Organization | Shri Jeenmata Prachar Mandal, Mumbai

या देवी सर्व भूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता I     नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः II
सनातन ग्रंथों के अनुसार नवदुर्गा (जयंती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री) का उद्गम देव मुनियों की धोर तपस्या से प्रसन्न हो माँ आदिशक्ति पार्वती के इन रूपों में हुआ। यह नव दुर्गाओं के नाम से जाने जाते है। इनमें प्रथम रूप माँ जयंति का मंदिर सीकर जिले के (रेवती नगर) रेवसा के पास अरावली पर्वत माला में स्थित है। इस स्थल पर सतयुग में पूजा अर्चना होती थी एवं बड़े-बड़े राजा महाराजाओं ने अपने-अपने ढ़ंग से पूजा-अर्चना की। इसी स्थान पर भ्रामरी माता का भी मंदिर है। इस मंदिर में माँ कंकाली एवं दानवीर जयदेव का शीश भी रखा है। जयदेव, महाराज जयचंद के सेनापति थे। चौहान वंश में माँ जयंति को कुलदेवी के रूप में मानते आ रहें है।

जीणमाता का परिचय - लोक काव्यों, गीतों व कथाओं में जीणमाता का परिचय मिलता है जो इस प्रकार है। राजस्थान के चुरू जिले के घांघू गांव में चौहान वंश के राजपूत महाराज गंगोजी चौहान के घर जीवण (जीणमाता) का जन्म हुआ। उसके बड़े भाई का नाम हर्षनाथ था और दोनों के बीच बहुत अधिक स्नेह था। एक दिन बाई जीवण और उसकी भाभी सरोवर पर पानी लेने गई, जहाँ दोनों के मध्य किसी बात को लेकर तकरार हो गई। उनके साथ गांव की अन्य सखी सहेलियां भी थी। अन्ततः दोनों के मध्य यह शर्त रही कि दोनों पानी के मटके घर ले चलते है, जिसका मटका हर्षनाथ पहले उतरेगा उसके प्रति ही हर्षनाथ का अधिक स्नेह समझा जायेगा। हर्षनाथ इस विवाद से अनभिग्य था। पानी लेकर जब दोनों घर आई तो हर्षनाथ ने पहले मटका अपनी पत्नी का उतार दिया। इससे जीवण को आत्मग्लानि व हार्दिक ठेस लगी। भाई के प्रेम में अभाव जान कर जीवण के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया और वह घर से निकल पड़ी। जब भाई हर्षनाथ को कर्तव्य बोध हुआ तो वो जीवण को मनाकर वापस लाने उसके पीछे निकल पड़ा। जीवण ने घर से निकलने के बाद पीछे मुड़कर ही नहीं देखा और अरावली पर्वतमाला के इस पहाड़ के एक शिखर जिसे "काजल शिखर" के नाम से जाना जाता है पहुँच गई। हर्षनाथ भी जीवण के पास पहुँच अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा चाही और वापस साथ चलने का आग्रह किया, जिसे जीवण ने स्वीकार नहीं किया। जीवण के दृढ निश्चय से प्रेरित हो हर्षनाथ भी घर नहीं लौटा और दुसरे पहाड़ की चोटी पर भैरव (भगवान शंकर) की साधना में तल्लीन हो गया। पहाड़ की यह चोटी बाद में हर्षनाथ पहाड़ के नाम से प्रसिद्ध हुई। वहीं जीवण ने नव-दुर्गाओं की कठोर तपस्या करके सिद्धि के बल पर जीणमाता (दुर्गा माता) बन गई। हर्षनाथ भी भैरव की साधना कर हर्षनाथ भैरव बन गया। इस प्रकार जीवण और हर्षनाथ अपनी कठोर साधना व तप के बल पर देवत्व प्राप्त कर लोगो की आस्था का केंद्र बन पूजनीय बन गए। इनकी ख्याति दूर-दूर तक फ़ैल गई और आज लाखों श्रद्धालु इनकी पूजा अर्चना करने देश के कोने कोने से पहुँचते है।

एक जनश्रुति के अनुसार देवी जीणमाता ने सबसे बड़ा चमत्कार मुग़ल बादशाह औरंगजेब को दिखाया था। औरंगजेब ने शेखावाटी के मंदिरों को तोड़ने के लिए एक विशाल सेना भेजी थी। यह सेना हर्ष पर्वत पर शिव व हर्षनाथ भैरव का मंदिर खंडित कर जीणमाता मंदिर को खंडित करने आगे बढ़ी। कहते है, पुजारियों के आर्त स्वर में माँ से विनय करने पर माँ जीण ने भँवरे (बड़ी मधुमखियाँ) छोड़ दिए जिनके आक्रमण से औरंगजेब की शाही सेना लहूलुहान हो भाग खड़ी हुई। कहते है, स्वयं बादशाह की हालत बहुत गंभीर हो गई और बादशाह को माँ के दरबार में पैदल नंगे पाँव चलकर आना पड़ा। बादशाह ने हाथ जोड़ कर माँ जीण से क्षमा याचना कर माँ के मंदिर में अखंड दीप के लिए सवामण तेल प्रतिमाह दिल्ली से भेजने का वचन दिया। एक अन्य जनश्रुति के अनुसार औरंगजेब को कुष्ठ रोग हो गया था। अतः उसने कुष्ठ निवारण हो जाने पर माँ जीण के मंदिर में एक स्वर्ण छत्र चढाना बोला था, जो आज भी मंदिर में विद्यमान है।

श्री जीणमाता प्रचार मंडल, मुम्बई – मुम्बई एवं इसके आसपास के क्षेत्रों में राजस्थानी समुदाय की प्रमुख आराध्य देवी श्री जीणमाता के भक्तों की संख्या काफी है। जो भक्तगण राजस्थान में श्री जीणमाता के दर्शन लिए लिए नहीं जा पाते हैं, उनके लिए श्री जीणमाता प्रचार मंडल, मुम्बई ने अथक प्रयास से मुम्बई के उपनगर मालाड़ में एक भव्य मंदिर का निर्माण कर इसका लोकार्पण 24 जून 2010 को किया। इसमें हर्षनाथ का भी मंदिर है। संस्था की ओर से सर्वसुविधायुक्त धर्मशाला बनवाने के लिए जमीन भी खरीद ली है, जिसपर निर्माण कार्य शीध्र ही शुरू किया जायेगा। मंदिर की स्थापना दिवस के अतिरिक्त साल में पड़ने वाली दोनों नवरात्रों में हजारों की संख्या में भक्तगण यहाँ दर्शन करने आते है। भक्तों द्वारा माँ को नारियल, बताशा, चूरमा, शीरा, पुड़ी एवं तरह-तरह के मिष्ठानों के भोग लगाने का रिवाज है। माँ को सभी तरह का प्रसाद प्रिय है। साथ ही हर महिने शुक्ल पक्ष अष्टमी को ‘जीण चरित मानस मंगल पाठ’ एवं भजन संध्या का आयोजन किया जाता है, जिसे कोई भी भक्तगण आयोजित करवा सकता है। इस संस्था के अध्यक्ष व ट्रस्टी नरेंद्र गुप्ता, मुख्य संरक्षक व ट्रस्टी नन्द किशोर अग्रवाल, सचिव व ट्रस्टी विजय डोकानियाँ तथा कोषाध्यक्ष व ट्रस्टी सांवल चन्द अग्रवाल, ट्रस्टी प्रवीण मुकीम, सुरेश खंडेलिया, रमेशचंद अग्रावल, प्रमोद सांगानेरिया, प्रकाशचंद अग्रवाल, शंकर मित्तल, विष्णु अग्रवाल, मुकेश डोकानिया, गोपी अग्रवाल हैं।


श्री जीणमाता प्रचार मंडल, मुम्बई द्वारा आयोजित होनेवाले विविध कार्यक्रमों की चित्रित झलकियाँ