Articles | Smt. Manju Lodha

अज्ञानता के अंधकार को दूर करनेवाला पर्व - ज्ञान पंचमी

भारतीय संस्कृति पर्व प्रधान है। प्रत्येक त्यौहार अपने साथ एक इतिहास, एक विशेष संदेश लेकर आता है और हमें हमारी परंपराओंसे परिचित कराता है। दीपावली के पश्चात् आने वाली ज्ञान पंचमी अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर ज्ञान रुपी दीपक जलाने की प्रेरणा लेकर आती है। ज्ञान की महिमा का प्रचार और प्रेरणा लेकर आनेवाली ज्ञानपंचमी जो कि पूर्णा तिथि है का जैन परम्परा में विशिष्ट महत्व है। आज के दिन गुरु अपने नुतन शिष्यों को शास्त्र की पहली वाचना देते है। नया शास्त्र स्वाध्याय आज के दिन प्ररम्भ किया जाता है। जिन्हे ज्ञान आत्मसात होने में तकलीफ होती है वह आज के दिन से पांच साल पांच महिने हर शुक्ल पक्ष की पंचमी को, उपवास के साथ ज्ञान की क्रियाएं कर ज्ञान मंत्र ''नमो नाणस्स'' का जप कर ज्ञान को अर्जित कर सकते है। शास्त्र में वर्णित गुणमंजरी और वरदत्त के जीवन घटनाओंसे इसका प्रत्यक्ष प्रमाण होता है कि ज्ञान की विराधना और आराधना करने से क्या हानि और लाभ होता है।

जैन धर्मानुसार ज्ञानपंचमी के दिन श्रुताराधना श्रुत उपासना की परम्परा कब प्ररंभ हुई इसका कोई लिखित इतिहास तो प्रप्त नहीं है परंतु परम्परागत वार्ताओंके माध्यम से ज्ञान होता हैं कि आज ही के दिन प्रभु महावीर के सत्ताइसवें पदधर अंतिम पूर्वधर आचार्य भगवान श्री देवद्विगणीजी ने कंठस्य चली आ रही श्रुतज्ञान की परिपाटी को पुस्तकारुढ करने का प्ररम्भ किया और शास्त्र लिखने की प्रथम परम्परा का शुभारंभ हुआ। यह घटना वी.नि.के. ९८० वर्ष पश्चात् घटी जो युगान्तकारी है।

यदि ऐसा न होता तो आज हम कई शास्त्रों और आगमों से वंचित रह जाते। प्रभु महावीर के दिये चिंतन-तत्वज्ञान-दर्शन विज्ञान से अंजान रहते। पांच ज्ञान श्रुतज्ञान, मतिज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यवज्ञान और केवलज्ञान में श्रुतज्ञान ही भाषक है। इस श्रुतज्ञान के सहारे ही हम अन्य ज्ञान प्रप्त कर सकते है। जैन आचार्यों ने तथा उनकी प्रेरणा से प्रेरित बड़े बड़े श्रीमंतों व राजाओंने श्रुतज्ञान को सुरक्षित रखने में लाखों रुपये खर्च कर उनका सदुपयोग किया। ताड़पत्र-हाथ से घोंटी स्याही, स्वर्ण अक्षर, सैकड़ो, हजारों ग्रंथ लाखों-करोड़ो स्वर्ण-मुद्राएं खर्च करके लिखाये जाते थे।

महामंत्री वास्तुपाल-तेजपाल दोनों भाईयों ने १८ करोड़ स्वर्ण मुद्राएं खर्च करके तीन बड़े-बड़े विशाल ज्ञान भंडार बनवाये जहां हजारों आगम सुरक्षित रखे गये। महान युग प्रवर्तक आचार्य भगवन् श्री हरिभ्रदसुरिजी ने १,४४४ ग्रंथों की रचना की। श्री लल्लिग जैसे धनिक श्रावक का इसमें विशेष योगदान रहा। गुजरात के महाराजा कुमारपाल ने २१ ज्ञान भंडार बनायें। आगमीं की छह लाख छत्तीस हजार प्रितयां लिखवाई जिसमें से सात प्रितयां सोने की स्याही से लिखवाई। अपने गुरु आचार्य श्री हेमचंद्रसुरीजी द्वारा रचित साढ़े तीन करोड़ श्लोकों की २१ प्रितयां बनवाई। इस तरह अनेकों श्रावक पेथडशाह सिंघवी, आभु सिंधवी आदि ने शास्त्रों को सुरक्षित रखने में विशेष योगदान दिया। याद रखिये ज्ञान मनुष्य का तीसरा नेत्र है।

ज्ञानपंचमी के इस पावन अवसर पर हम भी प्रण करें कि हमसे जो हो सकेगा हम श्रुतज्ञान की रक्षा के लिये करेंगे। स्वाध्याय कर ज्ञान का उपार्जन करेंगे, उसका आदर करेंगे। ज्ञानियों का सम्मान करेंगे। ज्ञान को दूसरों को सिखायेंगे। विनयशील बन ज्ञान-आराधना के प्रित पूर्ण समर्पित रहेंगे।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा





एक दीप मन में जलाये

भारतवर्ष त्यौहारों-पर्वो और उत्सवों का देश है। दीपावली एक मंगल है, एक उत्प्रेक्षा है। उसके माध्यम से हम अंधेरे और उजाले जीवन के दोनों पहलुओंपर सोच पाते है। अंधकार में उजास की खोज का नाम ही शायद जीवन है। जहाँ कहीं भी प्रकाश की किरण दिख जाती है तो नयी उर्जा मिलती है उम्मीद की एक नई लौ जल उठती है।

अक्सर पहाड़ो में रहने वाले जब रात में कहीं जाते है तो पहाड़ों पर से गिरते झरने में उन्हें उजाला दिखाई देता है, कुछ पेड़ ऐसे होते है जो बल्ब की तरह चमकते दिखाई देते है और उन राहगीरों के लिये प्रकाश स्तंभ का काम करते है। एक छोटी सी किरण राह को मंजिल बना देती है।

कुछ लोग अंधेरे में राई ढूंढने का प्रयास कर रहे थे, उनका मानना था वह उस राई के दाने को ढूंढ लेंगे, उन्हें बोयेंगे खाद-पानी देंगे और एक दिन वह सुर्य-पुंज का कार्य करेंगे। अंधेरा और उसमें राई ढूंढना ऐसे लोगों को हम मूर्ख समझ सकते है, लेकिन जो दिमाग यह सोच सकता है वह बेवकूफ कदापि नहीं हो सकते उन्हें एक मौका तो देकर देखिये। वह जरुर उम्मीदों की नई आशाओंका संरचण समाज में करेंगे। कविवर रविन्द्रनाथ टैगोर की एक कविता का सार कुछ इस तरह से है 'सांध्य रवि ने कहा अब मेरा काम करेगा कौन – सुनकर सारा जगत रह गया निरुत्तर मौन। तभी एक माटी के दिये ने जोड़कर हाथ कहा जितना भी बन पड़ेगा मैं करुंगा नाथ।'

दीपक हमारी अध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है। जो स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है। अमावस्या की अंधियारी रात में पूनम की रात को भी शरमा दे ऐसी रोशनी होती है दीपों की कनक मलिका की दीपावली में। कहां अंधकार है यहां तो सिर्फ उजास ही उजास है जो मनुष्य की चेतना को झकझोर कर कहता हैं कि 'तुम भी अपने जीवन को इस दिये की तरह बना लो ताकि तुम्हारे आसपास रहनेवाले लोग तुमसे किसी न किसी रुप में प्रजज्वलित हो सके'। आज जरुरत है बाहर दीपक जलाने के साथ साथ हम अपने भीतर एक दीप जलाये। सबसे पहले भीतर के अंधकार को दूर करे।

कुरीतियों के अंधकार को, परम्पराओं के झूठी शान के नाम पर रुढियों की उलझती गाठों के अंधकार को , चिंतन की गलत दिशाओं के अंधकार को, साम्प्रदायिकता-जातीयता के विस्फोटक घटनाओं के अंधरकार को, कमजोर के शोषण के अंधकार को, नारी की अस्मिता बंधन के अंधकार को, अराजकता आतंकवाद जैसे न जाने कितने अंधकारों से विश्व-समाज जुझ रहा है। हाल ही में अमेरिका में हुआ नरसंहार हमसे यही कहता है नफरत यह कैसा अंधकार फैल रहा है। अपनी कमजोरियों-विफलताओं का दोष हम किसी ओर पर डाल देते है। जरूरत है इन अंधेरों से लड़ने की इन्हें दूर करने की। तब तक लड़ते रहना है जब तक जीत नहीं जाते। हमे जीतना ही है। समस्या अंधकार की नहीं उसे दूर करने के प्रयासों की कमी की है। प्रकाश-अंधकार से बहुत मजबूत बहुत मजबूत है, बस संकल्प करिये हम अपने हिस्से का दीप जलाकर उजास फैलायेंगे।

आओ दीप से एक दीप जलाये
एक नया अध्याय शुरु करे
नगर नगर डगर डगर गांव गांव
हर घर द्वार पर रोशनी करे
अपने दीपों के संग
पड़ोसी का भी एक दीप जलाये
इस बार दीवाली जरुरतमंदों के बीच मनाये
उपहार-तोहफा-मिठाई उन संग
मिल – बांट खाये।

न भुले वीर जवानों को, पुलिस को
जो हमारी रक्षा खातिर खतरों से खेले
आओ प्रण करे न पटाखे फोडेंगे
न चायना की लाइटे लायेंगे
पर्यावरण को बचायेंगे
देश मे बनी चीजें खरीदकर
देश को मजबूत बनायेंगे।

आप सभी को दीपावली एवम् नव-वर्ष की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। आने वाला वर्ष आपके जीवन में तमाम नई खुशियाँ और नई उम्मीदे लेकर आए।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा





नवरात्रि -– नारी शक्ति की अदृश्य महिमा का पर्व अपने भीतर छिपी दुर्गा को पहचाने

या देवी सर्वभूतेषु, मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नमः।।

नवरात्रि दुर्गा माता की उपासना का पर्व है। नौ दिनों का यह पर्व वास्तव में शक्ति की उपासना का उत्सव है। लेकिन धर्माचार्यो के अनुसार, वर्ष में चार बार नवरात्रि व्रत का विधान है। चैत्र, आषाढ़, अश्विन और माघ का शुक्ल पक्ष, वर्ष में ये चार नवरात्रियां आती है। लेकिन इनमें भी चैत्र और अश्विन की नवरात्रि के दिनों की महिमा कुछ ज्यादा मानी गई हैं। इस अवसर पर दुर्गा और उनके विभिन्न स्वरुपों की पूजा का विशेष महत्व है।

नवरात्र का व्रत और नौ दिनों तक मां दुर्गा या कुलदेवी के पूजन से हमें मनवांछित फल प्रप्त होता है। शक्ती की उपासना से ही सभी कार्य पूरे होते है। महान दार्शनिक नीत्से ने कहा है कि संसार में प्रप्त करने लायक यदि कोई चीज है तो वह शक्ती है। शक्ति के बिना शिव अपूर्ण है, अधुरे है। इस सत्य को हजारों वर्ष पहले भारतीय मनीषा ने पहचानकर शक्ती की आराधना का यह पर्व शुरू किया।

अदिकाल में अत्याचारी महिषासुर के अत्याचारों मे जब सर्वत्र हाहाकार मच गया तब उसका वध करने के लिये मां शक्ती ने दुर्गारूप में अवतरण लिया।
दुर्गा को महिषासुरमर्दिनी कहा गया है। इसके अतिरीक्त उन्होंने शुंभ-निशुंभ तथा मधु-कैटम नामक राक्षसों को संहार कर उनके अत्याचारों से सभी देवताओंको मुक्ती दिलायी।

नवरात्रि के नौ-दिनों में दुर्गा सप्तशती का पाठ अत्यंत शुभ-लाभदायी माना जाता है। संपूर्ण देश में नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित की जाती है – पूजा, अनुष्ठान होते है और गरबा, रास, डंडिया भी खेला जाता है। बंगाल में तो यह उत्सव बहुत धुमधाम के साथ मनाया जाता है, दस दिनों तक वहाँ छुटी का माहौल रहता है। गुजरात, महाराष्ट्र में भी इन दिनों चारों तरफ उत्सव की बहार आ जाती है।

कहते है चैत्र के नवरात्र से पंद्रह दिन तक यदि नीम के पत्ते या उसके रस का सेवन किया जाय तो वर्षभर शरीर निरोगी-स्वस्थ रहता है। परमेश्वरी दुर्गा के जो नौ स्वरुप हैं, उन्हीं के अनुसार नवरात्रि के नौ दिनों में हर रोज इन्हीं अलग अलग रुपों की पूजा होती है।

प्रथम शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रहन्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कुष्माण्डेति - चर्तुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं काव्यायनीति च ।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टम्म।।
नतमं स्धििदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उत्कान्येतानि नामनि ब्रहन्मणैव महात्मनाः।।

• शैलपुत्री - नवरात्रि के पहले दिन माँ दुर्गा के शैलपुत्री स्वरुप की पूजा होती है – प्रथम स्वरुपा शैलपुत्री सबकी अधीश्वरी है। नवरात्र के प्रथम दिन इन्हीं की पूजा एवं उपासना होती है। योगी अपनी योग साधना का शुभारम्भ करते हैं और मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं।

• ब्रह्मचारिणी - दूसरा दिन ब्रह्मचारिणी का है। यह मां दुर्गा का दूसरा स्वरुप है। मान्यता है कि माँ दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरुप की पूजा अर्चना से अनंत फल मिलता है। तप, संयम एवं सदाचार की वृध्दि होती है।

• चंद्रघंटा - माँ दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरुप की नवरात्रि के तीसरे दिन पूजा होती है। माँ का यह स्वरुप कल्याणकारी होता है। इनकी कृपा से पाप एवं बाधाएं दूर हो जाते है तथा मंगल ही मंगल होता है।

कुष्मांडा स्वरुप दुर्गा माँ का चौथा स्वरुप माना गया है। ब्रह्मंड को उत्पन्न करने के कारण ही इनका नाम कुष्मांडा पड़ा। इस स्वरुप की उपासना से भक्तों के रोग एवं शोक नष्ट हो जाते है।

• स्कंदमाता - पांचवे स्वरुप में दुर्गा माँ की स्कंदमाता के रुप में पूजा होती है। नवरात्रि के पाचवे दिन स्कंदमाता के पूजन की परंपरा है। इनकी अर्चना से समस्त इच्छाएं पूर्ण हो जाती है।

• कात्यायनी - कात्यायनी दुर्गा माँ का छठा स्वरुप है। देवताओंका कार्य सिध्द करने के लिये मां महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट हुई और संत ने इन्हें अपनी कन्या मान लिया। छठे दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में होता है। इनकी पूजा से अर्थ, काम, मोक्ष आदि फलों की प्रप्ति होती है।

• कालरात्रि - नवरात्रि के सातवे दिन दुर्गा माँ के कालरात्रि स्वरुप के पूजन की महिमा मानी गई है। अपने भक्तों को कष्टों से बचाने के लिए कालरात्रि माता दुष्टों का विनाश करती हैं और भक्तों को भय मुक्त रखती है।

• महागौरी - आठवे दिन महागौरी के रुप में दुर्गा माँ को पूजा जाता है। माँ महागौरी के वस्त्र-आभूषण श्वेत हैं। वाहन वृषभ है। चार भुजाएं हैं और परम कृपालू दिव्य स्वरुप है। ऐसा माना गया है की, इनकी कृपा से अलौकिक सिध्दियों की प्रप्ति होती है।

• सिध्दिदात्री - और नवरात्रि के अंतिम दिन अर्थात नवें दिवस पर माँ दुर्गा के सिध्दिदात्री को पूजा जाता है। यह सभी प्रकार की सिध्दियों को देने वाली है। भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही सिध्दियां प्रप्त की थी। इसी लिए यह आम मान्यता है कि मां दुर्गा के इस स्वरुप की पूजा से सभी कामनाएं पूर्ण होती है।

नवरात्रि के अंतिम दिन कुंवारी कन्याओंकी पूजा का भी विधान है। कन्या के रुप में शक्ति का पूजन करके लोग नवरात्रि के इस दिन को शक्ति अर्जन दिवस के रुप में भी मनाने की मान्यता है। नवरात्रि के पूर्ण होने वÀे पश्चात दसवें दिन विजयादशमी के पर्व को मनाया जाता है। असत्य पर सत्य की विजय के रुप में यह पर्व शक्ति कि सार्थकता के उत्सव के रुप में माना जाता है। नये जमाने में नवरात्रि भले ही विविधताओंऔर विभिन्न आयोजनो के साथ मनाई जाने लगी हो लेकिन वस्तुतः नवरात्रि शक्ति पूजा का पर्व है। भारतीय परंपराओंमें नारी को शक्ति का स्वरुप कहा गया है।

आज मैं हर नारी से यही आहवान करना चाहती हूं कि अपने भीतर छिपी दुर्गा को पहचाने, अन्याय का डटकर मुकाबला करे और नारी के अस्तित्व की, मान की, मर्यादा की रक्षा स्वयं करे। आज के वातावरण में बचपन से ही प्रत्येक बालक बालिका को 'स्वयं की रक्षा' की शिक्षा प्रदान करनी चाहिये। 'सेल्फ डिफेंस' सीखाना चाहिये। परिवारजनों को अपने बच्चों के प्रति विश्वास दिखाना चाहिये उनकी बातों को, उनकी समस्याओं को ध्यान से सुनना चाहिये उसका निराकरण करना चाहिये ओर उनमें एक नया आत्मविश्वास जगाना चाहिए ताकि वह कठिनाईयों का, अन्याय का डटकर सामन कर सकें।

भारतवर्ष में कुल ५१ शक्तिपीठ है जिन सभी की उत्पत्ती कथा एक ही है। यह सभी मंदिर शिव और शक्ति से जुड़े हुऐ है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इन सभी स्थलो पर देवी के अंग गिर थे। शिव के ससुर राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया जिसमे उन्होंने शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया क्योंकि वह शिव को अपने बराबर का नहीं समझते थे। यह बात सती को काफी बुरी लगी। वह बिना बुलाए यज्ञ में पहुंच गयीं। जहां शिव का काफी अपमान किया गया। इसे सती सहन न कर सकी और वह हवन कुण्ड में कुद गई। जब भगवान शंकर को यह बात पता चली तो वह आये और सती के शरीर को हवन कुण्ड से निकाल कर तांडव करने लगे। जिस कारण सारे ब्रह्माण्ड में हाहाकार मच गया। पूरे ब्रह्माण्ड को इस संकट से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने सती के शरीर के अपने सुदर्शन चक्र से ५२ भागों में बांट दिया। जो अंग जहां पर गिरा वह शक्ति पीठ बन गया।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा





पितरों की शांति के लिये – श्राद्ध कर्म

भाद्रपद की पूर्णिमा से अश्विन मास का कृष्णपक्ष पितृपक्ष के नाम से जान जाता है। इन सोलह दिनों में पितरों का तर्पण एवम् तिथिनुसार श्राद्ध कर्म किया जाता है। शास्त्राैं में तीन ऋणों – देव, श्रृषि एवम् पितृऋण से मुक्त होना अनिवार्य बताया गया है। ऐसी मान्य हैं कि पितृऋण से मुक्त पाऐ बिना कल्याण संभव नहीं है। पितृपक्ष में लोग अपने पूर्वजों को जल तर्पण करते हैं तथा मृत्यु की तिथि को विधि-विधान से श्राद्ध करते हैं। श्राद्ध में पिंडदान एवम् तर्पण प्रमुख होता है। श्राद्ध का अर्थ है – श्रद्धा पूर्वक स्मृति कर्म 'श्रद्धाया इदं श्राद्ध'।

बताया जाता हैं कि पितरों को कष्ट आदि से मुक्ति दिलाने के लिए श्राद्ध किऐ जाते हैं। वैसे तो शास्त्रों में यह भी लिखा हैं कि हर मास की अमावस्या के दिन हमें पितरों के निमित्त कुछ न कुछ तर्पण करना चाहिए। पितृपक्ष में पितरों को प्रितदिन कुशव के साथ जल तर्पण करना बहुत अच्छा होता है। कहा जाता हैं कि श्राद्धपक्ष में तीन पििढ़यों का श्राद्ध करना चाहिए। सवाल उठता है श्राद्ध जरुरी क्यों है? हमारा शरीर नश्वर है पर शरीर का चेतना प्रदान करनेवाली आत्मा अजर-अमर है। निसंता दंपत्ती जो स्वर्गवासी हो चुके हैं अगर कोई व्यक्ति उनको श्राद्ध तर्पण करता है तो वह भी उन्हें पहुँचती है। अतः मृत्यु के पश्चात् जीवात्मा की सद्गति के लिये सोलह दिनों का कालचक्र, तिथियाँ श्राद्ध के लिये निर्धारित की गई है। जिनकी मृत्यु तिथि का ज्ञान न हो या सभी श्राद्ध कर्म एक ही दिन करना हो तो अमावस्या को करना चाहिए। श्राद्ध तिथि के दिन गाय, कुत्ते और कौवा को ग्रस देने की रीति है। साथ ही ब्रह्मणों को भोजन, दक्षिणा आदि देने की प्रथा है।

चाहे तो उस दिन समाजोपयोगी कार्य तथा जरुरतमंदो की सहायता भी की जा सकती है। वह भी पुण्य का ही काम है। यों पितरों का श्राद्ध गया में सर्वोपरि माना गया है, लेकिन किसी भी पवित्र नदी के किनारे भी यह कार्य किया जा सकता है।

श्राद्ध करते समय अपने पितरों के प्रित सम्मान प्रकट करना चाहिये। उन्हें श्रद्धापूर्व नमन करते हुये उनसे आशीर्वाद मांगना चाहिए। श्राद्धकर्म से पितरों को शांति मिलती है और लोगों का कल्याण होता है। मृत्यु के पश्चात् श्राद्ध कर्म करने का रिवाज है। लेकिन मैं एक बात आज सभी से कहना चाहती हूं कि जीते-जी माता-पिता का दिल मत दुःखाइए। बरसों माता-पिता खाने-पीने को तरसते रहते है और उनकी मृत्यु के पश्चात् हम भोज करते है। उनकी मनपसंद जीचों का दान करते है। यह सब नहीं कर सकेगे तो चलेगा, ईश्वर नाराज नहीं होगे। लेकिन जीवित माता-पिता रुपी भगवान का दिल दुःखाने से ईश्वर अवश्य नाराज होंगे। इसलिये अपने बूढ़े माता-पिता की जितनी सेवा कर सकते है करिये उनका आशीर्वाद ग्रहण किजिये। यही मृत्यु के पश्चात् उनके प्रित किया गया सच्चा श्राद्ध होगा।

पितरों को खुश रखने के लिये हररोज मटके के पास दीया करना चाहिये, पितृलोक के स्वामी भगवान् दत्तात्रेय हैं। ''श्री गुरुदेव दत्त'' मंत्र का जाप करने से भी पित्त दोष दूर होता है।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा





हमारी राष्ट्रभाषा बने हिंदी

मेरी मातृभाषा है हिंदी
पुष्प की अभिलाषा है हिंदी
भारत के सभी प्रंतों को
एक धागे में पिरोती है हिंदी।

हजार वर्ष का समृद्ध साहित्य है हिंदी
'स्वयंभू' का पडम चरिया (पदम चरित) है हिंदी
कबीर की वाणी-साखी
मीरा का गोपाला है हिंदी।

सुरदास की बाल लीला
बिहारी का श्रृंगार रस
रहीम के दोहे – सोरठे – बरवै
संतोष धन है हिंदी।

रैदास का चंदन पानी
खुसरो की पहेलियाँ-मुकरियाँ
नवीन की उर्मिला के गले में
तुलसी के पद पिरोती है हिंदी।

गुप्त की भारत-भारती
मिश्र की त्रिकाल संध्या आरती
सुभद्रा के 'बिखरे-मोती'
देशभक्ति का 'बहता झरना' हैं हिंदी।

भारतेंन्दु की खड़ी बोली
कालिदास का मेघदूत
मुल्ला दाऊद की पे्रमकथा चंद्रायन
पं द्विवेदी का जागरण सुधार काल हैं हिंदी।

गुरु नानक की 'जपुजी'
जायसी की पद्मावत
सुमन का जीवन के गान
अज्ञेय का पद्य और गद्य हैं हिंदी।

बच्चन की मधुशाला
धर्मवीर की कनुप्रिया
प्रसाद की कामायनी
महादेवी के गीतों की खानी है हिंदी।

युगवाणी पंत की पुकारती है हिंदी
दिनकर की रसवंती बातें है हिंदी
चंद बरदाई का पृथ्वीराज रासो
प्रेमचंद की अद्भुत कहानियां है हिंदी।

निराला की राम शक्ति पूजा महाकविता है हिंदी
दुष्यंत की अनमोल गजलें
भगवती की चित्रलेखा
नीरज का प्रेम रस प्याला है हिंदी।

महाश्वेता देवी, शिवानी अमृता प्रीतम
पुष्पा भारती, फणीश्वरनाथ रेणु,
कमलेश्वर देवीकनंदन खत्री, गुलेरी, नरेन्द्र कोहली
भीष्म सहानी-यशपाल, जैनेद्र कुमार
अनगिनत साहित्यकारों की कलम है हिंदी।

इस छोटी सी कविता में समेट सकती नहीं
हिंदी साहित्य के रतनों को
एक-एक अमूल्य धरोहर है
कोहिनुर है हमारी हिंदी।

सच कहूँ तो एक अनुपम वरदान है हिंदी
साहित्य की जान है हिंदी
फिजी, मारिशियस, मालद्वीप, सुरीनाम
दक्षिणी अप्रÀीका त्रिनिदाद में भी
गर्व से बोली जाती है हिंदी।

यह हिंदी साहित्य उपवन है बड़ा निराला
कभी न मुरझाये ऐसे विभिन्न महकते फूलों का
नमन-नमन-नमन
हमारे माथे की बिंदिया है हमारी हिंदी।

'अभिमान से कहो हमारी राजभाषा ही नहीं
राष्ट्रभाषा भी हैं हिंदी।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा





नवकार - जैन धर्म का महामंत्र

नवकार जैन धर्म का महामंत्र है। आत्मशुद्धि के लिये यह आदर्श है। जिस तरह से सूर्य के प्रकाश से कमल विकसित होता है, उसी तरह से इस महामंत्र के जाप से संसारी आत्मा विकसित होती है ओर जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाती है। उसे अरिहंत पद प्रप्त होता है।

यह नमस्कार मंत्र संपूर्ण शास्त्र है। यह मंत्र शाश्वत है। इसमें अठसठ अक्षर। नौ पद, आठ संपदा और चौदह पूर्व का सार है।
नमो अरिहंताणं
नमो सिद्धाणं
नमो आयरियाणं
नमो उवज्झायाण
नमो लोए सव्वसाहुणं
एसो पंच नमुक्कारो
सव्वो पावप्पणसणो
मंगलाणं च सव्वेसिं
पढमं हवइ मंगलं

अरिहंतों को, सिद्धों को, आचार्यो को, उपाध्यायों को, लोक में सब साधुओंको नमस्कार हो। यह पंच नमस्कार सब पापों का विनाशक है समस्त मंगलो में प्रथम मंगल है। यह मंत्र हमें विनय, विनम्रता सिखाता है। जो आत्मा को उत्थान की ओर ले जाने का प्रथम सोपान है। यह मंत्र हमें नमस्कार करना सिखाता है, साथ ही यह संदेश देता हैं कि पंच परमेष्ठि की आज्ञा ही शिर्रोघाय है। इनमें उनके गुणों को नमन किया गया है।

अरिहंत – १२ गुण - सफेद रंग
सिद्ध - ९ गुण - लाल रंग
आचार्य - ३६ गुण - पीला रंग
उपाध्याय - २५ गुण - हरा रंग
साधु - २६(२७) गुण - काला रंग

इन्द्राधि देवों द्वारा पूजित श्री अरिहंत भगवान, मुक्ति में विराजमान श्री सिद्ध भगवान जैन शासन को उन्नति की ओर ले जाने वाले श्री आचार्य भगवान, ज्ञान-दर्शन-चारित्र इन तीन रत्नों की आराधना करने वाले समस्त साधुगण ये पांचो परमेष्ठि हमें सदैव मंगल प्रदान करे।

मान्यता हैं कि विधिपूर्वक मन-वचन और काया की एकाग्रता से एक लाख बार नवकार जपनेवाला साधक तीर्थकर पद प्रप्त करता है। हर रोज रात को सर््ीेते समय आठ कर्मो के क्षय के आठ बार नवकार मंत्र का जाप करना चाहिये और सुबह उठकर १२ बार नवकार मंत्र का जाप करना चाहिय।

दूध का सारभूत पदार्थ धृत है वैसे जिनशासन का सारभूत तत्व नमस्कार महामंत्र है। सभी आराधना में नवपद की आराधना शिखर समान है इसी की आराधना से श्रीपाल राजा को कुष्ठ रोग समाप्त हुआ तथा वह अनेक संपदाओंके धनी बने। सेठ सुदर्शन के लिये सूली सिंहासन बन गई। श्रीमती की निष्ठा से सांप फूलों की माला में बदल गया और अभय कुमार के लिये जलती चिता बुझ गई। शास्त्र में ऐसे अनगिनत उदाहरण है जहाँ नमस्कार महामंत्र से चमत्कार हो गये और आज भी सच्चे दिल से इसका स्मरण करने से हमारे जीवन के कष्टों का निवारण होता है और सुख की गंगा में हम तैरने लगते है। नवकार मंत्र के नौ पदों में से पहले के पांच मूल पद है शेष चार पद चूलिका के हे। पहले पांच पदों को ज्यों का त्यों रखते हुये अंतिम चार पदों के स्थान में दुसरे चार पद रखने से जो मंत्र बनता है वह भी मान्य है।

नमो नाणस्स। नमो दंसणस्स
नमो चस्तिस्स। नमो त्वस्म।

ज्ञान-दर्शन-चारित्र और तप को नमस्कार हो। यह चार पद साधना के सूचक है। वास्तव में ज्ञान साधना पूर्ण होने पर ही और साधु बनने के पश्चात् ही साधक अरिहंत और सिद्ध बनता है।

नवकार मंत्र के दो संक्षिप्त रुप भी हैं
(१) ॐ(ओम्)। अरिहंता का 'अ' सिद्ध (अशरीरी) का 'अ', आचार्य का 'आ', उपाध्याय का 'उ', साधु (मुनि) का 'म्' इन सबके मेल से 'ओम' बनता है
(अ + अ †। आ + आ † आ । आ + उ † ओ। ओ + म् † ओम् ॐ के रुप में लिखा जाता है जिसका चन्द्रबिंदू सिद्धशिला के रुप में मान्य है।
(२) अ-सि-आ-उ-सा नमः। नवकार के भी पदों के प्रथमाक्षरों के मूल से यह संक्षिप्त रुप तैयार किया गया है।

ये संक्षिप्त रुप बीजाक्षर मंत्र कहलाते हैं। इनमें से दूसरा बीजाक्षर मंत्र अधिक प्रचलित हे। कहते हैं तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ ने इसे प्रस्तुत किया था।
इसका जप इस प्रकार करना चाहिए
(१) 'अ' का ध्यान नाभि कमल में
(२) 'सि' का ध्यान मस्तक में
(३) 'आ' का ध्यान मुखकमल में
(४) 'उ( का ध्यान हृदय कमल में
(५) 'सा ' का ध्यान कण्ठ में करना चाहिए।

ये बीजाक्षर मंत्र भी अत्यन्त लाभप्रद है।

नवकार महामंत्र की बड़ी महिमा है। इससे साधक की आत्मा में आध्यात्मिक शक्तियां जागृत होती है, मन शुद्ध होता हैं, कामनाएँ शांत होती हे। इसके प्रभाव से साधक धीरे-धीरे महात्मा बन जाता है। इस मंत्र के जप से मनुष्य को सांसारिक सुख भी मिलते हैं। कार्य पुर्ण होते है। रोग, शोक, संताप, दूर होते है।

इस महामंत्र का प्रभाव सीधे मन पर पडता है। परिणाम स्वरुप स्थायी भाव की उत्पत्ति होती हे। उसका परिष्कार होता हे। वह चरित्र विकास में सहायक होता है। जो योग्यता साधक अपने भीतर प्रकट करना चाहता है। उसका बार-बार चिंतन और स्मरण करने पर वह उसे प्रप्त होती हैं।

अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु, ये पंच परमेष्ठी पद हैं। इनका आदर्श लेकर नवकार जप करने पर साधक को परमेंष्ठी की प्रप्ति होती है। आन्तरिक शत्रुओंका हनन करनेवाले अरिहंत हैं। वे अहिंसा और शांति के असीम सागर हैं। वे देहधारी जीवन्मुक्त हैं। सिद्ध पूर्ण परमात्मा हैं। वे जन्म-मरण के चk्रÀ से मुक्त हैं। अजर, अमर, सिध्द्ध, बुद्ध मुक्त होकर वे मोक्ष प्रप्त कर चुके हैं। वे सिद्ध होने से पहले अरिहंत हुए। वे देहमुक्त है। आचार्य आचार संयम का स्वयं पालन करते है। वे संघ का नेतृत्व करते हैं। वे दूसरों से आचार का पालन करवाते हैं। साधु-साध्वी, श्रावक श्राविका की साधना का नेतृत्व आचार्य का ही काम हे। आत्मा की साधना करनेवाला साधु है। वह पांच आचारों के पालन में सतत संलग्न रहता है। नवकार महामंत्र का जप करनेवाला साधक अन्ततः इसके समान उच्च पद प्रप्त करता है।

जैनों के इस महामंत्र को अन्य धर्मों के लोगों ने भी अपनाया है। इस मंत्र के जाप से रिद्धि-सिद्ध बहुत ही सहजता से प्रप्त होती है। जब भी कोई संकट आये इस जाप करने से समस्त संकट दूर हो जाते है। और आत्मा में शांति का निर्झर बहने लगता है।

नमस्कार महामंत्र की जय पांचों परमेष्ठियों की जय।
।।जय जिनेन्द्र।।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा





'कोटि-कोटि कंठों से निकली, आज यही स्वर धारा है, भारतवर्ष हमारा हे, यह हिंदुस्तान हमारा है।

कविवर बालकृष्ण शर्मा - नवीन की इन पंक्तियों के साथ मैं समस्त भारतवासियों को आजादी की ७० वीं वर्षगांठ की बहुत बहुत बधाई देती हूं।

आज देश को फिर एक बार उनके नागरिकों और उनकी देशभक्ति के न थमने वाले जज्बे की आवश्यकता है। एक तरफ काश्मीर दूसरी तरफ चीन, तीसरी तरफ अंदरुनी लडाई। सच, पड़ा है देश पर संकट, लगी है जान की बाजी, यही वक्त है देश के कुछ काम आने की, एकजुट होने की ताकि बाहरी ताकतों का हम मिलकर मुकाबला कर सकें।

हमारे जाबांज सिपाही, देश के लिये अपने प्रणों की आहुति दे रहे है। हर दिन हमारे सैनिक मातृभूमि के लिये अपना बलिदान दे रहे है। नमन है उनको और नमन है उनके परिवारजनों को। जो हंसते हंसते देश की खातिर अपने बेटे, पती, पिता, भाई को विजय तिलक लगाकर विदा करते हैं और कहते है 'सीने में गोली खाकर लेना पर पीठ पर कभी नहीं'। (धन्य हैं वह जो यह भी नहीं जानते कि वह युद्ध से लौटकर आयेगा भी या नहीं। यह उनकी शायद आखिरी मुलाकात हो) बहुत हिम्मत चाहिये ऐसा करने के लिये, सैनिक सरहद पर लड़ता है और साथ में उनका परिवार भी।

जो सीमा पर खड़ा है, वह हमारे देश का सैनिक है,
हमारे देश का सैनिक हमारा गर्व है
हमारी आन, बान और शान है,
वह भी किसी का बेटा, भाई-पति और पिता है,
पर वह इन सब रिश्तों से ऊपर उठकर,
देश के साथ अपना गठबंधन बांध लेता है,
देश की खातिर जान की बाजी लगा देता है,
पर आज एक सवाल रह रह कर मन में उठता है,
क्या हम उन्हें सही सम्मान दे पाते है?
कितना बड़ा दुर्भाग्य है, जब बेवजह हमारा सैनिक शहीद हो जाता है
कुछ घुसपैठिये आकर पीठ में छुरा भोंक देता हैं, और कोई गर्दन काट जाता है,
और उस समय हम डल झील की सैर कर रहे होते है,
चनार के वृक्षों संग सेल्फी खींचे जाते है,
बर्फ की वादियों में स्कीइंग कर रहे होते हैं,
काश्मीर की घाटियों में गीत गुनगुना रहे होते हैं।

वही सीमा पर खड़े उस सैनिक का परिवार
रात दिन ईश्वर से उसकी लंबी उम्र की कामना कर रहा होता है
उसके घर जल्दी लौट आने की प्रर्थना कर रहा होता है,
क्या उनके परिवार वालों की पीड़ा को, हम क्या महसुस कर सकते है
उनके दुःख को सांझा कर पाते है,
याद रखिये वह सैनिक ही हमारा सच्चा नायक है,
उसका त्याग ही हमारा अभिमान हे, उनकी वजह से ही हम सुरक्षित है,
सच तो यह है कि वे भारत माता के सच्चे सपूत है,
उनके चरणों में मेरा शत-शत वंदन है।

याद रखिये किसी भी देश का गर्व उसकी सेना होती है। एक पलड़े में आप दुनिया की सारी दौलत रख दीजिये और दुसरे में सैनिकों की वीरता – पलड़ा हमारे सैनिकों का ही ऊंचा रहेगा।

देशप्रेम से बड़ा कोई प्रेम नहीं। देश है तो हम है, हमारा अस्तित्व है।

इस पंद्रह अगस्त एक प्रण लीजिये कि हम चीन में बने सामानों का बहिष्कार करेंगे। अपने देश में बना सामान खरीदेंगे, देश को मजबूत बनायेंगे, यही हमारी आजादी की ७०वी सदी वर्षगांठ का सही उपहार होगा।

जय हिंद। भारत माता की जय।।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा





व्यथा एक वीर सैनिक की पत्नी की - कभी कभी मेरे मन में आता है कि...

कभी कभी मेरे मन में आता है कि इस बार जब तुम आओगे,
तुम संग उन यादों को फिर से जिऊंगी, जो हमारे नए नए प्रणय की खुशबू थी

इस बार तुम्हें जिद करके रोक लूंगी, जल्दी जाने ही ना दूंगी
प्रर्थना करुंगी ईश्वर से... की 'काश' कुछ दिनों के लिए तो ... सारे
मोबाइल-टेलीफोन सब बंद हो जाएं, कोई घंटी हमे परेशान न करे
मै तुम संग पल पल जीना चाहूंगी, वक्त को भी मुट्ठी में बांध लुंगी
कभी कभी मेरे मन में आता है कि...

लेकिन यह सब कहां संभव है, सपनों की दुनिया जब हकीकत की जमीं से टकराती है,
तो सारे के सारे 'काश' बिखर जाते हैं, और उसके टुकड़े नश्तर की तरह चुभने लगते है
तुम्हारा इंतजार करते बूढे माता पिता है,भाई-बहन है बच्चे दोस्त है,
यहां तक कि पूरा गांव है,
मेरे हिस्से के समय में तो, कब घंटी घनघना उठेगी
और सरहद से बुलावा आ जायेगा, में नही जानती।

जानती हूं तो बस इतना कि तुम संग बिताये छोटे-छोटे पलों को
अपने दिल की कोठरी में कैद कर लूंगी
और उन्हीं यादों के सहारे फिर एक बार इंतजार की लंबी घिड़यां काट लुंगी

- श्रीमती मंजू लोढ़ा





रास-रासेश्वर पूर्ण पुरुष लीलाधर – श्री कृष्ण

सखि म्हारो कानूड़ो कलेजे की कोर
मोर मुकुट पीताम्बर सोहे, कुंडल की झकझोर
वृंदावन की कुंज गलिन में, नाचत नंद किशोर
'मीरा' के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल चित्तचोर ।।

मो मन बसौ श्यामा श्याम
श्याम तन-मन, श्याम कामर, माल की मणि श्याम
श्याम अंगन श्याम भूषण, वसन हैं अति श्याम
श्यामा श्याम के प्रेम भींने, 'गोविंद' जन भए श्याम ।।

रास रासेश्वर पूर्ण पुरुष योगीराज लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद की आठम वद को, मुसालाधार बारिश, भयंकर अंधियारी रात में जेल के प्रंगण में हुआ। जन्म होते ही जेल के ताले अपने आप टूट गये और पिता वासुदेव उन्हें नंद-बाबा के घर छोड़ आये।

जन्म से लेकर आखिरी सांस तक उनका जीवन क्रांतिधारी विचारों का पोषक रहा। उनके जीवन की प्रत्येक घटना हमारे लिये प्रेरणादाई, ज्ञानदायी है। तैंतीस करोड़ देवी-देवताओ में संप्रदाय की दीवारें लांधकर सबसे अधिक अलग अलग भाषाओं में 'श्रीकृष्ण' पर साहित्य की रचना हुई है।

जब भी बांसुरी बजती है श्रीकृष्ण स्मृतियों में रमण करने लगते है। लगता है वह एकदम नजदीक आकर बैठ गये है और कानों में धीरे से कह रहे है मैं मां देवकी और यशोदा का लाडला ही नहीं, पिता वासुदेव और नंद बाबा का दुलारा ही नहीं, हलधारी भाई बलराम और बहन सुभद्रा का सहोदर ही नहीं, ब्रजबालाओंका चित्तचोर ही नहीं, मैं ब्रजवासियों का रासरसैया, माखनचोर ही नहीं, गोपियों की मटकी फोड़ने वाला नटखट कान्हा ही नहीं, गौमाता को चराने वाला गोपाल ही नहीं, कालिया मर्दन तथा पूतना वध करने वाला बाल शुरवीर ही नहीं, मै राधा का सांवरा ही नहीं, गुरु संदीपनी के आश्रम में शिक्षा प्रप्त करनेवाला आज्ञाकारी शिष्य ही नहीं, सुदामा का मित्र ही नहीं, मै गोवर्धनधारी ही नहीं, ब्रज छोड़कर मथुरा जानेवाला सत्य की राह का राही ही नहीं, मामा कंस, जयद्रथ-शिशुपाल को दंडित करनेवाला मुख्य न्यायाधीर ही नहीं, कुंबडा को ठीक करनेवाला कुशल चिकीत्सक ही नहीं, रुकमणी, सत्यभामा आदि आठ पटरानियों का सरताज ही नहीं, १६००० राजकुमारियों का उद्दारक ही नहीं, द्रौपदी का मान बचानेवाला रक्षक सखा ही नहीं, मै बुआ कुंती का प्यारा भतीजा ही नहीं, मैं द्वारिका में रहनेवाला उदास यादव कुलश्रेष्ठ ही नहीं, मैं पार्थ का सारथी ही नहीं, युद्ध के मैदान में 'गीता' द्वारा दुनिया को ज्ञान का अमूल्य खजाना प्रदान करने वाला दार्शनिक चिंतक ही नहीं, मैं कुरुक्षेत्र में प्रकट चमत्कारिक विराट स्वरुप ही नहीं, मैं प्रभाष क्षेत्र में पीपल के वृक्ष के नीचे अपनी ही मृत्यु-सांझ का प्रतीक्षारत युग पुरुष ही नहीं, बल्कि जैसे मैं मीरा का गिरधर हुं, पुंडलिक का पांडुरंग हूं, प्रह्लाद का विश्वास हुं, नरसी का भरोसा हूं, सूर का हृदय हु, वैसे ही मैं तुम सबका लड्डु गोपाल हुं। प्रकृति के बीच जीवन का सुंदर खेल-खेलने में तुम्हारा आत्मीय सखा हुं। आओ मुझे अपनी भक्ति के रंग में रंग लो। जो भक्त मुझे जिस रुप में याद करता है में उसे उसी रुप में प्रप्य हुं।''

तो आईये जन्माष्टमी के इस शुभ अवसर पर हम भी अपने हृदय में छिपे श्रीकृष्ण रुपी तत्व को प्रप्त करे। परिघि से kोंÀद्र की तरफ जाये। और अपनी आत्मा को उस परमपिता को आत्मा के संग एकाकार कर दें।

''हे दीनबंधु ऐसी प्रितमा प्रदान कर तू
देखुं तुझे नयनों में मन में और वचन में।''

''श्री गोवर्धनवासी सांवरे, लाल तुम बिन रहे न जाय।
श्री ब्रजराज लडते लाडले, लाल तुम बिन रहो न जाय।।''

- श्रीमती मंजू लोढ़ा





रक्षा बंधन भाई-बहिन के स्नेह और रक्षा का प्रतीक

आज श्रावण मास की पूर्णिमा है याने रक्षा बंधन का पवित्र-पावन त्यौहार का अर्थ है प्रेम, दया, सहयोग और रक्षण। रक्षा में छिपा है भाईचारे का आव्हान। केवलज्ञान के पश्चात् सभी तीर्थकरों की वाणी भी समस्त जगत के जीवों की रक्षा के लिये ही प्रवाहित होती है। वही श्रीकृष्ण कहते है ''मैं सज्जनों की रक्षा के लिये और दुष्टों का संहार करने के लिये ही जन्म धारण करता हूँ।“

रक्षा शब्द में जीवन की शक्ति है, प्रण है, आत्मा का निज गुण है, मानव के अंतर मानस से प्रवाहित होने वाला एक ऐसा निर्मल निर्झर है जो पाप ताप और संताप से मुक्त करता है। रक्षा के भीतर मानवीय सुख-दुःख की सहानुभूति, संवेदना उत्सर्ग और कल्याण की भावना छिपी है।

रक्षा बंधन का प्ररंभ कब हुआ यह तो पता नहीं। पर कहा जाता है, देवासुर संग्रम में बार-बार देवों को पराजय का सामना करना पड़ रहा था। देवेन्द्र इंद्र उससे बड़े ही चिंतित थे। तब गुरु बृहस्पति की आज्ञा से इंद्राणी ने इंद्र की दाहिनी भुजा में वेदज्ञ ऋषियों से अभिमंत्रित रक्षा सूत्र बांधा और उन्हें युध्द के लिये पे्रिरत किया और इस बार देवताओंकी विजय हुई। यह कथा रक्षा बंधन के प्रचीन स्वरुप को प्रकट करती है और साथ ही नारी की प्रितष्ठा को भी उजागर करती है। कालांतर में यह दिन रक्षाबंधन के पर्व में बदल गया। जहाँ बहन भाई की कलाई में राखी बांध उसके सुंदर भविष्य और हर कार्य में विजयी भवः की प्रर्थना करती है। अपनी शक्ति को भाई की शक्ति में सम्मिलित कर देती है और भाई बहन की सुरक्षा तथा मर्यादा का दायित्व अपने कंधों पर ले लेता है।

रक्षा करने के लिये विष्णु याने विराट बनना होगा। इसी रक्षा की महान भावना से प्रेरित होकर श्रीराम ने धनुष उठाया, कर्मयोगी श्रीकृष्णने सुदर्शन चk्रÀ को। वही भगवान महावीर ने जीव रक्षा और जीवदया के पावन उपदेश की व्याख्या की। यह भले हिंदू त्यौहार हो, पर राखी बांधने पर मुस्लिम भाई भी बहन की रक्षा करने में पीछे नहीं हटते। मेवाड़ की रानी कर्मावती ने अपने राज्य और वहाँ के लोगों की शत्रु से रक्षा के लिये मुगल बादशाह हुमायंु को राखी भेजी थी और हुंमायु ने राखी के महत्व को समझकर उसे पूरा मान दिया और अपनी सेना के साथ शत्रुओंसे मुकाबला करने मेवाड़ जा पहुंचा। राखी की महत्ता को हुमायूं ने कुछ यूं कहा कि ''छोटे- छोटे दो धागे जानी दुश्मन को भी स्नेह की जंजीरों में जकड़ देते है। यह मेरी खुश किस्मती हैं कि मेवाड की बहादुर महारानी ने मुझे भाई बनाया।“ कहते हैं सिकंदर को महाराजा पुरु ने बंदी बना लिया था, उसे मौत के घाट उतर देना चाहते थे, पर सिकंदर की प्रेयसी ने पुरु के हाथ में राखी बांधकर सिकंदर के लिये जीवन रक्षा की सौगात मांगी। अतः वीर राजा पुरु ने उन्हे आजाद कर दिया था।

राजपूतों में तो राखी का बहुत ही महत्व रहा है। उनके लिये राखी बलिदान का पर्व रहा है। जहाँ बहनें, माताएँ अपने पुत्रों, भाइयों को रक्षासूत्र बांधकर देश की रक्षा के लिये युद्ध में भेजती थी। ब्रिट्रिश शासन काल में वीरों ने हथकडी को राखी के रुप में बांधने के भी प्रसंग है। कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने ''राखी की चुनौती“ कविता में कुछ इस तरह अपनी भावनाओं को प्रकट किया

''आते हो भाई? पुनः पूछती हूँ
कि माता के बंधन की है लाज तुमको
तो बंधी बनो, देखो बंधन है कैसा
चुनौती यह राखी की है आज तुमको।“

श्रावण मास की पूर्णिमा को भाई बहन को अपने घर राखी बांधने के लिये निमंत्रित करता है। बहन बड़ी खुशी से राखी-मिठाई-उपहार लेकर भाई के घर जाती है, भाई को तिलक कर, राखी बांध उसकी आरती उतारती है, मंगल कामना करती है। भाई भी बहन को उपहार देकर उसकी रक्षा का वायदा करता है। कई लोग (खासकर नाविक) (विशेषकर महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात के तटीय क्षेत्र में) इस दिन समुंदर किनारे जाकर सागर देवता को नारियल चढ़ाते है, वरुण देवता को अर्ध्य देते हैं। केरल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और उड़ीसा जैसे राज्यों में ब्रह्मण समुदाय द्वारा यह दिन 'अववि अक्तिम' के रुप में मनाया जाता है। कनार्टक में यजुर्वेद के अध्येताओं के द्वारा इस दिन को 'उपकर्म' के रुप में मनाया जाता है। उपकर्म को वैदिक शिक्षा के शुभारंभ का दिन माना जाता है। और शिक्षा आरंभ के पहले यजुर्वेद के अध्येताओं द्वारा एक-दूसरे के साथ अपना अपना जनेऊ बदलने की परंपरा भी इस राज्य में मिलती है। बिहार, छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश, झारखंड में इस पर्व को कजरी पूर्णिमा के रुप में मनाया जाता है। गुजरात के कुछ भागों में इस दिन भगवान शिव की पूजा का उत्सव बड़े जोर-शोर से मनाया जाता है। इसे 'पवित्रोपासना' भी कहते है। 'अमरनाथ यात्रा' का महत्व भी इसी दिन से जुड़ा है। गुरु पुर्णिमा के दिन श्रीनगर से चलकर करीब दौ सो किलोमीटर का लंबा सफर तय कर पुजारियों द्वारा 'पवित्र छडी मुबारक' को श्रावणी पूर्णिमा को अमरनाथ गुफा में पहुँचाया जाता है।

यह पवित्र दिन नारी मात्र को मां बहन मानकर उसकी अस्मिता की रक्षा करने का संदेश देता है। घर-परिवार-समाज में उसे उचित स्थान मिले। उसकी इच्छाओं का सम्मान हो। विज्ञापन हो या फिल्में या कार्यक्षेत्र हर जगह उसे समाज दर्जा, मान तथा सम्मान मिले। उसकी शालीनता, पवित्रता तथा उत्कृष्टता की रक्षा हो। तभी सही मायने में रक्षा बंधन पर्व साकार होगा।

ब्रह्मा भी इस दिन अपने यजमानों को रक्षा कवच बांधकर यह श्लोक बोलते है।
येन बध्दो बली राजा दानतेन्द्री महाबलः।
तेन त्वामनुबध्रमि रक्षे मा चल, मा चल।।

कुछ लोग ऋषि पंचमी को रक्षा बंधन के पर्व के रुप में मनाते है। यह बड़े दुःख की बात हैं कि स्नेह के प्रतीक इस त्यौहार को कुछ लोगों ने सिर्फ लेन देन का औपचारिक पर्व बना दिया है। रक्षा बंधन का धागा मात्र धागा नही, यह स्नेह सुत्र है, रक्षा कवच है, जिसके हाथों में इसे बांधा जाता है उनका दायित्व बांधने वाले के प्रित बढ़ जाता है, केवल उपहार देकर लेकर वह इससे मुक्त नहीं हो सकते। हर माता-पिता का कर्तव्य हें कि प्रत्येक बालक को बचपन से ही नारियों की अस्मिता के सम्मान की रक्षा की शिक्षा दी जाय। और बहनें हरदम अपने भाई की मंगल कामना करती रहे, उसका जीवन सुखमय हो ईश्वर से यही प्रर्थना करती रहे । सरहद की रक्षा करने वाले हमारे वीर जवानों, भाईयों की लंबी उम्र की कामना करें।

वास्तव में यह पर्व प्रत्येक इंसान का एक दूजे के प्रित प्रेम और विश्वास प्रकट करने का पर्व है। हम भी विष्णु बनकर समाज में व्यापत कुरीतियों को नष्ट करने का प्रयत्न करें। प्रणी मात्र की रक्षा के लिये दृढ संकल्प करें। तभी इस पर्व की सार्थकता सही मायनों में होगी।

रक्षा बंधन पर्व की आप सभी पाठकों को शुभकामनाएँ, कवयित्रि सुभद्रा कुमारी चौहान की इन पंक्तियों के साथ 'बहन आज फूली न समाती मन, तडित है न फूली समाती धन में लता है न फूलीसमाती वन में, घटा है न फूली समाती गगन में कहीं राखियाँ हे, कहीं पुष्प प्यारे खिले है बधाई है उनका जिनको भाई है मिले।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा





आत्मिक, आध्यत्मिक उत्थान का अवसर - चार्तुमास

वर्षाकाल के चार महीनों को चार्तुमास के नाम से जाना जाता है। चार्तुमास का समय आषाढी पुनम से लेकर कार्तिक पूनम तक होता है। इसका प्ररंभ आषाढ़ी १४ से हो जाता है। प्रत्येक तीन वर्ष के पश्चात् चार्तुमास चार महीनों की जगह पांच महीनों का हो जाता है। इस वर्ष चार्तुमास ८ जुलाई से आरंभ होने जा रहा है।

बरसात के मौसम में अत्यधिक सुक्ष्म जीवों की उत्पति होती हैं और उससे सारी धरती आकीर्ण हो जाती है। आवागमन या विहार करने से उन जीवों का घात हो सकता है अतः अहिंसा धर्म का सुक्ष्मता से पालन करने वाले सभी साधु-संत अपने शिष्यों सहित एक ही स्थान पर निवास करते है, वर्षा योग की स्थापना करते है।

भारत में जैन साधु-साध्वी ही नहीं बल्कि अन्य धर्मो के साधु-संत भी इस प्रक्रिया का पालन करते है तथा इस अवधि में ईश्वर का ध्यान करते हुये जीवदया, करुणा, सेवा, साधर्मिक भक्ति, व्रत, उपवास, परोपकार आदि प्रशस्त कार्यो को करते है तथा अपने भक्तों को करने की प्रेरणा देते है।

वैसे तो साधु की गति सदैव नदी की निर्मल धारा की तरह होती है - सदैव चलते जाओ, बहते जाओ। लेकिन लोगों के अंदर धर्म की भावना प्रबल हो इसलिये यह परोपकारी गुरु चार मास एक जगह रुकते है तथा हमें धर्म की बारीकियां समझाते है और सद्मार्ग पर चलने की सीख देते है। साधु एक जगह से चलते है और दुसरी जगह पहुंचते है इस चलने और पहुंचने के बीच एक बड़ी घटना घट जाती है कि यह जहां से चलते है, वहां सब सूना-सूना हो जाता है और जहां पहुंचते है, वहां सब सोना ही सोना हो जाता है। (यह सोना (कनक) भौतिक नहीं बल्कि गुरु वाणी से हमारी आत्मा शुद्ध सोना बनने की प्रक्रिया की ओर अग्रसर हो जाती है।

सदगुरु ही हमें ईश्वर तक पहुंचने का सही मार्ग दिखलाते है। चार महिनों में इनके उपदेशों का एक अंश भी हम ग्रहण कर ले तो हमारी यह जन्म सुधर सकता है प्रेक्षा की एक किरण ही सोते हुये को जगाने का कार्य कर जाती है।

कवि दादू दयाल कहते हैः- 'दादू इस संसार में, ये द्वै रतन अमोल।
एक साई एक संतजन, इनका मोल न तोल।।'

हिंदू धर्म में कहा जाता हैं कि चार्तुमास के वक्त भगवान् श्री विष्णु क्षीरसागर में शेषशय्या पर योगनिद्रा में शयन करते है। इसलिये इन महीनों में शादी-विवाह, गृहनिर्माण यज्ञ आदि कार्य नहीं किये जाते। ये चार मास तप-तपस्या, जप के लिये उपर्युक्त है। अधिकतर हमारे धार्मिक त्यौहार इन्हीं महीनों के बीच में आते है। राखी जैनों का महापर्व-पर्युषण, क्षमा-यापना दिवस गणेश उत्सव, नवरात्रि, दशहरा, दीपावली आदि पर्व चार्तुमास के दौरान बड़े पैमाने पर हर्षोल्लास के साथ मनाये जाते हंै। अधिकतर लोग श्रावण मास का व्रत, उपवास रखते है। वही इसलाम धर्म में भी रमजान के महीने में एक माह का व्रत रखने का प्रवधान है। पांचो वक्त की नमाज पढ़ना, दान देना, अपने पापों का प्रयश्चित करना एक सच्चा मुसलमान 'कुरान' में लिखे गये नियमों का पालन करता है।

हमारे धर्म में व्यक्ति की नहीं व्यक्तित्व की पूजा-उपासना होती है। जो हमें यही संदेश देती हैं कि आप भी परमात्मा के पद को प्रप्त कर सकते हैं इसके लिये आपको अपना आचार-विचार उच्च कोटि का रखना होगा। इसका पालन करने में कठिनाइयां भी आती है, पर धर्म में छूट या शैथिल्यता के लिये जगह नहीं है।

इन धार्मिक महीनों में जितना ज्यादा हो सके नियमों का पालन करना चाहिये दान-ध्यान, तप-तपस्या, सत्संग अधिक से अधिक करना चाहिये। जैनधर्मालंबियों को रात्रि भोजन का त्याग, दोनों समय प्रतिक्रमण करना तथा व्याख्यान सुनने चाहिये।

इस तरह से चार्तुमास के अंतर्गत हमें अपनी भौतिक सुख-सुविधायों से युक्त क्रियाओँ का त्याग कर आत्मिक स्तर की क्रियाओं मांजना होगा, तपाना होगा। शारीरिक व्रत के साथ-साथ मानसिक व्रत भी करना होगा। तभी हर तरह से हम आध्यात्मिक, आत्मिक उन्नति कर पायेंगे। चार्तुमास में देवशयन का रुपक हमें बाह्यमुखी वृतियों से हटकर अंतर्मुखी बनने का संदेश देता है। जीवन का सच्चा सुख परिघि से केन्द्र में जाने में है। अंतर जागरण करो और जीवन को धर्ममय बनाओ। कहते है चार्तुमास में बालटी में एक-दो बिल्वपत्र डालकर मन में 'ॐ नमः शिवाय' का मंत्र ४-५ बार बोलकर स्नान करें तो विशेष लाभ होता है। उससे शरीर का वायु दोष दूर होता है और स्वास्थ्य स्वस्थ रहता है।

याद आती है एक कहानी मुगल बादशाह अकबर ने दरबारियों से पूछा - बारह में से चार गये तो कितने बचे? सबने कहा 'आठ'। पर बीरबल चुप रहा - बादशाह ने बीरबल से जवाब मांगा - बीरबल ने उत्तर दिया 'शून्य'। अकबर ने पूछा कैसे? बीरबल बोला, 'अगर बारह महीनों में से बरसात के चार महीने निकल गये तो न फसल होगी न जीवनयापन, तब सिर्फ शून्य ही बचेगा। और आध्यात्मिक स्तर पर धर्म ध्यान के यह चार महीने निकल गये तब भी बचा 'शून्य'। इन चार महीनों में साधु-संत एक जगह रहकर धर्म की देशना देते है। मनुष्य को उचित मार्ग समझाते है। अगर यह चार महीने हमने प्रमाद में गंवा दिये तो हमारे जीवन में भी बचा सिर्फ 'शून्य'। अगर चार्तुमास के यह चार महीने न हो तो भौतिक और आध्यत्मिक दोनों सृािष्टयों से मनुष्य के लिये क्या बचेगा? सोचकर देखिये सिर्फ 'शून्य'। सावधान-आध्यात्मिकता में डूबने के लिये बुढ़ापे का इंतजार मत कीजिये। कब यह प्रण तन छोड़ देंगे हमें पता नहीं, पल-पल का सदुपयोग करके इस शून्य का हम धार्मिक क्रियाओ पीछे लगाकर, उसे अमूल्य बना दे और अपने जीवन का बैंक को जीतेजी और मृत्युपर्यंत भी मालामाल कर दे।

'इस जीने का गर्व क्या, कहां देह की प्रीत
बात कहत ढर जात है, बालु की सी भीत'

इसलिये उठिये-जागिये ओर प्रभु के प्रित पूर्ण समर्पित हो जाइये। किसी कवि ने बड़ी सुंदर बात कही हैं -
'प्रभुता को ही सब मरै, प्रभु को मरै न कोय
जो कोई प्रभु को मरे तो प्रभुता दासी होय'

अपने जीवन को सार्थक बनाइये और इसकी शुरुआत इसी चार्तुमास से शुरु कर दिजिये।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा





आषाढ की पूर्णिमा - गुरु पूर्णिमा

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय
बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविंद दिया बताय।

हर वर्ष आषाढ़की पूर्णिमाको गुरु पूर्णिमा के रुप में मनाया जाता है। गुरु वह है जो मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाय। हमारे शास्त्रों ने तो गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश की उपाधि प्रदान की है।

गुरु हमारे अंतस में सद्विचारो और चिंतन से नुतन विचारों को उत्पन्न करते है इसलिए वह ब्रह्मा है। अपने उपदेशों, व्यवहार-वाणी तथा अपने व्यक्तित्व से गुरु हमारे अंदर उत्पन्न हुए सद्विचारों का पोषण करते है, इसलिए वह विष्णु है और हमारे भीतर के विकारों का नाश करते है इसलिए वह महेश है। व्यवहारिक दृष्टि में तो गुरु और शिष्य दो भिन्न रुप, भिन्न शरीर है। लेकिन अध्यात्मिक भाव से दोनों एक है।

भारतीय संस्कृति में गुरु को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। बिना गुरु के ज्ञान नहीं मिलता। जब हमारा जन्म होता है तो माता-पिता ही हमारे गुरु होते है जो हमें संस्कारों का, आचरण का, चरित्र निर्माण का ज्ञान देते है। वही हमारे मार्गदर्शक एवम् सच्चे पथ-प्रदर्शक बनते है। इसलिये कहते है 'मां-बाप की सेवा पहली पूजा है'। फिर हम बड़े होते है, विद्यालय, महाविद्यालय का ज्ञान अर्जित करने लगते है, तब वहां के शिक्षक हमारे गुरु बन जाते है। वहां हम जीवन में व्यवसायिक सफलता को पाने की शिक्षा प्रप्त करते हैं। फिर हमारे जीवन में आगमन होता है, आध्यात्मिक गुरु का, जो हमें जीवन जीने की कला, परमात्मा को प्रप्त करने का सच्चा मार्ग दिखलाते है, श्री गुरु ग्रंथ साहिल मे लिखा गया है।

'गुरु पूरा बड़मागी पाइए – मिली साधु हरिनाम छिसाइयें'
गुरु शिष्य परंपरा वेदों, उपनिषदों के समय से रही है।

भगवान श्री राम को अपने गुरु विश्वामित्र पर अनन्य भक्ति थी, वही श्रीकृष्णने अपने गुरु पुत्र को यम से लाकर गुरु दक्षिणा का संकल्प पूरा किया। आषाढ़ पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। यह महर्षि व्यास की जन्मतिथि है जिन्होंने १८ पुराणों ओर अनेक उपपुराणों व वेदों के ज्ञान का विस्तार किया, महाभारत की रचना की।

कहते है गुरु मानवता की मुंडेर पर चरित्र का चिराग है, साधना के शिखर पर सिद्धत्व की सृष्टि है, आत्मा की भूमि पर अक्षत की वृष्टि है समाज के शीश पर सौभाग्य का सिंदूर है, अमावस्या की अंधियारी रात में पूनम का प्रकाश है। उनका हमारे जीवन पर अत्यंत उपकार होता है। कहा भी गया है, ''जो करता न कर सके वो सद्गुरु से होय, तीन लोक, नव-खंड में गुरु से बड़ा न कोय''।

गुरु वह उपकारी है जिन्हें सिर्फ शिष्य के कल्याण की चिंता होती है, गुरु ही वह शख्स है जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। गुरु के उपकारों से हम कभी ऋण मुक्त नहीं हो सकते। तभी तो गुरु द्रोण द्वारा दाहिने हाथ का अंगुठा मांगने पर भी शिष्य एकलव्य ने निर्भीक होकर अंगुठे को काटकर गुरु दक्षिणाके रुप में गुरु को प्रदान कर दिया। एक वह समय था, जब सब सुविधाओंको छोड़कर शिष्य ज्ञान प्रप्ति के लिये वर्षो तक गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा अर्जित करते थे। गुरु ही हमारी जीवन रुपी नैया के नाविक है, जीवन रुपी रथ के सारथी है। सच्चे मार्गदर्शक है - पथ प्रदर्शक है।

लेकिन आज गुरु और शिष्य की परिभाषा ही बदल गई है। न पहले जैसी एकाग्रता,न जिम्मेदारी, न विनय, न विवेक, न आदर न मान न सिर्फ एक दिन गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाकर गुरु-शिष्य की परंपरा को इतिश्री मत समझिये, बल्कि जरुरत है गुरु दत्तात्रेय जैसे महान विभुत्तियों की जिन्होंने चौवीस गुरुओंसे ज्ञान ग्रहण किया। गुरु अनेक है, मंत्र अनन्त, परंतु एक सत्य है। सद्गुरु हमें मोह-माया-लोभ-अहंकारी-क्रोध रुपी अजगर की कैद से आजाद कराते है। और इस नश्वर संसार से मुक्त होकर परमात्मा में विलीन होने की राह दिखलाते है। धन्य है ऐसे सदगुरु जो हमें मोक्ष मार्ग पर ले जाते है।

अंत में यही कहूंगी बिना गुरु के ज्ञान नहीं प्रप्त हो सकता। सद्गुरु का मिलना अति आवश्यक है क्योंकि वही हमें भव-बाधा पार कराने में सहायता करेंगे। सच तो यह है सद्गुरु के तो दर्शन मात्र से पाप-ताप और अभिषापों का नाश हो जाता है।

'गुुरु महिमा गावत सदा, मन राखें अति मोद
सो भव फिर आतै नहीं, बैठे प्रभुकी गोद'

'कबिरा संगत साधु की (गुरु की), ज्यों गंधो की बास
जो कछु गंधो दे नहीं, तो भी बास सुबास'

- श्रीमती मंजू लोढ़ा





पर्यावरण और जैन सिद्धांत

पर्यावरण हमारे जीवन का महत्वपूर्ण तत्व है। ईश्वर ने इस सृष्टि की रचना की और मुक्त हाथों से हमें प्रकृतिक संपदाओं का खजाना प्रदान किया । लेकिन मनुष्य ने अपनी लालसा और लालच में आकर इन अमूल्य संपदाओं के साथ खिलवाड़ किया। यही वजह हैं कि हमें प्रकृतिक आपदाओं से निरंतर लड़ना पड़ रहा है। अतिवर्षा, सुखा, भुकंप, भुस्लखन, बर्फ का पिघलना, अति गर्मी-सर्दी 'सुनामी आदि का सामना करना पड़ रहा है और हजारों मनुष्यों को एक साथ जान-माल से हाथ धोना पड़ रहा है।

अगर हम आने वाली पीिढ़यों को एक सुरक्षित संसार देना चाहते है तो जरुरी है पर्यावरण की रक्षा, संरक्षण, संवर्धन। जैन पद्धति से अगर जीवन को जिया जाये तो यह कोई मुश्किल कार्य नहीं।

भगवान महावीर इस युग के सबसे बड़े और पहले वैज्ञानिक है। उनका हर उपदेश विज्ञान की भाषा है। हर सूत्र न मात्र आत्मशुद्धि का सोपान है बल्कि शारीरिक स्वस्थता, पारिवारिक आनंद, निरोगी काया, शुद्ध विचार, प्रकृति से प्रेम, सामाजिक जीवन यापन, त्याग परोपकार निश्चित जीवन इत्यादि अनेकों लाभ हम उनके सिद्धांतो से प्रप्त कर सकते है।

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह तथा बह्मचर्य जैन धर्म के इन पांच मूल सुत्रों में प्रकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के संदेश निहित है। अहिंसा - प्रणी मात्र के प्रित प्रेम का प्रतीक है और पेड़ो मे भी प्रण हे, इसलिये इन्हें काटिये मत, इनकी सुरक्षा करे। पेड़ों में देवताओंका वास होता है, यह हमें शुद्ध हवा, फल-फूल-छाया तो देते ही है साथ ही इनकी लकिड़यां भी मनुष्य का जीवन-यापन करती है।

जैन धर्म में आकाश, वायु, पृथ्वी और जल सहित वनस्पति को सजीव मानते हुए इन्हें हमारे वास्तविक जीवन संरक्षक के रुप में माना गया है।

जिनशास्त्रों में जल को दूषित नहीं करने तथा उसका उपयोग जरुरत के हिसाब से कम से कम करने की व्याख्या है। (फव्वारे की जगह बाल्टी मग का प्रयोग करे, नल को खुला न छोड़े, पानी में भी जीव है उनकी रक्षा करे)। अनावश्यक लाईट का उपयोग न करे, अग्नि के जीवों की सुरक्षा करे।

जैन धर्म में चार्तुमास की परंपरा भी पर्यावरण संरक्षण का ही स्वरुप है। चार्तुमास के दौरान हमारे साधु-संत विहार नहीं करते ताकि हरितिमा, पोधों एवं सूक्ष्म जीवों का संरक्षण हो सके। हजारों वषाX से हमारे तीर्थकरों ने हमें जीवन जीने की ऐसी पद्धति बतलाई है। उससे हम अधिक से अधिक प्रकृति के करीब रहकर, स्वस्थ व प्रसन्न जीवन जी सकें। हमारे सभी तीर्थकरों को 'केवल ज्ञान' की प्रप्ति किसी न किसी वृक्ष के नीचे रहकर प्रप्त की है। पीपल, वट, अशोक वृक्ष हमारे धार्मिक जीवन के महत्वपूर्ण अंग है। हिंदू संस्कृति में भी ऋषी-मुनि जंगलों में रहकर प्रकृति की सुरक्षा के साथ ज्ञान की प्रप्ति करते थे।

याद आती है एक कहानी, एक बार एक राजा भेष बदलकर प्रजा के दुःख-सुख जानने के लिये अपने राज्य में भ्रमण करता है। एक दिन उसने देखा एक ८० साल की बुढ़िया माई अखरोट का पौधा रोप रही थी। राजा ने विचार किया यह पौधा जब तक बढ़ा होगा, इस पर फल लगेंगे तब तक तो यह माई जीवित नहीं रहेगी, यह निरर्थक ही पेड़ लगा रही है, व्यर्थ परिश्रम कर रही है यह सोचकर राजा को दुःख हुआ। वह इस बुिढ़या के पास जाकर यह बात कहते है, तब वह बुिढ़या बहुत ही सुंदर जवाब देती हे, ''पथिक-अब तक मैंने दुसरों के लगाये गये पेडों से खुब फल खाये है, अब मेरी बारी है, जीवन खत्म हो जाये उससे पहले मैं भी दो-चार पेड़ लगाना चाहती हूं ताकि मेरे लगाये प़ेडों से दूसरें लोग भी लाभ उठा सके, पेट भर सके।'' यह उत्तर सुनकर राजा गद्गद् हो गया और बोल, 'जिस देश में आप जैसे परोपकार का भाव रखने वाले नागरिक है वह देश हमेशा हरा-भरा-खुशहाल रहेगा।

अगर हम एक हरी-भरी वसंुधरा के संग सुखी जीवन जीना चाहते है तो हमें जैन धर्म के सिद्धांतों का पालन करना होगा और प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में पांच पेड़ो को लगाने का संकल्प लेना होगा।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा





तप और दान के प्रवाह का प्रवर्तक – अक्षय तृतीया

आज का दिन याने अक्षय तृतीया का दिन महामंगलकारी है। इस दिन की महिमा मात्र जैनों में ही नहीं, अजैनों में भी है। वर्ष में कुछ दिन ऐसे हैं जो 'बिना पूछे मुहूर्त' कहलाते है। वैशाख सुदी तीज की भी यही महिमा है। इस अवसर्पिणी काल में सर्वप्रथम दान धर्म का प्ररंभ इसी दिन से शुरु हुआ था। अक्षय तृतीया - यह ऐसा त्यौहार है, जिसका महात्म्य बहुत बड़ा और व्यापक है। हिंदू, वैदिक और जैन परंपराओंमें अक्षय तृतीया का महत्व बहुत ज्यादा माना गया है। यह जिज्ञासा उठनी स्वाभाविक हैं कि इस पर्व का नाम अक्षय तृतीया क्यों पड़ा? अ-क्षय, मतलब, जिसका क्षय नहीं। अर्थात हर हाल में यथावत। वैशाख मास की इस तृतीया का कभी 'क्षय' नही होता, इसीलिए इसे अक्षय तृतीया कहा गया है। भारतीय ज्योतिष शास्त्रानुसार तिथियाँ चंद्रमा और नक्षत्रों की गतिनुसार बनती है। जैसे चंद्रमा की कला घटती-बढ़ती है वैसे तिथियाँ भी घटती-बढ़ती है। एकम से लेकर अमावस्या, पुनम आदि सभी तिथियों में घट-बढ़ी चलती रहती हैं। किंतु वैशाख सुदी ३ याने आखा तीज की तिथि हजारों वषाX में आज तक क्षय तिथि नहीं बनी, आज तक यह कभी नहीं घट-बढ़ी। इसलिये इसे अक्षय तिथि कहा गया है। इसे आखा तीज भी कहा जाता है।

जैन परम्परा में अक्षय तृतीया के साथ अत्यंत महत्वपूर्ण घटना जुड़ी है। इसलिये जैनों में इस दिन का बहुत अधिक महत्व है। प्रथम तीर्थकर भगवान आदिनाथ का एक वर्ष के कठिन तप के बाद, इसी दिन श्रेयांसकुमार ने (जो कि प्रभु के पपौत्र थे) इक्षु (गन्ने) रस द्वारा पारणा करवाया था। इस तिथि को अक्षय पुण्य प्रदान करने वाली तिथि कहा जाता है। अक्षय तृतीया को दान और तप इन दोनों का अद्भुत संबंध जुड़ा होना के कारण ही यह अक्षय बन गया।

भगवान ऋषभदेव ने चैत्र कृष्णा अष्टमी के दिन बेला (दो उपवास) की तपस्या के साथ दीक्षा ग्रहण की उनके साथ अन्य ४००० व्यक्तियों ने भी दीक्षा अंगीकार की। इस तपस्या के साथ दो मुख्य बातें थी – अखण्ड मौन तथा पूर्ण निर्जल तप। अखण्ड मौन व्रत धारण कर भगवान ने चऊविहार बेला किया, उसके पश्चात विशेष अभिग्रह ग्रहण कर भिक्षा के लिए नगर में पधारे, परंतु कहीं भी शुध्द आहार नहीं मिलने के कारण भगवान नगर में भ्रमण करके वापस लौट गये और पुनः आगे का तप ग्रहण किया। इस तरह तप करते हुए १३ महीने और १० दिन व्यतीत हो गये। अंत में वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन प्रभु हस्तिनापुर पधारे। उस समय बाहुबली के पौत्र एवं राजा सोमप्रभ के पुत्र श्रेयांसकुमार युवराज थे। उन्होंने उसी रात एक विचित्र स्वप्न देखा – 'सोने के समान दीप्ति वाला सुमेरु पर्व श्यामवर्ण का कांतिहीन सा हो रहा है, मैने अमृतकलश से उसे सींचकर पुनः दीप्तिमान बना दिया है'। उसी रात्रि में सुबुद्धि नाम के श्रेष्ठि ने सपना देखा ' सुरज से निकली हजारों किरणों को श्रेयांसकुमार ने पुनः सुर्य में स्थापित कर दिया, जिससे वह सुरज अत्याधिक चमकने लगा।

उस रात में सोमयश राजा ने भी स्वप्न देखा 'अनेक शत्रुओंके द्वारा घिरे हुए राजा ने श्रेयांस कुमार की सहायता से शत्रु राजा पर विजय प्रप्त कर ली'। स्वप्न के वास्तविक फल को तो कोई जान न सके परंतु सभी ने यही कयास लगाया कि इसके अनुसार आज श्रेयांसकुमार को कोई विशेष लाभ प्रप्त होगा।

राजकुमार श्रेयांसकुमार इस विचित्र सपने के अर्थ पर विचार करते हुये गवाक्ष में बैठे हुये थे। उसी समय में राजमार्ग पर प्रभु ऋषभदेव का आगमन हुआ। हजारों लोग उनके दर्शन हेतु विविध प्रकार की भेंट सामग्री लेकर आ रहे थे। (लेकिन प्रभु के लिये उन भेटों का कोई महत्व नहीं था, वे तो त्यागी थे, शुध्द आहार की खोज में थे) जनता का कोलाहल, बढ़ती भीड और उन सबके आगे चलते प्रभु को देखकर श्रेयांसकुमार विचार में पड़ते है और सोचते 'आज क्या बात है? यह महामानव कौन आ रहे है? इस प्रकार का तपस्वी साधक मैने पहले भी कहीं देखा है? उनकी स्मृतियाँ अतीत में उतरती है, चिन्तन की एकाग्रता बढ़ती है और उन्हें जाति-स्मरण ज्ञान हो जाता है।' वह जान लेते हैं कि यह मेरे परदादा दीर्घ तपस्वी प्रभु आदेश्वर हैं और शुध्द भिक्षा के लिये इधर पधार रहे हैं। श्रेयांसकुमार महल से नीचे उतरते है और प्रभु को वंदन करके प्रर्थना करते है 'पधारो प्रभु! पधारो' उसी समय राजमहल में इक्षुरस से भरे १०८ घड़े आये हैं। शुध्द और निर्दोष वस्तु और वैसी शुध्द भावना कुमार की। श्रेयांसकुमार इक्षुरस द्वारा प्रभु को पारणा करवाते है। उस समय देवों ने आकाश में देव दुंदभि बजाई। रत्नों की पंचवर्ण के पुष्पों की, गंधोदक की और दिव्य वस्त्रो की, सुगंधित जल की वृष्टी की। ्रअहोदान! अहोदान की घोषणा की। पांच दिव्यों की वर्षा हुईङ जैन साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका भी इस तरह एक साल का व्रत रखते है (१ दिन उपवास दूसरे दिन बियासणा) और आखा तीज के दिन गन्ने के रस द्वारा पारणा करते है। उस दिन रस पीना और मंदिर में गुड चढ़ाना शुभ माना जाता है। तप और दान की दिव्य महिमा से आज का दिन (याने आखा तीज) पवित्र हुआ। भगवान ऋषभदेव का प्रथम पारणा होने से इस अवसर्पिणी काल में श्रमणों को भिक्षा देने की विधि का प्रथम ज्ञान देने वाले श्रेयांसकुमार हुये। सचमुच ऋषभदेव के समान उत्तम पात्र, इक्षु रस के समान उत्तम द्रव्य और श्रेयांसकुमार के भाव के समान उत्तम भाव का त्रिवेणी संगम होना अत्यंत ही दुर्लभ है।

तप और दान की आराधना करने वाला अक्षय पद प्रप्त कर सकेगा। यही संदेश इस पर्व में छिपा है। जैनधर्म में मोक्ष प्रप्ति के चार मार्ग बताये गये है। दान, शील, तप और भाव। अक्षय तृतीया को दान और तप इन दोनों का अद्भुत संबंध जुड़ा होना के कारण यह अक्षय बन गया।

यह पर्व हमें संदेश देता हैं कि हम भी दान-धर्म करे। अपनी जरुरतों को सीमित रख जरुरतमंदों की सहायता करे। भगवाने के सिद्धांत अपरिग्रह को अपने जीवन में अपनाये।

'चिडी चोंच भर ले गई, नदी न घट्यो नीर
दान दिये धन न घटे, कह गये दास कबीर।'
'जो पानी बाढ़ो नाव में, घर में बाढो धाम
दोनों हाथ उलाछिये, यही सयानो काम।'

कब आखिरी सांस टूट जायेगी, हमें नहीं पता, इसलिये जितना बन सके सत्कार्य में जीवन को लगाये। हर दिन ऐसा जिये जैसे आज ही अंतिम दिन है, इसलिये कल का इंतजार न करे, आज, अभी, इसी समय जितने अच्छे कार्य, दान-धर्म कर सकते है करिये।

'दुर्लभ मानव जीवन, मिले न बारम्बार
पत्ता टूटा वृक्ष का लगे न फिर से डार।'

वैदिक परम्परा में कहा जाता है कि ऋषि जमदग्नि के पुत्र, परम बलशाली परशुरामजी का जन्म आखा तीज के दिन हुआ। कुछ लोग मानते हैं कि सतगुग का प्ररम्भ भी इसी दिन हुआ था। इसलिये यह युगादि तिथि भी है। एक बार राजा युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से आखा तीज पर्व की विशेषता पूछी तो उन्होंने बतलाया – वैशाख शुक्ल तृतीय के पूर्वाह्न में जो यज्ञ, दान, तप आदि पुण्य कार्य किये जाते है उनका फल अक्षय होता है। इसीलिए यह विश्वास हैं कि इस दिन का मुहुर्त सबसे श्रेष्ठ है। इसलिये विवाह, गृहप्रवेश, व्यापार आदि का शुभारंभ अक्षया तृतीया के दिन बहुत होता है। गाँवो में तो इस दिन सामुहिक विवाह होते हैं। कई जगह तो आज भी छोटे-छोटे बच्चों का विवाह कर दिया जाता है। इस दिन सोना खरीदना भी शुभ माना जाता हैं ताकि घर में लक्ष्मी माँ की कृपा बनी रहे। इस दिन वृंदावन में साल में एक बार बिहारीजी के चरणों के दर्शन होते हैं। इस दिन मंदिरों में बिहारीजी का चंदन श्रृंगार होता है। अक्षया तृतीया को बद्रीनाथ धाम के द्वार भक्तों के लिये खुलते है। गंगा-स्नान का भी इस दिन बहुत महत्व है।

अक्षय तृतीया का महत्व क्यों है, जानिए कुछ महत्वपुर्ण जानकारी..
• आज ही के दिन जैनों के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का १३ महीने और १० दिन के बाद इक्षुरस द्वारा पारणा हुआ था।
• आज ही के दिन मां गंगा का अवतरण धरती पर हुआ था।
• महर्षी परशुराम का जन्म आज ही के दिन हुआ था।
• मां अन्नपूर्णा का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था।
• द्रोपदी को चीरहरण से कृष्णने आज ही के दिन बचाया था।
• कृष्ण और सुदामा का मिलन आज ही के दिन हुआ था।
• कुबेर को आज ही के दिन खजाना मिला था।
• सतयुग और त्रेता युग का प्ररम्भ आज ही के दिन हुआ था।
• ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी आज ही के दिन हुआ था।
• प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री बद्री नारायण जी का कपाट आज ही के दिन खोला जाता है।
• बृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में साल में केवल आज ही के दिन श्री विग्रह चरण के दर्शन होते है अन्यथा साल भर वो बस्त्र से ढके रहते है।
• इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था।
• अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है कोई भी शुभ कार्य का प्ररम्भ किया जा सकता है।

दान और तप की महिमा का संदेश देने वाला यह पर्व आप सभी के जीवन को भी आध्यात्मिक ऊँचाई की ओर ले जाये इसी शुभकामनाओं के साथ।
जय जिनेन्द्र,

- श्रीमती मंजू लोढ़ा





पति प्रेम का प्रतीक – गणगौर पूजन

गौरी या गणगौर पूजन को चिर पूरातन और चिर नूतन समझा जाता है। फाल्गुन कृष्ण की एकम से प्ररम्भ करके चैत्र शुक्ल की तृतीया तक गणगौर की पूजा की जाती है और अंतिम दिन उसका विसर्जन होता है। गौरी पूजन का महत्व जानकी जी द्वारा मनचाहा वर मांगने के लिए गौरी पूजन से समझा जा सकता है। इस पूजा और आशीर्वचन का रामायण में बड़ा ही मनोहारी वर्णन है –

'मनु जाहि राच्यो मिलही सो वर सहज सुंदर सांवरो
करुणा निधान सुजान सील सनेहु जानत रावरो
एहि भाँति गौरी असीस सुनि सिय सहित हिय हरषिं अली
सीता भवानी हि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली।

पुराणों के अनुसार पार्वती ने शिव को वर रुप में पाने के लिये घोर तपस्या की। शिवजी ने प्रसन्न होकर पार्वती सें विवाह किया। पत्नी को इतना स्नेह और सम्मान दिया कि उसे अपना आधा अंग ही बना लिया। इसलिये ऐसी मान्यता हैं कि यह व्रत स्त्रियों के प्रित पति को प्रेम बढ़ाता है। इस व्रत के पालन से कन्याओंका विवाह शीघ्र होता है और उन्हे कुलीन, धनवान तथा विद्वान वर की प्रप्ति होती है।

राजस्थान की सूखी माटी में वसंत के आते ही उत्साह और उल्लास की मानो धूम मच जाती है। कुंवारी लड़कियाँ १६ दिन तक बड़े मनोयोग और चाव से शिवजी को अपना जीजा मानते हुए, सुंदर रंग बिरंगे वस्त्र पहनकर होली के दूसरे दिन से ही पूजा शुरु कर देती है। पहले दिन होली की राख और गोबर से पिंडिया यानी ढेले बनाकर उसे मिट्टी के कुंडे में रखकर दूब और फूल से ८ या ९ दिन तक पूजती है। इसके बाद शीतला सप्तमी या अष्टमी को बडी गणगौर बिठाई जात्ी है। इस दिन चिकनी मिट्टी से शिव (ईसरजी), पार्वती (गणगौर), कानीराम (कृष्णा), रोआँ (सुभद्रा) और मालिन की मूर्तियां बनाई जाती है और उनका श्रृंगार किया जाता हैं।

(कहते हैं कि आठ दिन तक पहले गणगौर अकेली अपने पीहर में थी। इसके बाद ईसरजी उन्हें लिवाने जाते है, तब उन्हें भी वहाँ रोक लिया जाता है वह भी आठ दिन तक वहाँ रुकते है। तब दामादजी की खूब खातिरदारी होती है – सुबह-दोपहर-रात को गीत गायें जाते है।)

लड़कियाँ सुबह-सुबह नहाकर वंश के फैलाव की प्रतीक दूब और फूल लाने जाती हैं। साथ में गणगौर के गीत बड़े ही सुरीले लगते हैं। पूजा के समय भी गीत गाये जाते हैं। पहला मुख्य गीत है –

गोर ये गणगोर माता, खोल किंवाड़ी
बायर (बाहर) उभी बायाँ (सब का नाम लिया जाता है) पूजणवाली
पूजो ए पुजावो सैंय्यो क्या वर माँगो
माँगा ये महे अन-घन-लाघर (वैभव) लिंछमी
कान्ह कंवर सो बीरो माँगा राई सी भौजाई
जलहर (पानी से भराबा दल) जाभी बाबल माँगा
रातादई (जिसने मेरे लिये अपनी नींद गंवाई) भायड
फूल पिछगेकड़, फूफो मांगा, भांडा पोवण भूता
उÀँट चढ़यो भैंणोई मांगा, चुडलै वाली भैणल
लाल दुमालै चाचो मांगा बिणजारी सी चाची


इसी तरह गणगौर के हर विधा के अनेकों गीत हैं जो हमारी समृध्द लोकभाषा के प्रतीक है।
गोर गोर गोमती, इसर पूजे पार्वतीम्हे पूजा आला गिला, गोर का सोना का टिका
म्हारे है कंकू का टिका
टिका दे टमका दे, राजा रानी बरत करे
करता करता आस आयो, मास आयो
छटो छः मास आयो, खेरो खंडो लाडू लायो
लाडू ले बीरा ने दियो, बीरा ले भावज ने दियो
भावज ले गटकायगी, चुन्दडी ओढायगी
चुन्दडी म्हारी हरी भरी, शेर सोन्या जड़ी
शेर मोतिया जड़ी, ओल झोल गेहूं सात
गोर बसे फुला के पास, म्हे बसा बाणया क पास
कीड़ी कीड़ी लो, कीड़ी थारी जात है
जात है गुजरात है, गुजरात का बाणया खाटा खूटी ताणया
गिण मिण सोला, सात कचोला इसर गोरा
गेहूं ग्यारा, म्हारो भाई ऐमल्यो खेमल्या, लाडू ल्यो, पेडा ल्यो
जोड़ जवार ल्यो, हरी हरी दुब ल्यो, गोर माता पूज ल्यों

विवाहिता स्त्रियां चैत्र सुदी तीज यानी पूजा के अंतिम दिन पूजा करती है तथा अपने सुहाग, पुत्र-पौत्रादि की लम्बी आयु का वर मांगती है।

वैसे तो भारत के प्रत्येक प्रंत में विशेषकर राजस्थानियों द्वारा गणगौर की पूजा की जाती है। राजस्थान में आज भी बीकानेर, जयपुर आदि स्थानों पर बहुत धुमधाम से गणगौर का बिंदोरा निकाला जाता है। गणगार के दिन गणगौर तथा ईसरजी की मूर्तियों का विशेष रुप से श्रृंगार किया जाता है तथा उनकी पूजा काजल की टीकी, कुंकु की टीकी (९ की मात्रा) में एक पुट्ठे के कागज पर लगाकर उनके सामने रखी जाती है। दूब से पानी की छींटा दिया जाता है तथा प्रसाद चढ़ाया जाता है।

अंत में बधावा गाया जाता है। इस गीत में स्त्री परिवार को अपना गहना बताकर अपनी सास को बधाई देती है। 'म्हारै आंगण फूल्यों केवड़ो, पिछवाडै जी पसरी गजबेल सहेल्यो ए आंबो मोरियो। म्हारा सुसरोजी राजा राव, सासूजी म्हारी रतन भंडार।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा





गुड़ी-पाडवा नववर्ष एवम् लब्धियों के भंडार - गणधर गुरु गौतम स्वामी का जन्मदिन

चैत्र शुक्ल १ को गुढी पाडवा मनाया जाता है। नववर्ष का यह शुभ दिन, संपूर्ण देश में धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन सुर्योदय के बाद गुढी का पूजन किया जाता और गुढी खडी की जात्ी है। जैन धर्मानुसार भगवान महावीर के प्रथम शिष्य गणधर गौतम स्वामी का जन्म आज ही के शुभ दिन हुआ था। गणधर गौतम स्वामी का नाम गणेशजी के समान ही मंगलकारी और विध्नहारी माना जाता है। वह अक्षय लब्धि के भंडार थे उनकी वाणी और अंगूठे में अमृत का वास था। जहाँ उनका चरण-स्पर्श हो गया वहाँ धन-धान्य का अक्षय भंडार भरा रहता था। गौतम-उनका नाम ही लब्धियों से भरा हुआ है।

गौ-गाय-कामधेनु गाय के समान, त-तरु-कल्पवृक्ष के समान और म-मन-चिंतामणि रत्न के समान।

जैन धर्मावलंबी इसलिये जैन प्रतःकालीन प्रर्थना में बोलते हैं - 'अंगूठे अमृत वसे लब्धितणां भंडार, श्री गुरु गौतम सुमिरिये वांछित फल दातार'

भगवान महावीर से दीक्षा लेने के पूर्व वह वेद-वेदांग के महापंडित, चौदह विद्याओं के निष्णात वैदिक विद्वान जिनके ५०० शिष्य थे। लेकिन प्रभु महावीर की वाणी में सत्य का दर्शन होते ही वह उनके प्रित पूर्ण समर्पित हो गये और अपने शिष्यों के साथ दीक्षा आंगीकार कर ली। दीक्षा लेते ही गणधर लब्धि की प्रप्तिका तथा उन्हें संपूर्ण चौदह पूर्व का ज्ञान प्रप्त हो गया।

भगवती सुत्र तथा ज्ञाता सुत्र आदि अनेक आगमों में गणधर गौतम स्वामी का वर्णन यूं किया गया हैं कि उनका शरीर स्वर्ण के समान चमकदार, तेजस्वी और अत्यंत प्रभावान था। मुख कमल के भांति कोमल और तेजस्वी। दीक्षा लेते ही उन्होंने प्रभु से निवेदन किया - 'प्रभु मेरी दो आँखें ईर्ष्या समिति के लिए मेरी अपनी है, इसके अलावा मेरा संपूर्ण तन-मन आपके चरणों में समर्पित है। मै आज से जीवन पर्यंत बेले का तप करूँगा, यानी दो उपवास-तीसरे दिन तीसरे पहर में पारणा और फिर पुनः उपवास। वे प्रथम प्रहर में स्वाध्याय में लीन रहते, दूसरे में भगवान के एक प्रहर धर्मदेशना के पश्चात् समवसरण में बैठकर स्वयं धर्मदेशना देते, फिर ध्यान करते थे।

गणधर गौतम ज्ञान पिपासु थे। हर पल नया नया सीखने की ललक-महान ज्ञानी होते हुये भी वह हरदम प्रभु महावीर से कोई न कोई सवाल किया करते। और यही कारण है कि जैनियों को श्रुतज्ञान की विधि प्रप्त हुई। गौतम स्वामी तीर्थकर परमात्मा महावीर के चौदह हजार शिष्यों में ज्येष्ठ थे। महान तपस्वी, महान ज्ञानी थे। फिर भी बेहद विनम्र, अहंकार रहित, अगर उन्हें लगता कि उनसे कोई भूल हुई है तो पहले जाकर क्षमा-यापना करते। गौतम स्वामी जिसे दीक्षा देते, वह 'केवली' (केवलज्ञानी) बन जाते। गौतम स्वामी की प्रखर प्रज्ञा और सुन्दर समाधान की शैली हमें 'उत्तराध्ययवनसूत्र' के केशी - गौतम संवाद में दृष्टि गोचर होती है। गौतम स्वामी गुणों का भंडार है ज्ञान का अक्षय खजाना है, तप का जीवन्त रुप, जिज्ञासा का महास्त्रोत है। स्वाध्याय, सरलता, साधुता और ज्ञान की उत्कृष्ट साधना है। अगर उनके गुणों में से हम एक भी गुण प्रप्त कर सकें तो उनका अक्षय निधान हमारे जीवन में जरुर साकार होगा। हम प्रण करें कि गौतम की भांति जीवन के प्रत्येक कदम पर सचेत रहें, जागरुक रहें, अप्रमत्त रहें, विनम्र रहें और गुणज्ञ रहें ताकि गुणों की, सुखों की आनंद की बरखा हमको हमेशा भिगोती रहे।

वैसे गुढ़ी पाडवा महाराष्ट्र में बहूत धुमधाम से मनाया जाता है। महाराष्ट्रीयन लोगों के लिये नववर्ष की शुरुआत इसी शुभ दिन से होती है। इसी दिन स चैत्र नवरात्रि का प्ररंभ होता है ब्रह्मजी ने सृष्टि का प्ररंभ इसी दिन से किया था। कहते हैं कि इस दिन मालवा के नरेश विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर विक्रम-संवत् का प्रवर्तन किया।

हिंदुओंका अभ्यंगस्नान से शुरु होने वाला दिन पाडवा। घर-घर में छोटे-बडे उम्र के लोग सजधजकर पाडवा का स्वागत करते है, विजय के प्रतीक के रुप में गुढ़ी बनाकर खिड़कियों या घर के दरवाजे पर गुड़ी लगाते है। स्वास्थ्य की दृष्टि से देखें तो गुड़ी चैत्र की एकम से एक महिने तक नित्य नीम की पत्तियों का सेवन करने से व्यक्ति निरोग रहता है।

इस दिन सुर्योपासना का विशेष महत्व है, सुर्य से आरोग्य, समृद्धि और सुंदर आचरण की कामना की जाती है। सुंदरकांड, रामरक्षास्तोत्र और देवी भगवती के मंत्र का जाप भी किया जाता है। दक्षिण भारत में इसे इगादि, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक में उगादि, कश्मीर में नवरेह और सिंधी मं इसे चेटीचंड के रुप में मनाया जाता है।

आईये गुड़ी पाडवा के इस शुभ दिन हम संकल्प करें कि हम हमेशा वाणी की मिठास बनाये रखेंगे, क्रोध को त्याग क्षमा की भावना का भाव मन में रखकर जीवन को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक उत्थान की ओर ले जायेंगे।

गुड़ी पाडवा की बहुत-बहुत शुभकामनाएं!

- श्रीमती मंजू लोढ़ा





होली - उमंग, उल्लास तथा प्रेम का पर्व

'होली का दिन फिर आया है, आज गुंजा दो नया तराना
सारे बंधन तोड़ हमें है नये ढंग से रंग चढ़ाना।
भेद भूल सब ऊँच-नीच-जाति-पाति, कटूता अनबन राग द्वेष के भावों का
एक रंग में रंग देश को, नये ढंग से इसे सजाना।

होली, रंगो का त्यौहार, उमंग का उत्सव, प्रेम का पर्व तथा गीतों का मेला। वास्तव में होली हमारे जीवन के उल्लास का आईना है। यह एकमात्र पर्व है, जब लोग अपने जीवन की सारी खुशियों का खुलकर प्रकट करते है। कोई रंग बिखेरकर खुश होता है, तो कोई गीत गाकर खुशी प्रकट करता है। यह फाल्गुन मास में आती है। मगर माघ महीने से ही होली के रंग दिखने शुरु हो जाते है। माघ महीने के वसंत पंचमी से ही गावों में पहली बार गुलाल उड़ती है, फूलों की होली खेलनी शुरु हो जाती है। खेतों, खलिहानों, चोपालों पर चंग बजाते हुये लोग होली के विभिन्न गीतों की लय, ताल पर नाचते है और 'लूर' और 'घूमर' लेती हुई नारियाँ फाग गा गाकर खुशी के अनोखे आनंद में डूब जाती है। ढोल मंजीरों की ध्वनि पर कई लोग डांडिया रास की तरह 'गेर' नाचते है। माघ और फाल्गुन ये दो महिने मदनोत्सव से जुडे है। मदन का अर्थ है प्रणय, प्रेम और श्रृंगार। इसलिए इस मौसम में नृत्य, गायन, श्रृंगार, प्रेम की छटा प्रकृति से लेकर इंसानी चेहरो तक छायी रहती है। वसंत के आगमन से ही वातावरण में सुगंधी बयार चलने लगती है, पेड़ पौधे भी नवपल्लवित होकर होली की खुशी से झूमते नजर आते है। कहते है जब जिंदगी सारी खुशियों को स्वयं में समेट कर प्रस्तुति का बहाना मांगती है, तब सृष्टि हमें होली जैसा अमूल्य पर्व प्रदान करती है। होली में प्रहलाद की भक्ति, भगवान शिव का आनंदभाव और श्रीकृष्ण का प्रेम घुला है। समूचे भारत से भक्तगण इस पावन भूमि पर आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित कृष्ण और राधा की प्रेम रंग भरी लौकिक भावनाओंसे जुड़ी होली को मनाने के लिए मथुरा, वृन्दावन, नन्द्रग्रम और बरसाने में इक्कठे होते है। उस समय जो होली गीत गाए जाते है, उनमें से एक बहुप्रचलित गीत है..

मेरे जोरै आ स्याम तो पै रंग डारुं,
रंग तोपै डारूं, गुलाल तोपै डारुं, अरें तेरे गोरे-गोरे गाल गुलचा मारूं।
मेरे जोरै...
उड़त गुलाल लाल भये बादर, अरे बरसाने आज मची होरी।
मेरे जोरै...
और बाद में सब मगन होकर गाते है..
हां हां राम रंग बरसैगो,
रन्ग बरसै कछु इमरत बरसै, अरु बरसै कस्तूरी।

कृष्ण की भक्तिमयी मीराबाई ने कुछ इर प्रकार गाया है।
फागुन के दिन चार होली खेल मना रे।
बिन करताल पखावज बाजै अणहद की झंकार रे,
बिन सुर ताल छतीसूं गावै रोम रणकार रे,
सील संतोख की केसर घोली प्रेम प्रीत पिचकार रे,
उड़त गुलाल लाल भयो अंबर बरसत रंग अपार रे,
घर के पट सब खोल दए है, लोक, लाज सब डार रे,
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल बलिहार रे।

इस तरह से अनगिनत भक्तिमयी गीतों की स्वरलहरियां वातावरण को भक्ति की भावना से ओतप्रोत कर देती है।

हमारी सांस्कृतिक परंपराओ में भगवान विष्णू के नृसिंह रुप, प्रल्हाद का विश्वास, राजा हिरण्यकश्यप के अत्याचार तथा होलिका दहन की प्रचलित कथा के अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढूंढी, राधा-कृष्ण के रास याने ब्रज की होली और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुडा है। कुछ लोगों का मानना हैं कि श्रीकृष्णने इसी दिन पूतना राक्षसी का वध किया था। इसी खुशी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला का रंग खेला था। कई जगह होली में रंग लगाकर नाच गाकर शिव के गणों का वेश धारण करते है तथा उनकी बरात निकालने का दृश्य बनाते है। घरों में खीर, पुरी, करबा (दही के संग चावल डालकर बनाया जाता है) गुझिया आदि व्यंजन बनाये जाते है। उत्तर प्रदेश के प्रत्येक घर में बेसन की सेव और दहीवड़े जरुर बनाये जाते है, देश और विदेशों में भी होली बहुत धुमधाम के साथ विभिन्न तरीकों से मनाई जाती है। ब्रज की होली की बात ही निराली है। राजस्थान के भीनमाल नगर तथा बरसाने की लठभार होली प्रिसद्ध है। नंदगांव, वृंदावन और मथुरा में तो १५ दिनों तक यह पर्व मनाया जाता है। हरियाणा की धुलंडी में भाभी द्वारा देवर को सताया जाता है। बंगाल की ढोल यात्रा-चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिन के रुप मनाई जाती है। जुलुस निकाले जाते है, गाना-बजाना होता है। इस अवसर पर विशेषकर ठंडाई पिलायी जाती है। कई लोग तो ठंडाई में भांग डालकर भी पीते है। महाराष्ट्र की रंग पंचमी में सुखा गुलाल, गोवा के शिमगो में जुलुस निकालने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन, पंजाब के होला मोहल्ले में सिक्खों द्वारा शक्ति प्रदर्शन की परंपरा है तथा वह सब आनंदपुरसाहब में एकत्रित होते है। तामिलनाडु की 'कोमन पेडिगई' मुख्य रुप से कामदेव की कथा पर आधारित वसंतोत्सव है। राजस्थान के जालोर जिले के गांव आहोर में 'पत्थर होली' मनाई जाती है। मणिपुर में मणीपुरी नृत्यों द्वारा होली मनाई जाती है। उत्तर प्रदेश के जिला बरेली के बमनापुर कस्बे में पिछले ६० साल से होली के अवसर पर १८ दिन की रामलीला, रावण दहन और भव्य, आतिशबाजी होती है। उत्तर प्रदेश के आमरोहा में मुस्लिम परिवार होली की विशेष टोपियाँ बनाते है। राजस्थान के बीकानेर की होली पुरे प्रदेश में पसिद्ध है।

यह त्यौहार पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है। हिंदु हो या मुसलमान सभी इसके रंगो में रंग जाते है। प्रचीन ग्रंथो, शिलालेखो, भीत्ती चित्रों में भी होली की विस्तृत व्याख्या मिलती है। वेदों, पुराणों, नारद पुराण, जैमिनी मिमांसा में भी इस त्यौहार का वर्णन किया गया है। कालिदास रचित ऋतुसंहार में पूरा एक वर्ग ही 'बसन्तोसव' को अर्पित है। कवि कालिदास रचित 'कुमार सम्भव' जिसमें वसंत ऋतु एव् भोलेनाथ शिवजी की कामविजय का वर्णन बहुत ही सुंदर शब्दों में किया गया है। सातवी शताब्दी में रचित पुस्तक 'रत्नावली' में भी होली का वर्णन मिलता है। साहित्य में होली और फाल्गुन माह का विशिष्ट महत्व रहा है। आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर, जायसी, मीराबई, कबीर और रीतिकालीन बिहारी, केशव, घनानंद आदि अनेक कवियों ने होली का वर्णन अपनी रचनाओंमें किया है। महाकवि सूरदास ने वसन्त एवं होली पर ७८ पद लिखे है। पद्माकर ने भी होली विषयक प्रचुर रचनाएँ की है। इस विषय के माध्यम से कवियों ने जहां एक ओर नितान्त लौकिक नायक-नायिका के बीच खेली गई अनुराग और प्रीति की होली का वर्णय किया है, वहीं राधा-कृष्ण के बीच खेली गई प्रेम और छेड़छाड़ से भरी होली के माध्यम से सगुण साकार भक्तिमय प्रेम और निर्गुण निराकार का निष्पादन कर डाला है। सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो और बहादुर शाह जफर जैसे मुस्लिम संप्रदाय का पालन करने वाले कवियों ने भी होली पर संुदर रचनाएं लिखी है जो आज भी जन सामान्य में लोकप्रिय है। आधुनिक हिंदी कहानियों के लेखक प्रेमचंद की राजा हरदोल, प्रभु जोशी की अलग-अलग तीलियां, तेजेंद्र शर्मा की एक बार फिर होली, ओम प्रकाश अवस्थी की होली मंगलमय हो तथा स्वदेश राणा की होली में होली के अलग-अलग रुप देखने को मिलते है। भारतीय फिल्मों में भी होली के दृश्यों और गीतांे को सुंदरता के साथ चित्रित किया गया है।

होली के आठ दिन पहले होलाष्टक लगता है जिसमें कोई भी शुभ कार्य संपन्न नही होता है। देखा जाय तो यह त्यौहार खेतों में फसल तैयार होने की खुशी में भी मनाया जाता है। होली की अग्नि में नये गेहूं की बालियों को भूनकर खाया जाता है। इसे नई फसल का भोग लगाना भी माना जाता है। वैदिक काल में इस पर्व को नववात्रैष्टि यज्ञ कहा जाता था। उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान था। अन्न को होली भी कहते है, इससे भी इस पर्व का नाम होलिकोत्सव पडा। कुछ लोग इसे अग्निदेव का पूजन मानते है, कुछ इसे नये संवत का आरंभ तथा बसंतागमन का प्रती मानते है। इन्ही दिनों खेतों में सरसों खिल उठती है, धरा फूलों से आच्छादित हो जाती है, पेड़ पैधे, पशु पक्षी और मानव सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते है। उसी दिन प्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ था, अतः इसे मवादितिथि भी कहते है।

पर अफसोस आज होली मेल के स्थान पर शत्रूता को जन्म देती है। लड़ाई-झगड़े का कारण बन जाती है। कई जगह तो उपद्रव भयंकर रुप धारण कर लेता है और लागों को अपने जान से भी हाथ धोना पडता है। रंग-गुलाल की जगह कुछ असामान्य तत्व कीचड़, कालिख, तारकोल लगा देते है। पक्के रंगो से लोगों के कपड़े तथा चेहरा खराब कर देते है। बसों, ट्रेनों तथा आते-जाते लोगों पर पानी के तथा रंगो के गुब्बारे फेंकते है। भांग खाकर या शराब पीकर इस त्यौहार की पवित्रता नष्ट कर देते है।

आज हम रंग खेलते है पर खेल की भावना नहीं रही, होलिका जलाते है पर मन के अंदर छिपे कुत्सित विचारों का कचरा नहीं जलाते। जरुरत है इस मलोमलिन्य के भावों को मिटाने की। होली तो मानवता के रंग में रंगने का संदेश देती है। आओ प्रण करे होली की असली आत्मा को हम जीवित रखेंगे।

पाठकों को होली की बहुत-बहुत बधाई।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा





'वसंत ऋतु का स्वागत द्वार - वसंत पंचमी

सौरभ की शीतल ज्वाला से फैला उर-उर में मधुर दाह आया वसंत, भरा पृथ्वी पर स्वर्गिक सुंदरता का प्रवाह

कविवर सुमित्रानंदन की यह पंक्तिया वसंत ऋतु के आगमन पर, धरती पर स्वर्गिक साैंदर्य की कल्पना को साकार करती है। चैत्र और वैसाख ये मास मधुमास या वसंत काल कहलाते है। लेकिन माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी अर्थात वसंत पंचमी से ही इसका आरम्भ माना जाता है। वातावरण समशीतोष्ण हो जाता है।

वसंत ऋतु में प्रकृतिक साैंदर्य की अद्भुत अलौकिक छटा देखने को मिलती है। वृक्ष फूलों फलों से लद जाते है। सरोवर में सहस्त्रों कमल खिल उठते है। खेत खलिहान सरसों के पीले पीले फूलों से लहलहरा उठते है मानों खेतों में सोना फैला दिया हो। वसंती पंचमी को चारों ओर लोग नये पीले केसरिया रंग के कपड़े पहने नजर आते है। गली गली में देशप्रेम से ओतप्रोत सदाबहार गीत गुंज उठते है, 'मेरा रंग दे बसंती चोला माओ रंग दे बसंती चोला'। नव निर्माण की प्रतीक इस ऋतु के आगमन के प्रितक साथ ही धरती शस्त्रशामला हो जाती है, नई नई कोंपले फूटने लगती है, जीवन फिर अंगडाई लेने लगता है। इसलिये इस ऋतु को ऋतुराज, मधु-ऋतु, कुसुमाकर भी कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्णने गीता में कहा है, 'ऋतूनां कुसुमाकर - मैं ऋतुतुओं में वसंत के समान हूं, जैसे यज्ञों में जप यज्ञ सर्वश्रेष्ठ है वैसे ही ऋतुओंमें वसंत सबसे उत्तम है।'

वसंत पंचमी चैत्र के चालीस दिन पहले ही आ जाती है, इसे वसंत ऋतु के आगमन का स्वागत द्वार कहा जाता है। गांवो में फूलों की होली भी वसंत पंचमी से खेली जाने लगती है। वसंत पंचमी किसी भी शुभ कार्य को प्ररम्भ करने के लिये बिना दिखाया शुभ मुहूर्त है। इसके विषय में वैदिक साहित्य में एक कवि ने बहुत सुंदर कल्पना की है। एक साल में छ ऋतुएँ होती है, वसंत ऋतुओंका राजा कहलाया जाता है, इसलिये अन्य पांच ऋतुओंने सोचा 'हमें राजा को कोई अमूल्य भेंट देनी चाहिये' तब उन्होंने अपने हिस्से के ८ - ८ दिन ऋतुराज को भेंट कर दिये, इससे उन्हें ४० दिन अतिरिक्त मिल गये। यही वजह है जो अन्य ऋतुओंद्वारा प्रदत्त इन चालीस दिनों में कभी मौसम ठंडा, कभी गर्म, कभी बरसात कभी प्रचण्ड हवाएँ याने हर ऋतुका प्रभाव दिखाई देता है।

वसंत पंचमी को भारतीय मनीषियों ने विद्या की देवी सरस्वती पर्व के साथ भी जोड़ दिया है। वैदिक पुराणों के अनुसार आज ही के दिन देवी सरस्वती का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था। मनुष्य ने आज ही के दिन वर्णमाला, अक्षर ज्ञान, लिपिविद्या की शिक्षा प्ररम्भ की थी। भगवान आदिनाथ ने अपने पुत्रियों, बह्मी और सुंदरी को अंक और अक्षर ज्ञान आज ही के दिन सिखाना आरम्भ किया था। नये विद्यार्थी को मां सरस्वती का पूजन कर, उनका आशीर्वाद लेकर वसंत पंचमी के दिन शिक्षा का शुभारंभ करना चाहिये। मां सरस्वती हमारी एकाग्रता अर्थात् माला, तन्मयता याने वीणा, शास्त्र-स्वाध्याय-पुस्तक, विवेक-हंस तथा मन की विरक्तता, निस्पृहता कमल की प्रेरक है वही सफेद वस्त्र बेदाग चरित्र का प्रतीक है। यह सब मिलकर हमें यह संदेश देते है कि मां सरस्वती का वरदान उसी को प्रप्त होता है। जिसका मन बेदाग, निर्मल, विकाररहित है। मां सरस्वती की आराधना के लिये ॐ रीं नमो नाणस्स'का जाप करना चाहिये। स्वयं गणधर देव ऋतु (शास्त्र) रचना करने से पहले 'णमो सुय देवस्य - ऋतु देवता' का पठन करते है। अंगविज्जा ग्रंथ में ज्ञान एवम् बुद्धि के देवता के रुप में सरस्वती का नामोल्लेख किया गया है। ऋग्वेद में सरस्वती को पवित्रता शुद्धता, एवम् अन्य ग्रंथो में वह पुण्य सलिला नदी, देवता और वाक्देवता के रुप में वर्णित है। शिव पुराण, वायु पुराण, ब्रह्मवैर्क्त पुराणों में सरस्वती को अनेक विद्याओें की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। वही इस ग्रंथ से बताया गया है कि श्रीकृष्णने सर्वप्रथम वसंत पंचमी को ज्ञान की देवी सरस्वती के पूजनका विधान प्रंरभ किया था। दुर्ग सप्तशती के तृतीय चरित्र में महासरस्वती के अद्भूत दिव्य चरित्र का विवरण है। इस ग्रंथानुसार महासरस्वती दुर्गा का एक रुप है।

तिब्बत में सरस्वती को महासरस्वती, वज्रशारदा आदि रुपों में देखा जाता है। वह उन्हीं वीणा सरस्वती तथा चीनी नीला सरस्वती के रुप में 'माँ सरस्वती' को मानते है। आज तो संपूर्ण विश्व में साक्षरता अभियान चलाया जा रहा है। देश और समाज के विकास के लिये प्रत्येक नागरिक को संस्कारित शिक्षित होना अत्यंत आवश्यक है। राजा और धनवान तो देश या काल क्षेत्र में पहचाने जाते हैं पर शिक्षित वह भी संस्कारवान अपनी विद्या के बल पर संपूर्ण विश्व में अपनी पहचान बना सकता है।

वसंत पंचमी को कामदेव की पूजा का पर्व भी माना जाता है। इसे मदनोत्सव भी कहते है। महाकवि कालिदास द्वारा रचित 'कुमारसम्भव' नुसार यह पर्व मदन-दहन अर्थात् शिव शंकर की काम-विजय का प्रतीक पर्व भी माना जाता है। जो हमें यह संदेश देता हैं कि ज्ञान पूजा करो, ज्ञान प्रप्त करो फिर ज्ञान द्वारा वीतराग भाव की प्रप्ति करो। सच्ची विद्वता और विद्या वही है आत्मसुधारक हो अभिमान, दुर्भावना, विषयाशा, ईर्ष्या, लोभ आदि दुर्गुणों का नाश करना चाहिये।

भगवान म्ाहावीर का यह संदेश वसंत पंचमी के पर्व को इस तरह से चरितार्थ करता है 'नाणस्स सव्वस्स पगासणाए, अन्नाण मोहस्स विवज्जणाए, रागस्स दोसस्स य संखएणं, एगंत सोक्खं समुवेदू मोक्खां'। अज्ञान और मोह का नाश होने पर संपूर्ण ज्ञान का आलोक प्रप्त होता है और ज्ञान द्वारा मनुष्य मोह-माया पर विजय प्रप्त कर वीतराग बनता है।

यह पर्व हमें संदेश देता है कि जिस तरह वसंत पंचमी वसंत का स्वागत-सत्कार करती है और वातावरण को खुबसुरत बनाती है उसी तरह हमें भी ज्ञान की देवी सरस्वती के चरणों में वंदन कर उससे यही प्रर्थना करनी चाहिये कि 'हे मां अज्ञानता का अंधकार दूर कर मुझे ज्ञान का प्रकाश दीजिये ताकि मेरे आत्मा मेरे दिल-दिमाग पर छाई हुई हर मलीनता दूर हो सुंदर विचारों द्वारा मेरा यह जीवन भी सुंदर बन जाये।

- श्रीमती मंजू लोढ़ा