Organization | Shri Venkatesh Devasthan Fanaswadi, Mumbai

‘कलौ वेंकटनायकः, वेंकटेशसमोदेवो न भूतो न भविष्यति’
इन प्राचीन वचनों के अनुसार इस कलियुग में प्रत्यक्ष तथा समाभ्यधिकरहित देवता भगवान श्री वेंकटेश स्वामी हैं। जिनकी आराधना से मनुष्य की सभी प्रकार की मनोकामनायें निश्चित रूप से पूर्ण होती है। ऐसे भक्तवत्सल भगवान के कई मंदिर समस्त भारतवर्ष में स्थान-स्थान पर निर्मित है, जिन में फणसवाडी मुम्बई स्थित श्रीवेंकटेश देवस्थान का नाम सर्वविदित है, जो छोटा तिरुपति नाम से प्रसिद्ध है।

देवस्थान के प्रतिष्ठापक – शेषावतार भगवान श्रीरामनुजाचार्य से प्रतिष्ठापित 74 पीठाधिपतियों के अंतर्गत श्रीमुडम्बै नम्बि के वंशज उन्हीं श्रीरामानुजाचार्य का अपरावतार श्रीमद्वरवरमुनीन्द्र से प्रतिष्ठापित अष्ठदिग्गजाचार्य के अंतर्गत, प्रतिवादि भयंकर विरूद्ध-विभूषित, श्रीमुडुम्बै अण्णा नामक हस्त्यद्रिनाथाचार्य के वंशोत्पन्न, तीर्थराज पुष्कर में श्रीरंगनाथ श्रीवेणुगोपाल दिव्यदेश में प्रतिवादि भयंकर गद्दी के प्रतिष्ठापक बड़े अनन्त महाराज के नाम से प्रसिद्ध स्वामीजी के, जो और जिनकी उत्तराधिकारी परम्परा के स्वामी लोग गादी स्वामी के नाम से प्रसिद्ध हुए हैं, उत्तराधिकारी तिरुनांगूर प्रतिवादि भयंकर वंश शाखा के श्रीवैकुन्दविण्णगरम् तिरुमालिगै के श्रीनिवासाचार्य के उत्तराधिकारी तथा उन्हीं के भ्राता श्रीरामानुजाचार्य (आराअमुदु) के सुपुत्र श्रीमद्कृष्णमाचार्य के सुपुत्र, श्रीमदनन्ताचार्य स्वामीजी, जिनकी विशेषकर जगदगुरु गादी स्वामीजी के नाम से प्रसिद्ध हुई, ज्ञानानुष्ठान सम्पन्न, त्यागी, तपस्वी, श्रीकाञ्ची प्रतिवादि भयंकर मठाधीश श्रीमदनन्ताचार्य स्वामीजी महाराज इस दिव्येश के निर्माणक तथा भगवदर्चा मूर्ति प्रतिष्ठापक महानुभाव है। श्रीवेंकटेशजी के परमभक्त मुम्बई निवासियों के मनोरथ को परिपूर्ण करने के लिये श्री स्वामीजी ने अपनी शक्ति से उपार्जन किये द्रव्य से इस मंदिर निर्माण का परिश्रम उठाया। इसमें अपने अन्नय भक्त परमोदार मुम्बई के तथा अन्यान्य प्रान्तों के प्रमुख महानुभावों की आर्थिक सहायता भी प्राप्त की।

मन्दिर निर्माण तथा प्रतिष्ठा - सन् 1920 ई. के शुभ मुहुर्त में शिलान्यास होकर मन्दिर का निर्माण कार्य आरम्भ हुआ। सन् 1927 में निर्माण कार्य समाप्त होकर प्रतिष्ठा कार्य मिति ज्येष्ठ शुक्ल 5 शनिवार 1983 तदनुसार दिनांक 4 जून सन् 1927 को प्रारम्भ होकर मिति ज्येष्ठ शुक्ल 10 शुक्रवार सम्वत् 1983 तदनुसार दिनांक 10 जून सन् 1927 को पूर्ण हुआ।

संचालन – भगवत्सान्निध्य होने के पाश्चात श्रीमदाचार्यचरण ने संकल्प तथा समर्पण विधिपूर्वक मन्दिर तथा सारी सम्पत्ति को भगवदर्पण कर यह सिद्ध किया कि इसके स्वामी श्रीवेंकटेश भगवान है। तब से स्वयं एक धर्मकर्ता के नाते स्वतन्त्रतापूर्वक देवस्थान को सुचारू रूप से चलाते आये।

ट्रस्ट निर्माण – भविष्य में भी ऐसा ही चलता रहे इस अभिप्राय से दिनांक 26 जून 1927 को देवस्थान के बाहरी प्रांगण में ही समस्त श्रीवैष्णवों की एक सार्वजनिक सभा में श्रीआचार्यचरण ने मन्दिर को एक ट्रस्ट के अंतर्गत करने की इच्छा प्रकट की वैसे ही एक ट्रस्टीडीड लिखी, उसकी रजिस्ट्री तारीख 21 जून सन् 1935 ई. को मुम्बई में हुई। उस समय से स्वयं एक धर्मकर्ता के ओहदे से मंदिर का कार्य संचालन कर रहे थे। देवस्थान के आन्तरिक निर्वाह के लिये मामूलनामा भी लिखा, इसका जिक्र ट्रस्टडीड के परिच्छेद तीन में है।

ट्रस्ट बोर्ड – श्री आचार्यचरण के बैकुण्ठवास के बाद उनके सुपुत्र व गादी स्वामी श्रीमद्कृष्णामाचार्य जी तथा उनके श्रीवैंकुण्ठवास के बाद वर्तमान गादी स्वामी श्रीमद् श्रीनिवासाचार्य की अध्यक्षता से ट्रस्ट बोर्ड मंदिर का कार्य संचालन कर रहा है। श्रीरामनारायण नथमल सोमानी वर्तमान मैनेजिंग ट्रस्टी तथा श्री सुरेश चौधरी मंदिर के प्रबंधक के रूप में कार्यरत हैं। श्री रामनारायण सोमानी जी 2000 से इसके मैनेजिंग ट्रस्टी हैं, उनके कुशल नेतृत्व में मंदिर की भव्यता तथा प्रसिद्धि में दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ोतरी हो रहा है। बिना किसी नाम किये प्रतिदिन सुबह भगवान के सामने बड़ी निष्ठा और श्रद्धा के साथ अपनी उपस्थिती दर्ज करते है और हर स्थिति में सहायता करने के लिए सदैव तैयार रहते है। उन्होंने मंदिर का जीर्णोद्धार के साथ ही स्वामी जी के आवासीय भवन (मठ) को भी पुनः निर्माण करने की योजना है, जो कि स्वामीजी तथा मंदिर के प्रति उनकी श्रद्धाभाव को प्रदर्शित करता है। उनके प्रयास का ही प्रतिफल है कि यहां प्रतिदिन विभिन्न धर्मों तथा संप्रदाय खासकर वैष्णव संप्रदाय को मानने वाले हजारों श्रद्धालु सुबह-शाम इस मंदिर में पूजा-अर्चना तथा भगवान वेंकटेश जी के दर्शन करने के लिए आते है। यहां नियमित दर्शन करने के लिए आने वालों में कई उद्योगपति तथा विशिष्ठ महानुभावों का समावेश है। मंदिर में रखे दान-पात्र में प्रतिमाह के आवक में दो से तीन गुणा वृद्धि इसकी पुष्टी करता है। श्री वेंकटेश देवस्थान फणसवाडी, मुम्बई के प्रबंधक सुरेश चौधरी का प्रबंधन भी सराहनीय है, तभी तो इस भव्य एवं दिव्य मंदिर में होने वाले हर उत्सव, त्योहार का संचालन बड़ी बखूबी से सम्पन्न होता है। श्रद्धालुओं के देवदर्शन से लेकर प्रसाद वितरण सहित हर प्रकार की व्यवस्था पर पैनी नजर का ही फल है, कि कभी भी किसी भी प्रकार की अव्यवस्था मंदिर कार्य संचालन में किसी प्रकार की बाधा व रूकावट का आभास नहीं हुआ।

प्रधान-मूर्ति तथा विशेषता – इस देवस्थान की प्रधान अर्चामूर्ति श्रीवेंकटेश स्वामी की तथा उनकी दिव्यमहिषी श्रीपद्मावती की है। मनुष्य प्रतिष्ठित दिव्यदेशों के लिए आवश्यक है कि उसका सम्बन्ध किसी देवप्रतिष्ठित अथवा सिद्धप्रतिष्ठित दिव्यदेश से कराया जाय। श्रीकांची के 18 दिव्यदेशों में से जहाँ श्रीयथोक्त्तकारी भगवान विराजमान है जिनकी प्रतिष्ठा स्वयं पितामह श्री ब्रह्माजी द्वारा हुई थी, एक मूर्ति, तिरुनाङ्गूर के 11 दिव्यदेशों से एक श्रीपुरुषोतम भगवान के दिव्यदेश से श्रीसुदर्शन चक्र की मूर्ति, पालकी में पैदल मार्ग से विधिवत् तत्तकाल की पूजा करते हुए, मुम्बई पधरायी गई। यह तो साधारण बात नहीं, किन्तु श्रीआचार्यचरणों के असाधारण तपश्चर्या का ही फल है।

दिव्यदेश दर्शन – मुम्बई के फणसवाडी मार्ग पर पूर्वाभिमुख नवीन गोपुरयुक्त लालपत्थर से निर्मित विशाल द्वारयुक्त श्रीवेंकटेश देवस्थान स्थित है, जिसमें प्रवेश करते ही एक तरफ प्रहरियों के स्थान पर, दूसरी तरफ ऊपर जाने का मार्ग है। इसके आगे देवस्थान कार्यालय स्थित है जहां पर देवस्थान संबंधी सभी सूचनायें एवं श्री वैष्णव सम्प्रदाय की पुस्तकें तिलक पासा आदि मिलते हैं। यहाँ भगवान की गोष्ठीप्रसाद, भेंट, तिरुमञ्जन (अभिषेक) अन्य सेवाओं के लिए रुपये जमा किये जाते हैं और उसकी प्राप्ति की रसीद दी जाती है। कार्यालय के आगे सोलह स्तम्भों का विशाल वाहन मणडप है जो दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला के अनुसार पत्थर से निर्मित है। इनमें प्रधान गोपुरम द्वार के बाँई तरफ देवस्थान के प्रतिष्ठापक पूज्यपाद जगदगुरु श्री 1008 स्वामी श्री अनन्ताचार्यजी महाराज का श्री विग्रह विराजमान है और यहाँ ही देवस्थान सम्बंधी मकान में जाने का मार्ग है, यह तीन मंजिल वाला है। जिसके निचले मंजिल में मन्दिर के कर्मचारी और प्रथम मंजिल में अर्चक, परिचारक आदि निवास करते हैं। द्वितीय मंजिल में आगन्तुक श्रीवैष्णव संत, महंत, विद्वान एवं सद्गृहस्थों के ठहरने का प्रबंध है। तृतीय मंजिल पर श्रीप्रतिवादि भयंकर मठ स्थित है, जिसका निर्माण, प्रतिष्ठा के बाद श्रीमद् आचार्यचरणों ने कराया था और आप यहाँ पर ही निवास करते थे। वर्तमान ट्रस्ट बोर्ड के अध्यक्ष श्रीप्रतिवादि भयंकर मठाधीश गादि श्री 1008 स्वामी श्रीनिवासाचार्य जी महाराज भी जब मुम्बई पधारते हैं, तब इस पूर्व निर्दिष्ट स्थान पर ही ठहरते हैं। यहाँ भगवत्सन्निधि सभागृह एवं पुस्तकालय है जिसमें श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के ग्रंथ अत्यल्प संख्या में है। नीचे मंडप से संलग्न प्रधान गोपुरम द्वार है, जिसके उपर सुन्दर गोपुरम बना हुआ है। सामने स्वर्ण ध्वजस्तम्भ (गरुडस्तम्भ) एवं स्वर्ण बलिपीठ है, इसके आगे सोपान मण्डप है जहाँ बलिप्रदान के बाद बलिमूर्ति की पूजा, भगवान के सवारी की बाद की पूजा और झूला होती है। भगवान की आराधना के समय में यहाँ पर मदरासी वाद्य नादस्वरम् शहनाई बजती है। इसके आगे दोनों तरफ द्वारयुक्त महामण्डप है। इसके आगे अर्धमण्डप है और गर्भगृह परिक्रमा के लिये महामण्डप के दोनों तरफ द्वार है। इस परिक्रमा में तथा महामण्डप के बाहर की ओर स्वर्ण खचित केशव आदि व्यूहमूर्ति, अन्यान्य भगवन्मूर्ति व भक्तमूर्तियां है। संगमरमर के स्तम्भों से युक्त महामण्डप के भीतर दक्षिण में श्रीदेवीयुक्त श्रीदेवराजजी, श्रीलक्ष्मीनृसिंहजी, श्रीचक्रराज सुदर्शन (तिरुंनापुर से पधारे) विराजमान है। उत्तर में रुक्मिणी, सत्यभामा सहित श्रीराजगोपालजी, लक्ष्मणजी सीताजी हनुमान सहित श्रीरामचन्द्रजी विराजमान हैं। सामने श्रीवेंकटेशजी का मूलविग्रह, श्रीदेवी भूदेवी सहित उत्सव विग्रह, कर्मार्चादि चार विग्रह श्रीकांची से पधाराये गये श्रीयथोक्तकारी भगवान के साथ, पूर्वाभिमुख भक्तों को दर्शन देकर कृतार्थ कर रहे हैं। भगवान के सम्मुख महामण्डप में श्रीगरुडजी विराजमान है। मुख्य मन्दिर के बाहरी प्रकार में बाई तरफ अभिषेक मण्डप है जिसको उत्सव मण्डप भी कहते हैं। उत्सवों के समय में भगवान यहाँ विराजमान होते हैं और अभिषेक होता है। वसन्तोत्सव, दवनोत्सव, झूलाउत्सव आदि भी यहीं होता है। कगंच घर (शीश महल) यहीं स्थित है। यहाँ पर प्रथम रङ्गनाथजी की सन्निधि (मंदिर) उसके समीप में श्रीमहालक्ष्मी पद्मावती की सन्निधि है। यहाँ पर श्रीगोदाम्बाजी विराजमान है। उक्त दर्शन के बाद भगवान की बाहरी परिक्रमा प्रारम्भ होती है, जिसमें भण्डार घर, वस्त्र घर, वाहन घर तथा श्रीवैकुण्ठ उत्सव मण्डप है। इसके सामने चन्दनगृह, दुग्ध गृह और शुक्रवार मण्डप (कांच मण्डप) है, जहाँ प्रति शुक्रवार को पद्मावती तथा उत्सवों के समय में भगवान विराजते है। श्रीगोदाम्बाजी के अवतार उत्सव तथा धनुर्मास व्रत स्नानोत्सव में कल्याणोत्सव यहीं होता है। इसके आगे पाकशाला श्रीरामानुजकूट व कूप है। समस्त परिक्रमा में संगमरमर पत्थर पर अंकित समस्त श्रीमद् भागवद्गीता लगी हुई है और 108 दिव्यदेशों के भगवान चित्ररूप में विराजमान है। उत्तर परिक्रमा के अंत में श्रीरामानुजाचार्ज की सन्निधि है। यहाँ श्रीविष्वक्सेनजी, श्रीशठकोपसूरि, विष्णुचितसूरि, श्रीपरकालसूरि श्रीरामानुचार्य की मूल तथा उत्सव मूर्ति तथा वरवरमुनीन्द्रजी हैं। यहाँ से संलग्न यज्ञशाला है जहाँ पर ब्रह्मोत्सव एवं अन्य उत्सवादि के समय हवन होता है।

पूजा तथा उत्सव – नित्य पंचकाल पूजा, नित्योत्सव से ब्रह्मोत्सव के वर्ष भर का उत्सव पांचरात्रागमानुसार चलता है। एक पल्लवोत्सव को छोड़कर श्री आचार्यचरण के अभिलाषानुसार सब उत्सव होते हैं। जिनमें रथोत्सव उल्लेख्यनीय है। इसका भी उल्लेख करना अत्यंत उचित है कि श्रीमद्वरवरमुनीन्द्रजी के षष्ठशताब्दी पूर्ति महोत्सव के उपलक्ष्य में साधारण नाम सौर सम्वत्सर से (1970) श्री भगवद्विषय महोत्सव चल रहा है।

निर्माण और संम्पत्ति – श्रीआचार्य के संकल्पानुसार निर्माण कार्यों में बाकी रहे वाहन मण्डप, परिक्रमा मण्डप, शीशमहल, रथ बन गये हैं। श्रीरङ्गनाथजी, श्रीआचार्यचरण की अर्चामूर्ति की प्रतिष्ठा होकर तत्तत्सन्निधियों में विराजमान है। सम्पति में बड़ी अभिवृद्धि हुई तथा उपरोक्त विषयों का श्रीवेंकटेश मन्दिर, मुम्बई दिव्यदेश का संक्षिप्त इतिहास में विस्तार से वर्णन है।

औषधालय – धर्मार्थ आयुर्वेद एवं दंत चिकित्सालय चल रहा है। मंदिर सम्बंधी मकान के सडक की तरफ के कमरे में यह औषाधालय है।

श्री अनन्तभवनम् – गादी स्वामीजी की स्मृति में श्री काञ्ची में उनके दिव्यभवन के बाजू के मकान को खरीदकर उसका नवीनतया निर्माण कर श्री अनन्दभवनम् नाम रखकर उस में दिव्यदेश यात्रा करनेवाले श्रीवैष्णवों को ठहरने की व्यवस्था की जा रही है।

रिसर्च इन्स्टीट्यूट – सनातन धर्म तथा विशेषकर श्रीविशिष्टाद्वैत श्रीवैष्णव (श्रीरामानुजाचार्य) धर्म प्रचार तथा अभिवृद्धि के लिए अपना जीवन अर्पण करनेवाले श्रीआचार्यचरण के शताब्दी महोत्सव पर उनके उद्देश्य की पूर्ति के निए श्री अनन्ताचार्य इण्डालाजिकल रिसर्च इनस्टीट्यूट स्थापित किया गया। संस्कृत भाषाभिवृद्धि के लिए इंस्टीट्यूट प्रयत्नशील है।

सेवा – भारत के प्रायः सभी तीर्थस्थानों पर स्थापित संस्कृत पाठशालाओं को वार्षिक अनुदान, संस्कृत प्रचार के लिए दिया जाता है और दैव प्रकोप से पीड़ितों को समय-समय पर सहायता की जाती है।


श्री वेंकटेश देवस्थान फणसवाड़ी, मुम्बई के विविध कार्यक्रमों की चित्रित झलकियाँ