Articles | Shri Sunder Chand Thakur

सजा ही सिखाएगी सबक

Sunder Chand Thakur

जिस देश में हर आधे घंटे में एक रेप होता हो, वहां रेप विक्टिम्स के प्रति लोगों का बहुत संजीदा न होना हैरान करने वाला नहीं। आए दिन तो रेप की खबरें पढ़ने-सुनने को मिलती रहती हैं। इतनी संख्या में रेप होते हैं कि कुछ मामलों को मीडिया भी नजरअंदाज कर देता है।

दिल्ली रेप केस में पीडि़ता को ‘निर्भया’ घोषित करने के बाद मीडिया ने अपनी सहूलियत से दूसरी न जाने कितनी ही निर्भयाओं की ओर नजर उठा कर भी नहीं देखा। जाहिर है कि ऐसी खबरों के चयन में पीड़िताओं और रेपिस्ट की ‘क्लास’, उसका वर्ग अहम होता है। मगर थोड़ी देर के लिए आप जरा वर्ग से बाहर निकल कर व्यक्ति पर आएं और खुद को बलात्कार-पीड़िता के भाई, पिता, बहन और मां के रूप में देखें, तो शायद आपको अहसास हो कि आप एक संप्रभु, सभ्य और आजाद मुल्क में नहीं, बल्कि वहशियों और दरिंदों की दुनिया में जी रहे हैं, जहां शासन तंत्र के नाम पर सिर्फ आपको भरमाने के लिए आपकी सुरक्षा के वास्ते तरह-तरह के विभाग खोल दिए गए हैं।

मुंबई रेप केस की खबर आने के बाद पब्लिक को गुस्सा आने में देर नहीं लगी। लोगों के लिए यह बर्दाश्त से बाहर था कि मुंबई जैसे शहर में जहां लड़कियों को दूसरे शहरों की तुलना में ज्यादा सुरक्षित माना जाता है, वहीं दिन दहाड़े गैंग रेप हो जाए। यह शहर ऐसा है जहां ज्यादातर मांएं, बहनें और बेटियां काम पर जाती हैं और कई बार देर रात लौटती हैं। पब्लिक के लिए पीड़िता बहन और बेटी की तरह थी। गुस्सा स्वाभाविक था। लेकिन इस गुस्से के भीतर ही मुझे कुछ मर्दों की फुसफुसाहटें भी सुनाई दीं। उनका पहला ही सवाल था कि लड़की आखिर उस सुनसान इलाके में एक पुरुष साथी के साथ क्यों गई। वे लड़की और उसके साथी के इरादों पर शक कर रहे थे। मुझे यह कुछ अटपटा लगा। क्योंकि मुद्दा तो असल में रेप का था, लड़की और लड़के के इरादों का नहीं।

ऐसा अक्सर ही होता है। किसी लड़की का रेप होता है, तो रेप करने वाले के अपराध और उसे सजा दिलाने की बात के बीच बहुत से लोग पीड़ित लड़की पर भी तंज कसने लगते हैं। नेताओं और पुलिस कमिश्नरों तक ने बलात्कारों के लिए लड़कियों के कपड़ों को दोषी ठहराया है। सवाल यह है कि लड़कियां क्यों अपनी सुरक्षा के लिए अपनी आजादी का त्याग करें! पुरुष ही क्यों नहीं ऐसी हरकतें करने से बाज आते! और अगर वे नहीं मानते, तो क्यों नहीं कानून उन्हें माकूल सजा दे कर सबक सिखाता!

रेप जैसी घटनाओं के बढ़ने के लिए और भी कई तरह के तर्क दिए जाते रहे हैं। एक वर्ग है जो इसके लिए पॉर्न फिल्मों और इंटरनेट पर एक क्लिक भर से मिलने वाली पॉर्न क्लिप्स को दोषी मानता है। उसका कहना है कि नौजवान पॉर्न देख-देख कर इस हद तक उससे प्रभावित हो जाते हैं कि अपना आपा खो बैठते हैं और उनसे रेप हो जाता है। मेरा पूछना है कि क्या कोई यह जानते हुए भी रेप कर सकता है कि उसके बाद उसे आजीवन जेल में रहना पड़ेगा?

रेपिस्ट का किसी भी नजरिए से हिमायती नहीं हुआ जा सकता। वह चाहे उच्च वर्ग का हो या निम्र वर्ग का, पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़, किशोर हो या बूढ़ा, सबको मालूम होता है कि रेप एक अपराध है। जानते हुए भी वे यह अपराध अगर करते हैं, तो इसीलिए कि वे समझते हैं कि लड़कियां कमजोर होती हैं, उन्हें अपनी इज्जत की परवाह होती है, इसलिए वे किसी को कुछ बताएंगी ही नहीं। उनका यही सोच उन्हें उकसाता है। पुलिस और कानून का डर तो बहुत बाद की बात है। मुंबई गैंग रेप के एक आरोपी ने यही कहा है कि उसे यह उम्मीद न थी कि लड़की पुलिस के पास चली जाएगी।

असल में रेप के खिलाफ लड़ाई कई मोर्चों पर लड़ी जानी है। पुरुषों की मानसिकता और स्त्री को महज देह के रूप में दिखाए जाने का प्रचलन, दोनों ही बहुत खतरनाक हैं और एक दूसरे के पोषक हैं। इसके लिए सूक्ष्म स्तर पर लड़ाइयां लड़नी होगी। परिवार से लेकर व्यापक समाज में पुरुषों के व्यवहार को निशाने पर रखना होगा। मगर यह लंबी लड़ाई हो सकती है। निश्चित और त्वरित परिणाम के लिए पुलिस और अदालतों को उदाहरण सेट करने होंगे। क्योंकि सिर्फ सजा का डर ही अंधे मर्दों की निरंकुशता पर लगाम लगा सकता है।

- श्रीसुन्दर चंद ठाकुर (संपादक, नवभारत टाइम्स)
साभार - नवभारत टाइम्स


मुझे माफ करना लड़कियो...

Sunder Chand Thakur

मुझे लड़कियों का मुक्तकंठ से हंसना बहुत अच्छा लगता है। जब दो-तीन लड़कियों का ग्रुप मस्त होकर खिलखिलाता मेरे सामने से गुजरता है, तो लगता है कि जैसे कोई जीवंत कविता चली जा रही हो। जैसे कोई निर्झर बहा जा रहा हो। लड़कियों के खिलखिलाने से ज्यादा नैसर्गिक क्या हो सकता है! लड़कियों की तुलना में लड़के कम खिलखिलाते हैं। वे घूरते ज्यादा हैं। किसी भी शहर चले जाओ, किसी भी गली, मोहल्ले, सड़क, मॉल- हर जगह आपको घूरते हुए लड़के दिख जाएंगे। उनके घूरने को देख कर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर उन्हें सुनसान अकेले में कोई लड़की मिल जाए, तो वे क्या करेंगे। सुनसान क्यों, शहरों में लड़के सरेआम शरारतें करने से बाज नहीं आते।

कहने को हम एक आजाद मुल्क के बाशिंदे हैं, मगर हमारी आजादी सिर्फ कुछ खास लोगों तक सीमित है। क्योंकि अगर वह असीमित होती, तो हमें देर रात भी सड़कों और सुनसान राहों पर लड़कियां दिख जातीं। वे अनजानी जगहों में भी बेखौफ घूमतीं। उनकी आंखों में डर, शर्म और जलालत के अंधेरे की बजाय खुशी और उम्मीद की रोशनी दिखाई देती। उनकी मांएं सूर्य ढलने के बाद से ही उनकी चिंता नहीं करने लगतीं कि उनकी बेटियां अब तक घर क्यों नहीं लौटीं। हम मानसिक रूप से रुग्ण मुल्क में हैं, जहां स्त्री को देह से ऊपर नहीं उठने दिया गया। उसे बचपन से हमने सीमित दायरों में रहने को मजबूर किया। जिसने इस दायरे को तोड़ना चाहा, उसके जिस्म पर हमने हंटर बरसाए। हमने उन्हें कुल्हाड़ियों से काट दिया।

मुंबई में फोटो-जर्नलिस्ट लड़की के साथ जो हुआ, वह साबित करता है कि इस मुल्क में जहां भी थोड़ा-सा सुनसान है, जहां भी लड़की अकेली है, जहां भी थोड़ा-सा डर है, वहीं दरिंदे घात लगाए बैठे हुए हैं। आप अपनी चार साल की बच्ची को घर के आंगन तक में खेलने नहीं भेज सकते। दरिंदे उसे आंगन से ही उठा कर ले जा सकते हैं। आपकी पत्नी ऑफिस से जिस कैब में लौट रही हैं, उसी कैब का ड्राइवर उसकी इज्जत लूट उसकी हत्या कर सकता है। दरिंदे इतनी बड़ी संख्या में फैल चुके हैं कि लड़कियां अपने भाई, पिता और बॉयफ्रेंड के साथ भी महफूज नहीं। आदर्श स्थिति तो यह थी कि लड़कियां लड़कों की तरह ही अपनी मर्जी के सारे काम करतीं। मगर हम न सिर्फ कागजों पर ही आजाद कहलाने वाले मुल्क में हैं, बल्कि हमारा पूरा सिस्टम भी सिर्फ दिखाने भर को है। नगरपालिका से न्यायपालिका तक, पंचायतों से लोकसभा तक, पुलिस, प्रशासन - सभी में जैसे 66 सालों से दीमक ही लग रहा है। स्थितियां इतनी बदतर हैं कि अब हाथ खड़े कर समर्पण करने के अलावा कोई चारा नहीं।

इसलिए न चाहते हुए भी मैं लड़कियों की सुरक्षा के लिए आपसे गुजारिश करता हूं कि कृपया दिल पर पत्थर रख कर उनकी आजादी के बचे-खुचे पंख भी कतर डालिए। उन्हें समय पर घर लौटने को कहें। उन्हें कहें कि दिन में भी वे सुनसान और अकेली जगहों पर न जाएं। अपने पिता, भाई या पुरुष मित्रों के साथ भी नहीं। दरिंदे कई संख्या में एक साथ हमला कर सकते हैं। वे फेसबुक से दूर रहें। कोई भी उन्हें बहला-फुसला कर दोस्ती कर सकता है और दोस्ती के बहाने कुछ भी। उन्हें भूल कर भी बाबाओं, महात्माओं का दर्शन करने, उनसे आशीर्वाद लेने न भेजें। बाबाओं की करतूतों के कई मामले सामने आ चुके हैं। वे भीड़ भरी बसों में सवार न हों, भीड़ भरे बाजारों और मॉलों में न जाएं, क्योंकि वहां उन्हें शालीन दिखने वाले लोगों की अशालीनता भी झेलनी पड़ सकती है। कॉलेज में, दफ्तर में, हर जगह वे लड़कों, पुरुष साथियों से ज्यादा हंस कर बातें न करें। क्योंकि उनकी हंसी का कोई गलत अर्थ निकाल सकता है और इंकार करने पर उनके चेहरे को तेजाब से जला प्रतिशोध ले सकता है। स्कर्ट और खुली बांह के टॉप के साथ-साथ वे जीन्स और टी-शर्ट न पहनें, क्योंकि ऐसा करने से हमारे देश के मर्दों का ईमान-धर्म डगमगा सकता है। जितने भी निषेध हैं, सब लड़कियों पर लागू कर दें।

लड़कियों से दरख्वास्त है कि वे मुझे माफ करें और अपने नसीब को कोसें। अव्वल तो उन्हें लड़की ही क्यों बनाया गया और अगर बनाया भी गया है, तो उन्हें निम्न और मध्यवर्गीय परिवारों में क्यों पैदा किया, जिन्हें हर ओर से जुल्मतों का शिकार होना पड़ता है।

- श्रीसुन्दर चंद ठाकुर (संपादक, नवभारत टाइम्स)
साभार - नवभारत टाइम्स


उत्तराखंड़ त्रासदी : कोई रोया क्यों नही

Sunder Chand Thakur

कभी आपनों मौत को करीब से महसूस किया हो, तो जाना होगा कि उसे सामने देखकर कैसी दहशत होती है। खासकर तब जबकि आप पूरी तरह से स्वस्थ हों और जीवन का लुफ्त ले रहे हों और अचानक कहीं से नमूदार हो जाए। कुछ वर्ष पहले मैं परिवार के साथ जिम कॉर्बेट पार्क गया था। वहाँ हम खुली जीप में सवार होकर जंगल के अंदर घुसे हुए थे। हम एक जगह हाथियों का झुंड़ देखकर रूक गये और उत्साह में उनकी तस्वीरें लेने लगे। पता नहीं कैमरे के फ्लैश का असर था कि क्या, अचानक झुंड़ की नेता एक हाथिनी ले जोर से चिंघाड़ मारी और हमारी ओर लपकी। जीप में मेरी पत्नी और बेटी भी थे। एक क्षण को हम एक दूसरे को भूलकर अपने खुद के प्राण बचाने को जीप के अंतरों-कोनों में दुबक गए। मैंने सिर्फ एक उड़ते पल में अपनी बेटी और पत्नी का चेहरा देखा। वहां मुझे जो खौफ दिखा, उसे मैं कभी नहीं भूल सकता।
तो आप कल्पना कीजिए, उत्तराखंड में जब हहराता हुआ पानी पूरा पहाड़ लिए लोगों की ओर बढ़ा होगा, तो उनके दिलों में कितना खौफ उतर गया होगा। मैं और मेरा परिवार तो हाथिनी के गुस्से से बच गया था, क्योकि वह जीप के कुछ मीटर दूर पर रूक गई थी और तब तक ड्राइवर ने जीप भगा ली, लेकिन उत्तराखंड़ में बादलों के फटने से टूटकर गिरे पानी को न रुकना था। उत्तराखड़ में प्राकृति के इस प्रकोप की ऐसी-ऐसी मार्मिक खबरें सुनने को मिली है कि कलेजा कांप जाता है। सोचिए जरा मौत का तांड़व करता पानी आपकी ओर बढ़ रहा है और आपसे हाथ भर की दूरी पर आपका दिल का टुकड़ा उसकी चपेट में आ जाता है। आपकी बेटी पापा-पापा चिल्लाती चेहरे पर बेशुमार खौफ लिए पानी में बह निकलती है, आपकी पत्नी एक क्षण में ही विकराल लहरों में खो जाती है, तब आप पर क्या गुजरेगी? कोई हैरानी नहीं कि अपने परिवारों को इस तरह काल में समाते देख कई लोगों ने चुपचाप खुद भी उफनती नदी के पानी में छलांग न लगा दी हो।
उत्तराखंड़ में त्रासदी के पहले दिन से ही बेहद डरावनी और रोंगटे खड़े करने वाली तस्वीरें देखने को मिलने लगी थी। चारो ओर त्रासदी की ऐसी मार थी कि जिसके हाथ में मोबाइल था, वही अन्यथा बेहद दुर्लभ लगने वाली वीडियो रेकॉर्डिग कर ले रहा था। पहाड़ पर बने मकानों का भरभराकर गिरना और खौफनाक नदी में समा जाना, सड़क के किनारे खड़ी गाड़ियों का धिरे-धिरे खिसकना और लुढ़कते हुए खई में गिर जाना, इंसानी लाशों का तैरता दिखना, बड़े-बड़े पत्थरों, चट्टानों को लिए नदी का विकराल रूप, इन सभी दृश्यों को मोबाइल के वीड़ियों रेकॉड़र के जरिए फेसबुक और यूट्यूब में पहुचने में ज्यादा देर नहीं लगी। यही वजह थी कि देश भर में उत्तराखंड़ की त्रासदी के लिए मदद के हाथ बढ़ने में भी देर नहीं लगी। मगर मुझे अफसोस इस बात का हुआ कि उत्तराखंड़ का नेतृत्व ऐसी घनघोर त्रासदी के बीच भी अपनी सरकारी औपचारिकताओं के बाहर नहीं निकल सका। यहीं पर नेतृत्व की संवेदना उजागर होती है। राज्य के नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य के प्रशासन की है। अमेरिका में जब स्कूल के बच्चे शूटिंग का शिकार हुए थे तो राष्ट्रपति ओबामा सारेआम रो पड़े थे। उनके वे घड़ियाली आंसू नहीं थे, दिल से निकले आंसू थे। लेकिन क्या उत्तराखंड़ के मुख्यमंत्री और क्या दूसरे मंत्री, यहाँ तक वहां का दौरा करके आने वाले सोनिया गांधी, राहुल गांधी समेत दूसरे राज्यों के मंत्री, किसी का कलेजा नहीं फटा, किसी को रोना नहीं आया। एक बूंद आंखों से नहीं टपकी। यही हकीकत है। जिसके पास सत्ता है, उनके पास दिल नहीं है, और आंसू दिल से निकलते हैं।
इन्हीं के बीच आर्मी कमांड़र भी वहां पहुंचे और उन्होंने घोषणा करने में देर नहीं लगाई कि अंतिम व्यक्ति को बचा लिए जाने तक सेना वहां से नहीं लौटेगी। बहुगुणा जी राहत और बचाने की बातें करते रहे, लेकिन उनकी बातों से किसी को राहत नहीं मिली। रोने की बात छोड़िए, इस देश में मोदी सरीखे भी नेता है जो अपने लाव-लश्कर के साथ पहुंचे और चुन-चुनकर फंसे हुए गुजराती लोगों को ले गए। हर राज्य का मंत्री अपने ही राज्य वालों की फ्रिक दिखता फिर रहा था। उत्तराखंड़ के लोगों की ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया। जिन्हें पहाड़ों से बाहर लौटना था, उनके लिए हैलिकॉप्टर गए, उन्हें बाहर ले आया गया, लेकिन जो वहीं के रहने वाले थे, जिनके घर डूब गए, परिवार बह गए, उनकी ओर किसी ने नहीं देखा। कौन देखता? जिनके दिलों में उनके लिए संवेदना ही नहीं, वह भला क्यों देखने वाले थे।

- श्रीसुन्दर चंद ठाकुर (संपादक, नवभारत टाइम्स)
साभार - नवभारत टाइम्स