा

कविता – “माँ-बेटी”

मेरे आंचल की गांठ में कोई सीख नहीं
बची है तुम्हें देने को
मेरे पास न धन-दौलत है तुम्हें देने को
न तुम्हें मैं अपनी नाकामियाँ देना चाहती हूं
न तुम्हें मैं अपनी कमजोरियाँ देना चाहती हूं
मैं बस दुनिया से लड़ने और तुम्हारे कदमों की ताकत बनना चाहती हूं
तुम्हारे हर कार्य की साथी बनना चाहती हूं
हर हालात में सच बोलने की तुम्हारी हिम्मत बनना चाहती हूं
अन्याय के विरूद्ध उठे तुम्हारे हाथों का औजार बनना चाहती हूं
तुम्हारे सपनों को छू लेने का आसमान बनना चाहती हूं
मेरी लाड़ो, मेरी बिटिया
जिंदगी में कभी हार कर तु न रुकना तेरी मंजिल की मै राह बनना चाहती हूं
बस तु युंही आगे बढ़ती रहना
तेरे परों के उड़ान की मैं
संकल्प शक्ति बनना चाहती हूं, संकल्प शक्ति बनना चाहती हूं।।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा

पति प्रेम का प्रतीक – गणगौर पूजन

गौरी या गणगौर पूजन चिर-पुरातन और चिर-नूतन समझा जाता है। फाल्गुन कृष्ण की एकम से प्रारम्भ होकर चैत्र-शुक्ल की तृतीया तक गणगौर की पबजा की जाती है और अंतिम दिन विसर्जन होता है। गौरी पूजन का महत्व जानकी जी द्वारा मनचाहा वर मांगने के लिए गौरी पूजन से समझा जा सकता है। इस पूजा और आशीर्वचन का रामायण में बडा ही मनोहारी वर्णन है-
“मनु जाहि राच्यो मिलही सो वर सुंदर सांवरो
करुणा निधान सुजान सील सनेहु जानत रावरों
एहि भाँति गौरी असीस सुनि सिय सहित हिय हरषिं अली
सीता भवानी हि पूजि पुनि मुदित मन मंदिर चली।”
पुराणों के अनुसार पार्वती ने शिव को वर रुप में पाने के लिये घोर तपस्या की। शिवजी ने प्रसन्न होकर पार्वती से विवाह किया। पत्नी को इतना स्नेह और सम्मान दिया कि उसे अपना आधा अंग ही बना लिया। इसलिये ऐसी मान्यता है कि यह व्रत स्त्रियों के प्रति पति को प्रेम बढ़ाता है। इस व्रत के पालन से कन्याओं का विवाह शीघ्र होता है और उन्हे कुलीन, धनवान तथा विद्वान वर की प्राप्ति होती है।
राजस्थान की सुखी माटी में वसंत के आते ही उत्साह और उल्लास की मानो धूम मच जाती है। कुंवारी लडकियाँ 16 दिन तक बड़े मनोयोग और चाव से शिवजी को अपना जीजा मानते हुए, सुंदर रंग-बिरंगे वस्त्र पहनकर होली के दुसरे दिन से ही पूजा शुरू कर देती है। पहले दिन होली की राख और गोबर से पिंडिया यानि ढ़ेले बनाकर उसे मिट्टी के कुंडे में रखकर दूब और फूल से 8 या 9 दिन पूजती है। इसके बाद शीतला सप्तमी या अष्टमी को बड़ी गणगौर बिठाई जाती है। इस दिन चिकनी मिट्टी से शिव (ईसरजी), पार्वती (गणगौर), कानीराम (कृष्णा), रोआँ (सुभद्रा) और मालिन की मूर्तियाँ बनाई जाती है और उसका श्रृंगार किया जाता है।
(कहते है कि आठ दिन तक पहले गणगौर अकेली अपने पीहर में थी। इसके बाद ईसरजी उन्हें लिवाने जाते है, तब उन्हें भी वहाँ रोक लिया जाता है। वह भी आठ दिन तक वहाँ रुकते है। तब दमादजी की खूब खातिरदारी होती है – सुबह-दोपहर-रात को गीत गायें जाते है।)

लड़किया सुबह-सुबह नहाकर वंश के फैलाव की प्रतीक दूब और फूल लाने जाती है। साथ में गणगौर के गीत बड़े ही सुरीले लगते है। पूजा के समय भी गाये जाते है। पहला मुख्य गीत है –
“गोर ये गणगोर माता, खोल किंवड़ी
बायर (बाहर) उभी बयाँ (सब का नाम लिया जाता है) पूजणवाली
पूजो ए पुजावो सैय्यों क्या वर माँगो
माँगा ये महे अन-घन-लाघर (वैभव) लिंछमी
कान्हा कंवर सो बीरो माँगा राई सी भौजाई
जलहर (पानी से भराबा दल) जाभी बाबल माँगा
रातादई (जिसने मेरे लिये अपनी नींद गंवाई) भायड
फूल पिछगेकड़, फूफो मांगा, भांडा पोवन भूता
ऊँट चढ़यो भैंणोई मांगा, चुडलै वाली भैणल
लाल दुमालै चाचो मांगा बिणजारी सी चाची”
इसी तरह गणगौर के हर विधा के अनेक गीत है जो हमारी समृद्धि लोकभाषा के प्रतीक है। विवाहिता स्त्रीयाँ चैत्र सुदी तीज यानि पबजा के अंतिम दिन पूजा करती है। सुहाग, पुत्र, पौत्रादि की लम्बी आयु का वर मांगती है। अंत में बधावा गाया जाता है। इस गीत में स्त्री परिवार को अपना गहना बताकर अपनी सास को बधाई देती है।
“म्हारै आंगण फूल्यों केवड़ो, पिछवाडै जी पसरी गजबेल
सहेल्यो ए आंबो मोरियो।
म्हारा सुसरोजी राजा राव, सासूजी म्हारी रतन भंडार।”
राजस्थान में आज भी बीकानेर, जयपुर आदि स्थानों पर बहुत धुमधाम से गणगौर का बिंदोरा निकाला जाता है।

गणगौर की कथाः गणगौर पूजा के पीछे एक कथा प्रचलित है। कहते है कि बहुत समय पहले एक राजा और एक माली था। एक राजा ने अपनी बाग में चने का पौधा लगाया और माली ने अपने घर में दूब बोई। जब माली ने यह देखा की राजा का चने का पौधा तो बढ़ता ही जा रहा था और उसकी दूब घटती जा रही थी, तो इसका कारण पता करने के लिए वो एक दिन अपने बगीचे में छिपकर बैठ गया और देखने लगा। सुबह होते ही उसने देखा कि कुछ लड़कियाँ हंसते गाते हुए उसके बाग में आई और दुब तोड़ने लगी। तब माली ने उसके पास जाकर उनका सामान छिन लिया और कहा ‘तुम लोग रोज मेरे बाग से दूब तोड़कर ले जाती हो। आज मेरी पकड़ में आई हो। अब बताऊंगा तुम्हें।’
तब लड़कियों ने माली से कहा - ‘हमें छोड़ दो। हम गणगौर माता की पूजा के लिए दूब तोड़कर ले जाते है। 16 दिन बाद पूजा समाप्त होने के पाश्चात हम तुम्हें कुण्डारा भरके सीरा-लापसी देगें, लेकिन अभी तुम हमें छोड़ दो।’ माली राजी हो गया। 16 दिन के बाद लड़कियों ने माली को ढ़ेर सारा सीरा-लपसी ले जाकर दिया। माली ने सब चीजें कोठरी में रखकर सांकल बंद कर दी। थोड़ी देर बाद मालण का बेटा बाहर से खेलता-कूदता आया और भूख-भूख की जिद करने लगा। मालण ने उसे कोठरी से सीरा-लापसी लेकर खाने के लिए कहा। जब वह कोठरी खोलने लगा तो वह खुली नहीं। तब मालण ने आकर कोयला से काजल, टीकी में से रोली-चावल, मींड़ी में से मैण और चिटली अंगुली में से मेंहदी निकालकर छींटा दी, तब कहीं जाकर कोठरी का दरवाजा खुल गया। जब मालण ने अंदर झांका तो देखा कि सोने के झूले पर ईसरजी विराजमान है और गोरांदेवी पाग संवार रही है। चारों ओर हीरे-मोती झिलमिला रहे हैँ और धन-धान्य से भंडार परिपूर्ण है। माली और मालण ईसरजी का दर्शन करके धन्य हो गए।
इसी कारण से गणगौर की पूजा और व्रत का बड़ा महत्व है। स्त्रियाँ इस व्रत पालन करके और पूजा करके ईश्वर से मालण और माली जैसा भाग्य प्रदान करने की प्रार्थना करती हैं। अपने पति के चिरायु होने का वर मांगती है।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा

30 मार्च राजस्थान स्थापना दिवस पर एक झलक मेरे राजस्थान की

“हम राजस्थान निवासी, यह देश कंटीली झाड़ी का
करनाल घारिणी नारी का, हम तो तुफानों में जन्में
आंधी में पलने वाले, कांटो की रोटी खा-खाकर
रिपु दल का दलने वाले”
वो हवामहल, वो जोधपुर का समां, मिर्ची वड़ा उम्मेद भवन, वो जयपुर की रजाई, वो माउंट आबु की गुलाबी सरदी, नक्की झील, देलवाडा का नक्कशीदार जिन मंदिर, ब्रह्मा कुमारी का विशाल आश्रम, वो जैललमेर की भयानक गरमी और रेत के टीले, वो झीलों की नगरी उदयपुर के नजारे जहाँ दिखते है महल ही महल सारे, वो कोटा का कॉलेज जहाँ मिलता है नॉलेज, वो बाडमेर की धरती से निकले खनिज पदार्थ, वो नथद्वारा के मंदिर, वो सालासार के हनुमानजी, वो रामदेवडा के रामापीर, वो नकोड़ा के भैरूजी, वो रणकपुर का अनगणित खंमों का जिनालय, वो भीनमाल का बहत्तर जिनालय, वारास्वामी का मंदिर, वो अजमेर की दरगाह, वो पुष्कर में स्थित दुनिया का एकमात्र विष्णु मंदिर और मालपुर, वो नसीरबाद का कचोरा, वो बिकानेर की कचौरी और गणगोर की सवारी, वो आखा तीज का सावा और डुंगरपुर का मावा, वो पाली की रेवडी, वो सोनपुर का हलवा, वो गजक, घेवर, फीणी और तिल पपडी, वो भरतपुर की बर्ड सेंचुरी, वो रेगिस्तान के ऊँट, वो बागों में नाचते मोर, वो अरावली पर्वत, वो गंगा नहर, वो हवेलियाँ, बुर्ज, किले, वो राजस्थान की हस्तकला और मधूर लोकगीत, वो घुमर, वो लहरिया और गोटा की चुनरीया, वो घूंघट में शरमाती दुल्हनिया और वो दुल्हे की रजवाडी पगड़ी, वो सावन के झूले और तीज, वो होली की हुडदंग और गोर, वो कवि माघ, चंदर बंदायु, और कन्हैयालाल सेठिया का अमर काव्य, वो ढ़ोरा मारू की प्रेम ढोला कहानी, वो वृदासर के वीर, वो बूंदी हाडा रानी, चितौड़ के किले, वो महाराणा प्रताप का संघर्ष और बहादुरी, वो भामाशाह की दानवीरता, वो पृथ्वीराज चौहान की शुरवीरता, वो चंदन का बलिदान, वो कर्मावती की राखी, वो पद्मीनी का जौहर, वो पन्नाधाई की स्वामिभक्ति, वो राणा सांगा की शक्ति और मीरा की कृष्णभक्ति – क्या-क्या बखान करूँ इस अलबेली बीरों की रंग-बिरंगी धरती का, यह तो एक झलक है जहाँ के जर्रे-जर्रे में समाया है एक इतिहास, कहने को तो है रेगिसेतान पर इसके कण-कण में है नखलिस्तान – ऐसा महान है मेरा राजस्थान – मेरा राजस्थान
“सोने की धरती, चांदी का आसमान
रंग रंगीलों है म्हारो राजस्थान”

- श्रीमती मंजू लोढ़ा

आत्मशुध्दि का पर्व, पर्वाधिराज पर्युषण पर्व

“लहरों को मझधार नहीं, किनारा चहिए, हमें चांद नहीं, सितारा चहिए
मोह-माया में भटकी, इस आत्मा को, प्रभु महावीर के संदेशों का सहारा चहिए”

जैनों के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर का नाम लेते ही व्यक्ति नहीं, सत्य का आभास होने लगता है। सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांतवाद, ब्रह्मचर्य, अभय, क्षमा के प्रतिक भगवान महावीर के उपदेशों, सिध्दांतों के प्रसार, प्रचार की आज अत्यंत आवश्यकता है।
आज समस्त विश्व हिंसा की कगार पर खड़ा है, ऐसे में जरूरत है विश्व मैत्री दिवस, क्षमा-यापना दिवस मनाने की। जैनों का महत्वपूर्ण महापर्व पर्वाधिराज पर्यूषण एवम् क्षमापर्व संवत्सरी-दिवस फिर एक बार दुनिया को क्षमा का, प्रेम का अमर संदेश देने के लिये आ गया है।
पर्युषण शब्द संस्कृत का शब्द है। प्रकृति अर्धमागधी में इसे पज्जोसवणा, पज्जुसणा या पज्जोसमणा कहा जाता है। कहते है वर्ष में चार अष्टान्हिक पर्व आते है, कुछ प्राचीन ग्रंथों में छह अष्टान्हिक (आठ दिनों तक मनाया जाने वाला) पर्वो का उल्लेख है। माना जाता है कि इन दिनों में देवगण नंदीश्वर दीप पर आते है और वहाँ अट्ठाई महोत्सव मनाते है। यह अठाई महोत्सव आठ दिनों का होता है, इसलिये पर्युषण पर्व आठ दिन का मनाने की एक प्राचीन परंपरा चल रही है।
अष्टान्हिक पर्व यह है – 1. आषाढ़ सुद 7 से 14 2. अश्विन सुद 7 से 14 3. चैत्र सुदि 7 से 14 4. भाद्रपद मास में धूमधाम से मनाया जानेवाला पर्युषण पर्व (12 से 4) 5. कार्तिक सुदि 7 से 14 6. फाल्गुन सुदि 7 से 14 पर्वाधिराज पर्युषण पर्व जो आत्मा के निकट जाकर परिमार्जन, परिश्करण, प्रतिक्रमण का अर्थबोध प्रदान करता है। आत्म-ज्ञान से शाश्वत संदेश देता है। आठ दिन तक मनाया जानेवाला यह पर्व शुध्द आध्यातमिक पर्व है। इसके भी दो पक्ष है- बाह्य और आंतरिक। बाह्य की साधना में श्रावक-श्राविका उपवास, पोसध, प्रतिक्रमण करना व्याख्यान (प्रवचन) सुनना, कंद-मूल, हरी सब्जियाँ, रात्री भोजन का त्याग करना, ब्रह्मचर्य का पालन, साधर्मिक भक्ति, अभयदान, क्षमापना और अठ्ठम तप आदि कर्तव्यों का पालन करते हैं।
जैन साहित्य में आठ अंक विशिष्ठ महत्व रखता है। सिद्ध भगवान के आठ गुण बताये गये हैं जो आठ कर्मों का क्षय करने से आत्म-स्वभाव के रूप में प्रकट होते है। साधु की प्रवचन माता आठ है। अष्ट मंगल जो प्रत्येक शुभ कार्य के पहले मांड़े जाते है। आत्मा के सूचक प्रदेश भी आठ है। अठाई पर्व के भी आठ दिन है। ये सारी क्रियाएँ भी एक तरह से आंतरिक पक्ष को संबल प्रदान करती है। दूसरा पक्ष है आत्मशुद्धि, विश्वमैत्री और क्षमा-यापना का।
कहते है, अंतस के दो प्रबल शत्रु होते है – राग और द्वेष। ये दो शत्रु ही हमारे नैतिक पतन का प्रमुख कारण बनते हैं। क्रोध, मोह-माया-लाभ, परिग्रह के शिकंजे में फंसकर मानव अनगिनत अपराधों में लिप्त हो जाता है। ये पर्व हमें संदेश देता है। कटुता, अनबन, राग-द्वेष के भावों से मुक्त होकर क्षमा, प्रेम, स्नेह, मानवता और आत्मशुद्धि के रंग में रंग जाओ। आत्मशुद्धि के लिये सबसे महत्वपूर्ण है क्षमायाचना, वह भी अंतस से होनी चाहिये ताकि मन में कोई विकार बाकी न रहे।
ओशो कहते है “महावीर सिर्फ जैन नहीं थे, वे जिन थे, स्वयं को जीतने वाले”। आत्म रुपांतरण की जो राह महावीर ने दिखाई वह आज भी उतनी ही सार्थक है। संवत्सरी दिवस के चार महत्वपूर्ण अंग है, चार आवश्यक कर्तव्य है जो साधक को करने चाहिये। उपवास, प्रतिक्रमण, आलोचना और क्षमापना। उपवास से तन-मन दोनों की शुद्धि होती है।
उपवास का मतलब होता है, अपनी आत्मा में रमण करना। भगवान महावीर चार-चार महीनें का उपवास करते है। वह इस बात का सबूत है कि उनके पास कितनी आत्मिक शक्ति थी। आज भी कई साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका मासक्षमण (30 उपवास) या उससे अधिक का उपवास करते है। आप भीतर चले जाते है तो बाहर का स्मरण छूट जाता है। महावीर की “काया-क्लेश” का मतलब यही है कि काया की ऐसी साधना की जाय़, उसे ऐसा नियंत्रित किया जाय कि काया बाधक न रहकर साधक हो जाए। आज इस अर्थ को लोगों तक पहुँचाने की अत्यंत आवश्यकता है ताकि वीर की वाणी, वीर की धरा समूचे जगत में अखंड बहती रहे और अंतस के अंधेरे में सबके अंतर दीप जलते रहे।
“संवत्वरी दिवस” का सबसे बड़ा कर्तव्य है क्षमापना। महावीर कहते हैं, क्षमा मांगने से मनुष्य छोटा नहीं होता है, बल्कि जो क्षमा मांगता और क्षमा देता है वह वीर होता है। ‘क्षमा वीरस्य भूषणम’ महावीर का जीवन चरित्र पढ़े वह कभी किसी से नहीं डरें। जो भी व्यक्ति आध्यात्मिक विकास करेगा, अपनी चेतना का उद्वारोहण करेगा उसका भय समाप्त हो जायेगा। जिस वीर के हाथ में क्षमा का अमोध्य शस्त्र है, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। क्षमा से शत्रु भी मित्र बन जाते है। क्षमापना का संदेश आत्मशक्ति का संदेश है, जीवन शुद्धि का महोत्सव है, विश्वमैत्री की भावना है। यही भाव जीवन को निर्मल बनाता है। (संवत्सरीक प्रतिक्रमण द्वारा वर्षभर हुई भुलों की, पापों की हम समालोचना करते है।)
आठ दिन का यह समय अध्यात्म चिंतन का समय है। आत्मा से सभी विकारों का विसर्जन करने का समय है। समस्या के समाधान का समय है। आज इस पावन दिवस पर हम आभय बनने का संकल्प करें, मन को पवित्र और निर्भय बनाने का मार्ग प्रशस्त करें।

“खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमतु में, भिति में सव्वे भुएसु वेर मज्जं न केणई”

- श्रीमती मंजू लोढ़ा

आध्यात्मिक उत्थान का अवसर – चार्तुमास

वर्षाकाल के चार महीनों को चार्तुमास के नाम से जाना जाता है। चार्तुमास का समय आषाढ़ी पूनम से लेकर कार्तिक पूनम तक होता है। प्रत्येक तीन वर्षो के पश्चात् चार्तुमास चार महीनों की जगह पांच महीनों का हो जाता है। इस वर्ष चार्तुमास 21 जुलाई से शुरू हो रहा है। बरसात के मौसम में अत्यधिक सूक्ष्म जीवों की उत्पति होती है और उससे सारी धरती आकीर्ण हो जाती है। आवागमन या विहार करने से उन जीवों का घात हो सकता है। अतः अहिंसा धर्म का सूक्ष्मता से पालन करने वाले सभी साधु-संत अपने शिष्यों सहित एक ही स्थान पर निवास करते है, वर्षायोग की स्थापना करते हैं।
भारत में जैन साधु-साध्वी हीं नहीं बल्कि अन्य धर्मों के साधु-संत भी इस क्रिया का पालन करते है तथा इस अवधि में ईश्वर का ध्यान करते हुये जीवदया, करुणा, सेवा, साधर्मिक भक्ति, व्रत, उपवास, परोपकार आदि प्रशस्त कार्यों को करते है तथा अपने भक्तों को प्रेरणा देते है। वैसे तो साधु की गति सदैव नदी की निर्मल धारा की तरह होती है - सदैव चलते जाओ, बहते जाओ। लेकिन लोगों के अंदर धर्म की भावना प्रबल हो इसलिये यह परोपकारी गुरु चार मास एक जगह रुकते है तथा हमें धर्म की बारीकियां समझाते हैं और सद्मार्ग पर चलने की सीख देते है। यही कारण है कि आज भी हमारा देश प्रगतिशील आधुनिक होते हुये भी उतना ही धार्मिक और परंपरावादी है।
हिन्दू धर्म में कहा जाता है कि चार्तुमास के वक्त भगवान श्री विष्णु क्षीरसागर में शेषशय्या पर योगनिद्रा में शयन करते है। इसलिये इन महिनों में शादी-विवाह, गृहनिर्माण, यज्ञ आदि कार्य नहीं किये जाते। ये चार मास तप-तपस्या, जप के लिये उपयुक्त है। अधिकतर हमारे धार्मिक त्यौहार इन्हीं महिनों के बीच में आते है। जैनों का पर्व- पर्युषण-पर्व, क्षमा-यापना दिवस, गणेश उत्सव, नवरात्रि आदि पर्व चार्तुमास के दौरान बड़े पैमाने पर हर्षोल्लास के साथ मनाये जाते है। अधिकतर लोग श्रावण मास का व्रत, उपवास रखते है। वहीं इस्लाम धर्म में भी रमजान के महिने में एक माह का व्रत रखने का प्रवधान है। पांचो वक्त की नमाज पढ़ना, दान देना, अपने पापों का प्रायश्चित करना एक सच्चा मुसलमान कुरान में लिखे गये नियमों का पालन करता है। चार मास तक देवता के सोने के प्रतीकात्मकता को यदि हम सोंचें तो इसका अर्थ है इन चार महिनों में हमारी प्रवृत्तियां, हमारी क्रियाएं भौतिक स्तर पर कम हो जाए (सोना याने निवृत्ति, जगाना याने प्रवृत्ति) हम बाह्यमुखी से अंर्तमुखी बन जायें। परिधि से केंद्र की ओर जाये।
एक बार जयंति श्रावका ने भगवान महावीर से पूछा, ‘प्रभु मनुष्य का जागना अच्छा या सोना’। भगवान ने कहा, ‘दोनों’। वह कैसे? उसने पुनः प्रश्न किया। प्रभु ने कहा, ‘जो हिंसा, असत्य, चोरी, कपट, लोभ, मोह-माया से ग्रसित रहता है, उसका सोना ही अच्छा है ताकि दूसरों को तकलीफ न हो। जो व्यक्ति अहिंसाप्रेमी, संयमी, सदाचारी, परोपकारी, सेवाभावी, धर्मनिष्ठ है उनका जागना अच्छा है ताकि उनके जीवों का कल्याण हो।’ भगवान श्रीकृष्ण ने भगवान नेमिनाथ के समक्ष तथा सम्राट कुमार पाल ने आचार्य श्री हेमचन्द्रसूरी मा.सा. के समक्ष यह नियम लिया कि वह चार महीने एक ही स्थान पर रहेंगें, ताकि जीवदया का पालन हो सके। हमारे धर्म में व्यक्ति की नही व्यक्तित्व की पूजा-उपासना होती है। जो संदेश देती है कि आप भी परमात्मा के पद को प्राप्त कर सकते है इसके लिये आपको अपना आचार-विचार उच्च कोटि का रखना होगा। इसका पालन करने में कठिनाइयां भी आती है, पर धर्म में छूट या शैथिल्यता के लिये जगह नहीं है। इन धार्मिक महीनों में जितना ज्यादा हो सके नियमों का पालन करना चाहिए। दान-ध्यान, तप-तपस्या, सत्संग अधिक से अधिक करना चाहिए। जैनधर्मावलंबियों को रात्रि भोजन का त्याग करना चाहिये, दोनों समय प्रतिक्रमण करना चाहिये तथा व्यख्यान सुनने चाहिये।
इस तरह से चार्तुमास के अंतर्गत हमें अपनी भौतिक सुख-सुविधायों से युक्त क्रियाओं का त्याग कर आत्मिक स्तर की क्रियाओं को मांजना होगा, तपाना होगा। शारीरिक व्रत के साथ-साथ मानसिक व्रत भी करना होगा। तभी हर तरह से हम आध्यात्मिक उन्नति कर पायेंगे। चार्तुमास में देवशयन का रुपक हमें बाह्यमुखी वृत्तियों से हटकर अंर्तमुखी बनने का संदेश देता है। अंतर जागरण करो और जीवन को धर्ममय बनाओ। कहते है चार्तुमास बालटी में एक-दो बिल्वपत्र डालकर मन में ‘ॐ नमः शिवाय’ का मंत्र 4-5 बार बोलकर स्नान करें तो विशेष लाभ होता है। उससे शरीर का वायु दोष दूर होता है और स्वास्थ्य स्वस्थ रहता है। जैन साहित्य में आचार्यों ने धर्म आराधना के लिये महीनों की तिथियों को तीन विभागों में बांटा है ताकि श्रावक उसके अनुकूल धर्म साधना का कार्यक्रम बना सके (यों तो हर दिन आराधना हो सकती है)।
छः चारित्र तिथियाँ – 2 अष्टमी, 2 चौदस, अमावस व पूनम यह छह तिथियाँ चरित्र तिथियां है। इन दिनों में उपवास, पौपध, संवर, दया आदि तप के चारित्र धर्म की वृद्धि करनी चाहिये।
छह ज्ञान तिथियाँ – 2 दूज, 2 पंचम, 2 एकादाशी इन छह ज्ञान तिथियों में ज्ञान, शास्त्र-स्वधाय, आगम श्रवण, ज्ञान प्रसार, ज्ञानीजनों का सम्मान करना चाहिये।
19 दर्शन तिथियाँ – 2 एकम, 2 तीज, 2 चौथ, 2 छठ, 2 सातम, 2 नवमी, 2 दसमी, 2 बारस, 2 तेरस इन दर्शन तिथियों में सम्यक्त्व शुद्धि, स्वधर्मी वत्सलता, देव-गुरु वंदन आदि सम्यक्त्व की शुद्धि और शासन प्रभावना के कार्य करने चाहिये।
‘तन का बहुत श्रृंगार किया हमने, धन का भी सहेज अंबार कर लिया, अब तो भीतर जाग कि मन का कितना श्रृंगार किया हमने।’
याद आती है एक कहानी, मुगल बादशाह अकबर ने दरबारियों से पुछा – बारह में से चार गये तो कितने बचे? सबने कहा ‘आठ’। पर बीरबल चुप रहा। बादशाह ने बीरबल से जवाब मांगा। बीरबल ने उत्तर दिया – शून्य। अकबर ने पूछा कैसे? बीरबल ने बोला - ‘अगर बारह महिनों में से बारीश के चार महिने निकल गये तो न फसल होगी न जीवनयापन, तब सिर्फ शून्य ही बचेगा। और आध्यात्मिक स्तर पर धर्म के यह चार महीने निकल गये तब भी बचा शुन्य। इन चार महिनों में साधु-संत एक जगह रहकर धर्म की देशना देते है। मनुष्य को उचित मार्ग समझाते है। अगर यह चार महिने हमने प्रमाद में गवां दिये तो हमारे जीवन में भी बचा शुन्य। अगर चार्तुमास के यह चार महिने न हों तो भौतिक और अध्यात्मिक दोनों सृष्टियों से मनुष्य के लिये क्या बचेगा? सोचकर देखिये सिर्फ शून्य।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा