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इस सच को स्वीकार करें

Swaroopchand Goyal

भारत एक लोकतंत्रीय देश है। 18 वर्ष के पाश्चात् सभी नागरिकों को अपना मत देने का अधिकार प्राप्त है। मत देते समय प्रत्येक नागरिक को यह देखना होता है कि देश का, समाज का, मेरी भावना तथा मेरा भला-बुरा किसके साथ है, इसका ध्यान रखना है। मैं किस दल का चुनाव करू, जिससे मेरी आशा, आकांक्षा पूरी हो सके। यही कारण है चुनाव आने के कुछ महिनें पहले राजनीतिक पार्टी, वह क्षेत्रिय हो या राष्ट्रीय, विभिन्न प्रकार के वादे करते है। जनमानस को अपनी ओर लाने के लिए पता नहीं आजकल क्या-क्या वादे करते है। कुछ क्षेत्रिय भावनाएं भड़का कर, लालच देकर, बड़े-बड़े वादे कर लुभातें है। चुनाव से पहले अपने पिछले किये कामों का प्रचार करते हुए लाखों नही, करोड़ो रुपये बहा दिये जाते है। गरीबी का लाभ उठाकर दारू से लेकर नकद रुपये पानी की तरह बहाने का कार्य भी होता है। अर्थात् लालच देकर भोले-भोले नागरिकों को अपने पक्ष में किया जाता है। गरीबी हटाओ, महंगाई खत्म करने तथा भ्रष्टाचार मिटाने तक की कसम खाई जाती है। साड़ी बांटना, लैपटॉप बांटना मानो फैशन बन गया है।
यदि यह सब सही हो तो, ऐसे में श्रीराम मंदिर की बात की जाती है तो क्या गलत है। चुनाव के समय राय लेने का काम है। अपनी जन्मभूमि पर श्रीरामजी आज एक चबूतरे पर अस्थाई त्रिपाल के नीचे विराजमान है, जो कि देश के करोड़ो जनता की भावनाओं को ठेस पहुंचा रही है। यदि उस स्थान पर भव्य मंदिर बने तो गलत क्या है, इसमें क्या दोष है। चुनाव के समय ही आम जनता को अपनी राय देने का अवसर प्राप्त होता है। यदि बहुसंख्य समाज राम मंदिर को भव्य बनाना चाहता है तो उसकी अवहेलना क्यों की जाये। यही समय है कि जनता अपनी राय दे सकती है। बार-बार चुनाव होंगें, हर बार जब तक भव्य मंदिर नहीं बनेगा यह मांग होती रहेगी। इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा। यदि किसी को विरोध है तो उसे भी स्वतंत्रता है, वह करे। फैसला जनता ही करेगी, जबकि सत्तारुढ़ दल बार-बार गरीबी हटाने, मंहगाई खत्म करने की बात करते है, जबकि गरीबी बढ़ती जा रही है। फैसला हो जानें दो। अंत में जो भी आयेगा सभी को मान्य होता है। एक दिन ऐसा आयेगा जब सत्य की विजय होगा। कहतें है देर है, अंधेर नहीं।

- स्वरूपचंद गोयल
संरक्षक ट्रस्टी, श्रीहरि सत्संग समिति, मुम्बई

राम का नाम लेनेवाले कथाकार व संस्थाएं क्या राम का काम कर रहीं है?

Swaroopchand Goyal

वर्तमान समय में देशभर में स्थान-स्थान पर श्रीराम कथाएं हो रही है। सुंदरकांड का पाठ होता ही रहता है, होना ही चाहिए। नवरात्रि के समय देशभर में विशेष कर उत्तर भारत में रामलीला कार्यक्रम विशाल रूप से होते है। बड़े-बड़े रावण के पुतले जलाये जाते है। लेकिन प्रश्न उठता है, क्या राम जिन्होंने राज्य त्याग कर वनवास का सहारा लिया,14 वर्षों तक वन-वन भटके। आखिर क्यों?
रावण एक शक्तिशाली के साथ-साथ पंड़ित था, शिवजी का भक्त था, पूजा पाठ में विश्वास रखता था। लेकिन उसका आचरण राक्षसी वृत्ती का था तथा उसके द्वारा संतों को सताना, हवन, यज्ञों में विध्न डालना, सभी ओर आतंक का राज्य था। सभी देवी-देवताओं को वह कैद कर रहा था। यहां तक की काल को भी बांध दिया था। इस बलशाली राक्षस प्रवृत्ती का नाश करने के लिए श्रीराम वनवासी बने। चक्रवर्ती राजा के जेष्ठ पुत्र होते हुए भी रावण से युद्ध करते समय अयोध्या से सेना नहीं मंगाई। अपितु वनवासी जनजाति के तथाकथित वानरों का सहारा लिया। वनवास के दौरान केवट को गले लगाया। भीलनी के झूठे बेर खाये। प्रभू राम ने अपनी यात्रा में पंछियों को भी गले लगाया। ऋषियों, मुनियों से आशिर्वाद के साथ शक्तियां भी ली। यही वनवासी को साथ लेकर उन्होंने रावण पर संतों के आशिर्वाद की शक्ति से विजय प्राप्त की। अंत में 14 वें वर्ष में रावण का तथा उसके पूरे कुल का नाश किया। इससे क्या संदेश मिलता है, समाज का कोई भी अंग छोटा नहीं है, सभी उपयोगी है।
वर्तमान रामलीला करनेवाली संस्थाएं हो अथवा श्रीराम कथा के कथाकार क्या उन्हें यह आभास होता है कि जो श्रीराम की सेना थी, राजा राम को राम बनाया, उसका आज क्या हाल है, प्रभू श्रीराम का क्या हाल है। जन्म स्थान, जहां अयोध्या में राम का जन्म स्थान है, उसकी क्या दशा है। हम अपने निवास में स्थापित मंदिर को सजा कर रखेंगे, लेकिन एक मात्र जहाँ पर राम का जन्मस्थान है, उस मंदिर को सेकड़ों साल पहले मुगलों ने तोड़कर मस्जिद का रूप दे दिया। राम सेवको एवं देश के लाखों जनता ने इस कलंक को मिटा दिया है। कोर्ट के द्वारा भी यह सिद्ध हो चुका है कि यहां रामलला का मंदिर था। अपनी जन्मभूमि पर श्रीरामजी आज एक चबूतरे पर अस्थाई त्रिपाल के नीचे विराजमान है, जो कि देश के करोड़ो जनता की भावनाओं को ठेस पहुंचा रही है। आज जिस स्थिति में यह स्थान है, करोडों देशवासियों के लिए शर्म की बात है।
अतः आवश्यकता इस बात की है श्रीराम कथाकार अपनी कथा के माध्यम से जनजागृति करके श्रीराम कथा को सार्थक बनाये। आज देश में श्रीराम द्वारा लंका के लिए सेतु बनाया गया गया था जो आज भी समुद्र में स्थापित है, उसको भी खंडित करने का षड़यंत्र चालू है। आज करोडो राम भक्त राम की सैनिक हमसे अलग है। उन्हें हमें गले लगाना होगा तभी देश बचेगा। वर्तमान में आवश्यकता है सभी कथाकारों का रामलीला आयोजकों का कि वह इस ओर श्रीराम के आदर्शों पर ध्यान दे तभी सही अर्थ में हम रामभक्त कहलाएं। श्रीराम कथा एवं रामलीला का लक्ष्य पूरा होगा। प्रभू सद्बूद्धि दे।

- स्वरूपचंद गोयल
संरक्षक ट्रस्टी, श्रीहरि सत्संग समिति, मुम्बई